
RKTV NEWS/ बादल सरोज,27 अक्टूबर।गणित की भाषा में कहें, तो जनता से सत्ता के अलगाव और लोकतंत्र के अभाव में एक समानुपाती संबंध होता है। मतलब यह कि जनविरोधी नीतियों के असर और चौतरफा उजागर होती विफलताओं के चलते जैसे-जैसे सत्ता जनता से दूर होती जाती है, वैसे-वैसे वह जनता के क्षोभ के रोष, आक्रोश से विरोध, प्रतिरोध, आन्दोलन और संघर्ष में विकसित होते जाने से घबराने लगती है। इस घबराहट का एक रूप इन सबकी अभिव्यक्ति के लोकतांत्रिक समाज में तय जगहों, इकट्ठा होने, सभा करने, प्रदर्शन करने के नियत स्थानों को छीनने और खत्म करने का होता है। हुकूमतें इन सबकी संविधान में दी गारंटियों से मुकरने लगती है और जनतंत्र को सिकोड़ने लगती है। हालांकि इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि तूफ़ान को आता देख आँख बंद कर लेने की इस तरह की शुतुरमुर्गी चतुराई से हासिल कुछ नहीं होता, बल्कि इसका असर उलटा ही होता है। दिल्ली इस बात की गवाह है कि जनता और अधिक जिद और संकल्प के साथ अपनी बात कहने पर किस तरह आमादा हो जाती है। यूं इतिहास का यह सच हुक्मरान भी जानते हैं, मगर इतिहास से सबक न सीखने और आत्ममुग्धता के भुलावे में रहने की बीमारी उनमें जन्मजात होती है। उन्हें लगता है कि असहमति जताने पर रोक लगाकर वे आवाज दबा देंगे। मानव स्वभाव में इसे मुगालता पालना कहते हैं। मनोविज्ञान इसे ‘डेल्यूजनल डिसऑर्डर’ नाम का एक विकार मानता है। राजनीति में इसे अलग-अलग व्यक्तियों के नाम से नत्थी करके देखा गया है। दिल्ली बॉर्डर्स पर हुए ऐतिहासिक किसान आन्दोलन के बाद से भारत की नरेन्द्र मोदी की सरकार इसी मनोभ्रान्ति की स्थिति में है। जितना-जितना आन्दोलन तेज हो रहा है, उतना-उतना ही सरकार में बैठे लोगों का यह विकार बढ़ता जा रहा है। मोदी की अगुआई वाली कारपोरेट और – जिसका हिन्दू धर्म या उसकी परम्पराओं से कोई संबंध नहीं है, उस – हिंदुत्ववादी नवफासीवाद में विश्वास करने वाली सरकार तानाशाही की ओर बढ़ती जा रही है।
हजारों करोड़ रूपये खर्च कर गढ़ी गयी मोदी की अपराजेयता की छवि और उसके चलते देश की जनता के मन में घर कर गयी ‘अब कुछ नहीं हो सकता’ की जड़ता की जमीन पर किसान आन्दोलन ने हल और ट्रेक्टर चलाकर उम्मीद और संभावनाओं के जो बीज बोये थे : आज उसकी फसल देश भर में उग आई है और आन्दोलनों की हरियाली बनकर लहलहा रही है। हाल के दिनों में, खासतौर से पिछले पांच महीने से, तो देश जैसे खदबदा रहा है। पहले शिक्षा के सवाल को लेकर जेन-जी ने ऐसा झंकृत किया कि सरकार तो सरकार, उसकी आरएसएस नामधारी असंवैधानिक चूल भी हिल गयी। ‘हमारे यहाँ इस्तीफे नहीं होते’ की दम भरने वाली सरकार के शिक्षा मंत्री की छुट्टी करनी पड़ी। इसके बाद अक्टूबर से यही संघर्ष और व्यापक भागीदारी, आगे बढ़ी चेतना और तेवरों के साथ आगे बढ़ा है। लोकतंत्र और संविधान की हिफाजत करने का ज्यादा अहम् मुद्दा एजेंडे पर आया। वैसे तो जनता पहले से ही जान-समझ रही थी कि लोकसभा, विधानसभाओं में बेईमानी, तिकड़म और घोटाले करके जनादेश को मनमाने तरीके से बदला जा रहा है, मगर हाल में उजागर हुए तथ्यों ने सबूतों के साथ वोट चोरी की भयानक सच्चाई सामने ला दी। दुनिया जान गयी कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत खो देने के बाद दीवार पर लिखी इबारत को पढ़कर घबराए मोदी कुनबे ने विशेष गहन पुनरीक्षण – एसआईआर – के नाम पर खेल के मैदान को ही बदल देने की महापरियोजना शुरू कर दी है। मतदाता गायब ही नहीं किये जा रहे हैं, बल्कि एकतरफा तरीके से मत संहार करके 13 करोड़ से अधिक नागरिक मतदाता सूची से बाहर भी किये जा चुके हैं।
लोकतंत्र बचाने की इस लड़ाई का आगाज़ धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक राजनीतिक दलों ने – पहले अलग-अलग, फिर एक साथ आकर — किया। मजदूर-किसानों की तंजीमों ने इसमें अपनी ताकत झोंकी। वकीलों सहित नागरिक समाज ने इसे अपनी लड़ाई बनाया। हाल के दौर में वे छात्र युवा , जो अब तक इससे लगभग निर्लिप्त जैसे लगते थे – इसे अपनी बात मानकर सड़क पर आये और अपनी ऊर्जा की चमक से देश को चकाचौंध कर दिया। कुछ महीनों से युवाओं की खिन्नता के प्रकटीकरण का जरिया बनी सीजेपी ने इसे अगला मुद्दा बनाया । भारत के लोगो की इतनी विराट एकता से डरी सरकार ने धरना, प्रदर्शन और आन्दोलन के लिए तय स्थान जंतर मंतर को प्रतिबंधित करने का हुकुम जारी कर दिया है। मजेदार संयोग यह था कि इधर प्रधानमन्त्री मोदी बंद कमरे की एक मीटिंग में भारत के ‘मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी’ होने का जाप कर रहे थे, उधर उनके प्रिय गृहमंत्री अमित शाह के प्रिय दिल्ली पुलिस कमिश्नर राजधानी में लोकतान्त्रिक विरोध के एकमात्र बचे स्थान जंतर मंतर को प्रतिबंधित करने का तुगलकी आदेश निकाल रहे थे। 11 अक्टूबर को जारी एक स्थायी आदेश में, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने जंतर-मंतर रोड को विरोध स्थल के रूप में निर्धारित किये जाने का करीब साढ़े तीन दशक पुराना वह आदेश रद्द कर दिया, जिसे आठ वर्ष पहले स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र सम्मत बताया था।
ध्यान रहे कि जंतर-मंतर हमेशा से जलसे-जलूसों का केंद्र नहीं रहा। इस अपेक्षाकृत छोटे और सिर्फ एक सड़क भर चौड़े स्थान के राजधानी के विरोध केंद्र के रूप में स्थापित होने का भी एक इतिहास है। यह इतिहास यदि उसकी विकासमान समग्रता से जोड़कर देखें, तो असल में भारत में लोकतंत्र के संकुचन का इतिहास भी है। इसी के साथ यह ‘जहं जहं पाँव पड़े दुष्टन के, तहँ तहं बंटाढार’ का भी एक और उदाहरण है। जंतर मंतर के निर्धारित होने से प्रतिबंधित होने तक की कहानी इस बात की बयानी है कि दक्षिणपंथ और फासीवादी ताकतें – भले वे सत्ता में हों या न हों – की बढ़त किस तरह लोकतान्त्रिक स्पेस को सिकोड़ती है। लोग भूल जाते हैं कि आजादी के बाद से ही सरकार के खिलाफ या अपनीं मांगों के समर्थन में जितने भी प्रदर्शन होते थे, वे सीधे राष्ट्रपति भवन और संसद के दरवाजे तक पहुंचा करते थे। यह स्थिति स्वतंत्र भारत में लगभग 20 वर्ष तक रही । इसके बाद आरएसएस की अगुआई में स्वयंभू हिंदूवादी संगठनों ने गौकशी पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध की मांग को लेकर संसद भवन के ठीक बाहर एक बड़ा और उग्र प्रदर्शन किया। जलूस के आगे-आगे साधुओं को रखकर किये गए इस प्रदर्शन के कुछ लोगों ने त्रिशूल, तलवार, भालों के साथ संसद भवन में घुसने की कोशिश की। 7 नवंबर 1966 को हुए इस प्रदर्शन के दौरान टकराव में हिंसा और पुलिस फायरिंग हुई। कई मौतें भी हुईं । नतीजा यह निकला कि इस घटना का फायदा उठाकर सरकार ने संसद भवन के ठीक नजदीक बैठकों, जुलूसों और प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी। इस प्रतिबंध के बाद प्रदर्शनों के लिए संसद परिसर से थोड़ा दूर, राजपथ के किनारे स्थित बोट क्लब के मैदानों की जगह तय कर दी गयी। कई दशकों तक बोट क्लब दिल्ली में प्रदर्शनों का सबसे बड़ा और प्रमुख केंद्र रहा। देश के जनतांत्रिक आन्दोलनों के इतिहास के अनेक सुनहरे अध्याय इस बोट क्लब पर लिखे गए। इसके बाद आया 1992 का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद आंदोलन और 6 दिसंबर को हुआ बाबरी ध्वंस : इस बार सरकार को सुरक्षा व्यवस्था और वीआईपी इलाकों के लिए कथित खतरों की आशंकाओं का बहाना मिल गया। लोकतान्त्रिक अभिव्यक्ति का दायरा और सिकुड़ा और फरवरी 1993 में तब की सरकार ने बोट क्लब पर प्रदर्शनों को भी हमेशा के लिए प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद जो जगह तय हुई, वह जंतर मंतर था।
हालांकि सरकारों की आँखों में – खासतौर से 2014 के बाद आई मोदी सरकार की आँखों में — जंतर मंतर खटकता रहा । कभी इस, तो कभी उस बहाने इसे भी छीनने की साजिशें रची गयीं। कुछ नहीं सूझा, तो 5 अक्टूबर, 2017 को राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के जरिये जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगवा दिया गया और प्रदर्शन के स्थान को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसने जुलाई 2018 में इस प्रतिबंध आदेश को रद्द कर जंतर मंतर को फिर से बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि “पूर्ण प्रतिबंध समाधान नहीं है और नागरिकों के विरोध करने के अधिकार और निवासियों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखते हुए जरूरी नियम तय किये जा सकते हैं।“ इस फैसले के बाद, दिल्ली पुलिस ने प्रतिभागियों की संख्या पर सीमा सहित कुछ शर्तों के साथ जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन की अनुमति दे दी। बड़ी आमसभाओं के लिए रामलीला मैदान तय कर दिया गया। हाल के शानदार आन्दोलनों के बाद मोदी-शाह ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को जरिया बनाया। उसने केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति का हवाला देते हुए जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध स्थलों की सूची से हटा दिया। अब संसद को अपनी बात सुनाने वालों को रामलीला मैदान या उत्तर दिल्ली के बुराड़ी मैदान या फिर पूर्वी दिल्ली के शाहदरा में कड़कड़डूमा कोर्ट के पास बने सीबीडी ग्राउंड शाहदरा जाना होगा।
संसद से 23-24 किलोमीटर दूर बुराड़ी के बियाबान का निर्धारण बताता है कि विडम्बनाओं की भौगोलिकता भी होती है। बुराड़ी की तय की गयी जगह से महज दो-तीन किलोमीटर दूर कूड़े-कचरे के विराट ऊंचे पहाड़ खड़े हुए है : इतनी दूर और ऐसी जगह का निर्धारण संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति और असहमति, विरोध और प्रतिरोध के बुनियादी अधिकार के प्रति मोदी सरकार के द्वेष की काव्यात्मक प्रस्तुति है। इन नई जगहों के चयन और निर्धारण से मोदी निजाम ने तानाशाही के लिए जाने जाने वाले पाकिस्तान को भी पीछे छोड़ दिया। इस्लामाबाद में भी प्रदर्शन इत्यादि के लिए निर्धारित स्थान डी-चौक संसद से मात्र 700 मीटर की दूरी पर है। दूसरी जगह सेक्टर एच-9 भी बुराड़ी से आधी दूरी पर है।
प्रसंगवश यह याद दिलाना सामयिक होगा कि निषेध की यह प्रवृत्ति सिर्फ जंतर मंतर के मामले में नहीं है। देश भर में अमल में लाई जा रही है। हर प्रदेश की राजधानी में लोगों के जमा होने, जलूस, प्रदर्शन, सभा करने की सौ-पचास बरस से चली आ रही परम्परागत जगहों को अवाम से छीन लिया गया है। हर शहर में सभाओं और प्रदर्शनों के आम स्थान हुआ करते थे, इनमे से अनेक तो स्वतंत्रता आन्दोलन के जमाने से चले आ रहे थे। बिना किसी अपवाद के इन सबको प्रतिबंधित किया जा चुका है। इनकी जगह पर जो नए स्थान तय किये गए हैं, वे नागरिक आबादी से मीलों दूर सुनसान और बियाबान में हैं और इतने बड़े मैदान हैं कि उनमें आम नागरिक संगठन इकट्ठा होने के बारे में सोच भी नहीं सकते। इतना ही नहीं, इन मैदानों के इस्तेमाल की कीमतें भी इतनी हैं कि जनता के लिए उनके बारे में सोचना भी कठिन है। जैसे दिल्ली की ही इन नई तीनों जगहों का एक रोज किराया रामलीला मैदान के लिए सवा लाख रूपये. बुराड़ी के लिए एक लाख और सीबीडी ग्राउंड के लिए एक से लेकर तीन लाख रूपये है। ये शुरुआती किराया है : इनके अलावा इससे कोई डेढ़ से दोगुना खर्च अलग से हैं । यह कहानी सिर्फ दिल्ली की नहीं, देश भर में असहमति और विरोध की आवाज उठाना कीमती और इस तरह सचमुच की आम जनता के लिए उसकी पहुँच से बाहर कर दिया गया है। बंदिशें और भी हैं, जैसे कई प्रदेशों में अनुमति के लिए ढेरों शर्तें लगा दी गयी हैं। जैसे मध्यप्रदेश में ऑनलाइन पूर्वानुमति के आवेदन में 65 प्रश्न हैं और इनमें शामिल होने वाले लोगों की एकदम सटीक संख्या, वे जिन वाहनों से आ रहे हैं, उनके नम्बर्स, जिन पुलिस थानों के इलाकों से आ रहे हैं, उनके थाना इंचार्जों को सूचना, लगाए जाने वाले नारों और दिए जाने वाले भाषणों की जानकारी आदि-आदि तक शामिल हैं। इतना ही नहीं, इनमे से किसी का भी ‘उल्लंघन’ होने पर दंडात्मक कार्यवाही की भी चेतावनी है। एक और फिनोमिना है, जो भाजपा राज में लगभग नियम बन गया है और वह है ‘जनरल डायर फिनोमिना’ : पहली फुरसत में लाठीचार्ज – तनिक सा बहाना मिलते ही गोलीचालन!! कुल जमा ‘यही है रस्म कि कोई न सर उठाके चले’।
मीडिया पहले ही हड़पा जा चुका था। साहित्य और किताबों के प्रति हिटलर-मुसोलिनी के वंशजों का रवैया क्या है, यह बंगाल के पूजा उत्सव में लगी बुकशॉप्स को जलाकर उदाहरण पेश किया जा चुका है। बची थी इकट्ठा होकर नारे लगाने, धरना देने की कुछ जंतर मंतर जैसी जगहें, सो उन्हें भी छूमंतर करके लोकतंत्र की कपाल-क्रिया का बंदोबस्त किया जा रहा है। कुछ बातें शब्दों में नहीं, दूरियों में भी बयान होती हैं : संसद द्वार से जंतर मंतर वाया बोट क्लब से बुराड़ी तक की यात्रा हुकूमत के बढ़ते अलगाव की यात्रा है। जैसे-जैसे सरकार और अवाम की दूरी बढ़ती गयी, वैसे-वैसे उसके खिलाफ आन्दोलन और प्रदर्शनों की जगहों की दूरियां भी बढ़ाई जाती रहीं। हुक्मरान भूल गए कि दर्पणों को खिसकाने से उनके चेहरों पर दर्ज अपराध छुपने वाले नहीं है। इस बार जो दरिया झूम के उट्ठे हैं, वे लाठियों और गिरफ्तारियों से टाले जा सकने वाले नहीं है। दुनिया की सबसे विशाल युवा आबादी वाले देश भारत के छात्र-युवा बिना जीते घर वापस जाने वाले नहीं है। लोकतंत्र बचाने के लिए सड़कों पर उतरने वालों की तादाद हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रही है। किसान संगठनों के साझे मंच संयुक्त किसान मोर्चे ने करनाल में हुई अपनी बैठक में एसआईआर के खिलाफ 23 अक्टूबर को देश भर में एक साथ प्रदर्शनों का आव्हान किया है। धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक राजनीतिक दलों के समन्वय इंडिया ब्लाक ने 1 नवम्बर को दिल्ली में लाखों हिन्दुस्तानियों की भागीदारी वाली रैली का एलान किया है। तय है कि बात निकली ह, तो अब अंजाम तक पहुंचाने तलक जायेगी।

