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भोजपुर के ग्राम्य जीवन का यथार्थ है डॉ. विन्ध्येश्वरी की कहानियाँ”‘सहारे का सूर्यास्त’ का लोकार्पण! डॉ. विन्ध्येश्वरी ने भोजपुर की कथा परंपरा को आगे बढ़ाया है : श्रीकांत 

आरा/भोजपुर 29 जुलाई।“डॉ. विंध्येश्वरी की कहानियाँ बिहार के ग्रामीण समाज की कहानियाँ हैं। कहानीकार ने ‘गिन्नी का गाँव’ कहानी में ग्रामीणों के पलायन और शहर में उनके श्रम के शोषण के यथार्थ को दिखाया है। गिन्नी का मालिक इतना संवेदनहीन है कि वह उसे कोरोना सेंटर में डलवाकर छोड़ देता है, जहां उसकी मौत हो जाती है। पूंजीवाद कैसे श्रमिकों के हुनर का इस्तेमाल करके छोड़ देता है, यह कहानीकार ने दिखाया है।” पत्रकार-कहानीकार श्रीकांत ने आज रेडक्रॉस सोसाइटी सभागार में जनसंस्कृति मंच द्वारा डॉ. विंध्येश्वरी के कहानी संग्रह’ सहारे का सूर्यास्त’ के लोकार्पण के अवसर पर ये विचार व्यक्त किये।
श्रीकांत ने 1930 के बिहार में कुआँ और मंदिर निर्माण के संदर्भ की चर्चा करते हुए कहा कि दक्षिण भारत में जैसा सामाजिक सुधार आंदोलन हुआ, वैसा बिहार में नहीं हुआ। आज बिहार से भारी पैमाने पर लोग रोजगार के लिए पलायन करते हैं, हर दो-तीन माह में बिहारियों के मरने की खबर आती है। डॉ. विन्ध्येश्वरी ने बिहार के ग्रामीण जीवन को जिस रूप में देखा और महसूस किया, उसे ही लिखा है। इन्होंने भोजपुर की कथा-परंपरा को आगे बढ़ाया है।
पत्रकार- कहानीकार नवेंदु ने सत्तर के दशक में विकसित कहानी, रंगकर्म और पत्रकारिता की परंपरा को विस्तार से याद किया और कहा कि डॉ. विन्ध्येश्वरी की कहानियों में भोजपुर का ग्राम्य जीवन अपने वास्तविक रूप में चित्रित हुआ है। वे प्रेमचंद की परंपरा के लेखक हैं।
सांस्कृतिक कार्यकर्त्ता संतोष सहर ने कहा कि आज सबसे बड़ा संकट मनुष्यता का संकट है। कहानी का भोजपुर स्कूल मनुष्यता के संघर्षों के साथ रहा है। डॉ. विन्ध्येश्वरी मधुकर सिंह, विजेंद्र अनिल, रामेश्वर उपाध्याय की परंपरा के ही कहानीकार हैं। भोजपुर स्कूल को आज की परिस्थितियों में मनुष्यता के संकट को चित्रित करना और उससे मुक्ति की राह तलाशनी है।
कवि ओम प्रकाश मिश्र ने कहा कि डॉ. विन्ध्येश्वरी ने बेरोजगारी के दंश का मार्मिक चित्रण किया है। कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने कहा कि ‘सहारे का सूर्यास्त में कहानीकार ने ग्रामीण समाज के वास्तविक चरित्रों को पात्र बनाया है। उनकी कुछ कहानियाँ कथा- रिपोर्ताज की तरह हैं। आज मजदूरों गरीबों और अमीरों के बीच खाईं बढ़ी है। सामंती रिश्ते से टूट रहे हैं, उसकी वजह पूंजीवाद है।
कथाकार सुरेश कांटक ने कहा कि आज एक बडे सामूहिक आंदोलन और बिखरी हुई प्रतिरोधी शक्तियों की एकता जरूरी है, ताकि यथास्थिति टूट सके।
कवि- आलोचक सिद्धार्थ वल्लभ ने कहा कि 1990 के बाद गांवों में बहुत बदलाव हुए हैं। 80प्रतिशत से ज्यादा युवाओं का पलायन हुआ है। गाँव युवाविहीन हो चुके हैं। ‘गिन्नीम का गांव’ इसी सच को दर्शाती है। कारण सामाजिक-आर्थिक दोनों है।
सुधीर सुमन ने कहा कि डॉ. विंध्येश्वरी की खासियत यह है कि वे अपनी ओर से कोई वैचारिक सूत्र नहीं प्रस्तुत करते। कहानी में निहित विचार के लिए पाठक को पूरी कहानी से गुजरना पड़ता है।
अनुवादक – शिक्षक अरुण जी ने कहा कि परिवर्तनकारी शक्तियां भी सत्ता में आने के बाद कैसे बदल जाती हैं, इस पर भी ध्यान देना चाहिए।
अध्यक्षता जितेंद्र कुमार, अनंत कुमार सिंह, सुरेश कांटक, नवेंदु और श्रीकांत ने की और संचालन सुमन कुमार सिंह ने किया। इस मौके पर कथाकार अनंत कुमार सिंह, पत्रकार गुंजन ज्ञानेंद्र सिन्हा, पत्रकार भीम सिंह, कवि जनार्दन मिश्र और विक्रांत ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
इस अवसर पर कवि कुमार मुकुल, कहानीकार सिद्धनाथ सागर, समाजसेवी विभा कुमारी, कवि रविशंकर सिंह, कॉ. जितेंद्र कुमार, गायक-रंगकर्मी राजु रंजन, अमित मेहता, माले नेता अमित कुमार बेटी, दीनानाथ सिंह, दिलराज प्रीतम, विनय कुमार, डॉ. नथुनी पांडेय, डॉ. कुमार शीलभद्र, धनंजय कुमार सिंह, सुशील पाल, संतोष कुमार सिंह आदि मौजूद थे।

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