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पटना:अपने समय के जीवित शब्द-कोश थे आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव।

एक ‘बटोहिया-गीत’ से अमर हो गए बाबू रघुवीर नारायण।

जयंती पर साहित्य सम्मेलन ने दोनों विभूतियों को किया श्रद्धापूर्वक स्मरण, दी काव्यांजलि।

RKTV NEWS/पटना(भोजपुर)28 अक्टूबर। अपने समय के जीवित शब्द-कोश थे आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव। संस्कृत सहित अनेक भारतीय भाषाओं के वे महापण्डित और ‘प्राकृत’ तथा ‘अपभ्रंश’ के अंतिम अधिकारी विद्वान थे। वे सरस्वती के लोक-प्रसिद्ध वरद-पुत्र और एक साहित्यिक ऋषि थे। उन्होंने एक संत की भाँति साहित्य की साधना की। वहीं पुरा-पीढ़ी के प्रणम्य साहित्यकार बाबू रघुवीर नारायण एक ऐसे कवि थे, जिनकी एक गीति-रचना’बटोहिया’ ने उन्हें साहित्य-संसार में सदा के लिए अमर कर दिया।
यह बातें बुधवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती-समारोह एवं कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, ७० वर्षों से अधिक समय तक अविराम साहित्य-साधना में लीन रहने वाले आचार्यजी अपनी युवावस्था में, सम्मेलन-पत्रिका ‘साहित्य’ के वर्ण-शोधक के रूप में सम्मेलन से जुड़े थे और सम्मेलन के प्रधानमंत्री के पद को भी सुशोभित किया। ९२ वर्ष की आयु में उन्होंने अपना लौकिक देह छोड़ा, किंतु ६ माह पूर्व तक साहित्य-सेवा में सक्रिए रहे। आज से उनका जन्म-शती-वर्ष आरम्भ हो रहा है। सम्मेलन का अगला अधिवेशन उनकी स्मृति को समर्पित रहेगा।
वरिष्ठ साहित्यकार जियालाल आर्य ने कहा कि बाबू रघुवीर नारायण की ही प्रेरणा से बनैली के राजा कीर्त्यानंद सिंह जी ने साहित्य-सम्मेलन के भवन निर्माण हेतु १९३८ में एकमुश्त दस हज़ार रूपए की सहायता दी थी। ‘बटोहिया’ गीत महात्मा गाँधी और देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद को बहुत प्रिय था। कांग्रेस के कार्यक्रमों में इसे वंदना-गीत के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। आंदोलन-काल में इसे पूर्वांचल का ‘राष्ट्रीय-गीत’माना जाता था।
विद्वान साहित्यकार मार्कण्डेय शारदेय ने कहा कि सूरिदेव जी एक बड़े साहित्यकार ही नहीं, साहित्यकारों के बड़े परिष्कारक थे। उन्होंने बहुत कुछ लिखा, किन्तु उससे भी अधिक अन्य साहित्यकारों का परिष्कार किया प्रोत्साहन दिया और अनेकानेक पुस्तकों की भूमिका लिखी। वे अत्यंत महान साहित्यसेवी और बिहार के गौरव थे।
वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्धन मिश्र ने कहा कि बिहार सरकार को आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव के नाम से राजभाषा-पुरस्कार आरम्भ करना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकार डा रत्नेश्वर सिंह, डा सुमेधा पाठक, डा समरेंद्र नारायण आर्य, डा मेहता नगेंद्र सिंह, अभिजीत कश्यप, सुमन कुमार मिश्र, श्री सूरिदेव के पुत्र संगम कुमार रंजन तथा पुत्रवधु विभा रंजन ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। वरिष्ठ कवि प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, चित्तरंजन भारती, सुनील कुमार मलंग, डा ओम् प्रकाश पाण्डेय, सिद्धेश्वर, विद्या चौधरी, सुनीता रंजन, तनुजा सिन्हा, जय प्रकाश पुजारी, नेहाल कुमार सिंह ‘निर्मल’ आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं से काव्यांजलि दी। अतिथियों का स्वागत सम्मेलन के संगठन मंत्री ईं अशोक कुमार ने, मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापनकृष्ण रंजन सिंह ने किया।
सम्मेलन के पुस्तकालय मंत्री डा नागेश्वर प्रसाद यादव, ईं बाँके बिहारी साव, शंकर शरण मधुकर, डा मिथिलेश कुमार, परवेज़ आलम, अभिराम बुद्धवाहा, कौसर जहां,सुमन कुमार मिश्रा आदि सुधीजन उपस्थित थे।

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