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भोजपुर जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वधान में मूर्धन्य साहित्यकार डॉ भगवती शरण मिश्र की द्वितीय पुण्यतिथि पर श्रद्धांजली सभा आयोजित।

आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा) 28 अगस्त।भोजपुर जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में मूर्धन्य साहित्यकार डॉ भगवती शरण मिश्र की द्वितीय पुण्यतिथि समारोह पूर्वक मनाई गई । पुण्यतिथि समारोह की अध्यक्षता सम्मेलन के अध्यक्ष प्रो बलिराज ठाकुर ने की । मुख्य अतिथि के रूप में जय प्रकाश विश्विद्यालय , छपरा के पूर्व कुलपति डॉ दुर्ग विजय सिंह उपस्थित थे।समारोह का उद्घाटन मुख अतिथि डॉ दुर्ग विजय सिंह , प्रो बलिराज ठाकुर , डॉ नंदजी दुबे , डॉ दिवाकर पाण्डेय , कवि आलोचक जितेंद्र कुमार और साहित्यकार जनार्दन मिश्र ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया । तत्पश्चात डॉ मिश्र के छात्र रहे अवकाश प्राप्त पुलिस पदाधिकारी कृष्ण चंद्र दुबे को डॉ मिश्र के सुपुत्र जनार्दन मिश्र द्वारा अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।अपने स्वागत भाषण में साहित्यकार जनार्दन मिश्र ने अपने पिता जी के दृढ़ संकल्प और उनकी साहित्य साधना का उल्लेख करते हुए कहा कि वे अनुशासन प्रिय भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ पधाधिकारी और ख्याति प्राप्त साहित्यकार थे । उनकी साहित्य साधना राष्ट्रहित में थी ।उन्होंने अपने दर्जनों उपन्यासों , कथा संग्रहों और समसामयिक निबंधों में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। प्रो बलिराज ठाकुर ने अपने संबोधन में कहा की मिश्र जी ने विपुल साहित्य की रचना कर हिंदी साहित्य को काफी ही संबृद्ध किया है ! प्रो ठाकुर ने कहा कि जिस पुस्तक से मनुष्य का अज्ञान , कुसंस्कार दूर नहीं होता , जिससे मनुष्य शोषण और अत्याचार के विरुद्ध सिर उठाकर खड़ा नहीं हो जाता , वह पुस्तक किसी भी काम की नहीं है ।इस दृष्टि से विचार करने पर मिश्र जी की पुस्तकों की सार्थकता स्वतः सिद्ध हो जाती है । इस अवसर पर आलोचक जितेंद्र कुमार , सुधि समीक्षक आलोचक डॉ सुधीर सुमन, प्रो नंदजी दुबे , वरिष्ठ पत्रकार गुंजन जी , प्रो दिवाकर पाण्डेय ने विस्तार से डॉ मिश्र द्वारा रचित पुस्तकों की समीक्षा की । युवा कवि सिद्धार्थ वल्लभ , चर्चित कवि ओमप्रकाश मिश्र , वरिष्ठ साहित्यकार रणजीत बहादुर माथुर , भोजपुरिया जनमोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भरत सिंह सहयोगी , डॉ शीलभद्र , डॉ ममता मिश्र , वरिष्ठ कवि शिवदास सिंह और सामाजिक नेत्री मधु मिश्र ने अपने अपने उद्बोधन में कहा कि डॉ मिश्र जी का समग्र कृतित्व और व्यक्तित्व साहित्य साधना का एक स्पष्ट मिशाल है , जो सरकालिक है ।भावांजली के उपरांत काव्यांजलि की शुरुआत युवा कवि विक्रांत के द्वारा की गई ।उपस्थित सभी कवियों ने चढ़ बढ़कर भाग लिया और समय की जटिलताओं से टकराने वाली अति ही ज्वलंत अपनी अपनी रचनाएं सुनाई । कार्यक्रम का कुशल संचालन कवि जनार्दन मिश्र ने किया ।धन्यवाद ज्ञापन डॉ मिश्र की पुत्रवधु सामाजिक नेत्री मधु मिश्र ने करते हुए कहा कि मेरे पूज्य पिता जी अपने समय के बड़े ही पाबंद थे। उनकी साहित्य साधना समय का स्वर्णिम हस्ताक्षर है ।

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