
तथा डीन, पालि एवं अन्य भाषा संकाय, नव नालंदा महाविहार, नालंदा है)
नालंदा/बिहार,प्रो. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” 06 अक्टूबर।भारत सरकार द्वारा पालि और प्राकृत के उत्कृष्टता केंद्रों की घोषणा के बाद बिहार के सामने निराशा में ठहर जाने का नहीं, अपनी ऐतिहासिक और अकादमिक शक्ति को नई राष्ट्रीय पहल में बदलने का समय है। पालि के लिए ओडिशा के केंद्रीय विश्वविद्यालय और प्राकृत के लिए गुजरात के केंद्रीय विश्वविद्यालय में उत्कृष्टता केंद्र घोषित हो चुके हैं। अब महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत सरकार नालंदा और वैशाली की विशिष्ट विरासत को देखते हुए नई राष्ट्रीय पहल करे। नालंदा को पालि के वैश्विक अध्ययन और अनुसंधान का तथा वैशाली को प्राकृत, जैन साहित्य और श्रमण परंपरा का राष्ट्रीय केंद्र बनाया जा सकता है।
पालि के संदर्भ में नव नालंदा महाविहार का नाम इसलिए सामने आता है कि यहां पालि बाहर से जोड़ा गया विषय नहीं, संस्था की मूल आत्मा का हिस्सा है। इसकी स्थापना 20 नवंबर , 1951 को बिहार सरकार ने की थी। उद्देश्य प्राचीन नालंदा की परंपरा में पालि और बौद्ध अध्ययन के उच्च अध्ययन तथा शोध के लिए आधुनिक केंद्र विकसित करना था। बाद में यह भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन आया और 2006 में इसे डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। आज यह संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन विशिष्ट विश्वविद्यालय है।
नव नालंदा महाविहार की पालि और बौद्ध अध्ययन की यात्रा पचहत्तर वर्षों की है। इन वर्षों में अध्यापन, शोध, ग्रंथ-संपदा, पुस्तकालय, पांडुलिपियों, प्रकाशन और देश-विदेश के विद्वानों से बने अकादमिक संबंधों ने सुदृढ़ संस्थागत परंपरा निर्मित की है। पचहत्तर वर्ष अर्जित अनुभव और ज्ञान की पूंजी हैं। पालि के किसी बड़े राष्ट्रीय केंद्र की योजना में इस पूंजी को आधार माना जाना चाहिए।
नव नालंदा महाविहार की प्रमुख उपलब्धियों में पालि त्रिपिटक का देवनागरी में 41 खंडों में प्रकाशन विशेष उल्लेखनीय है। भदंत भिक्षु जगदीश काश्यप के नेतृत्व में हुआ यह कार्य पालि बौद्ध साहित्य के मूल आधार-ग्रंथों को भारतीय पाठकों और शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा है। इन ग्रंथों की विद्वत् संस्थाओं में मांग और पुनर्मुद्रण की आवश्यकता भी इसकी उपयोगिता रेखांकित करती है। नालंदा के पास पालि अध्ययन के साथ प्रकाशन, शोध और ग्रंथ-संपदा का अनुभव भी है।
नालंदा की ऐतिहासिक स्थिति इस संस्थागत आधार को और अर्थ देती है। प्राचीन नालंदा विश्व की महान ज्ञान-परंपराओं में विशिष्ट स्थान रखता था। भारत और एशिया के अनेक क्षेत्रों से विद्यार्थी और विद्वान यहां आते थे। बौद्ध दर्शन, तर्क, भाषा और अनेक ज्ञान-विषयों का अध्ययन यहां होता था। आज इसके अवशेष विश्व धरोहर हैं। यही विरासत इसकी विशेष शक्ति है।
प्राकृत के लिए वैशाली का महत्व भी स्वाभाविक है। वैशाली प्राचीन भारत के प्रमुख श्रमण केंद्रों में रही है और जैन धर्म तथा प्राकृत की ज्ञान-संस्कृति से उसका गहरा संबंध है। इसलिए नालंदा और वैशाली को साझा राष्ट्रीय अकादमिक परिकल्पना में देखा जा सकता है। दोनों की भूमिकाएँ अलग हों, लक्ष्य एक हो: भारत की प्राचीन भाषायी और ज्ञान-परंपराओं को आधुनिक शोध, संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय संवाद से जोड़ना।
भारत सरकार को नालंदा में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पालि अध्ययन एवं अनुसंधान केंद्र स्थापित करना चाहिए। इसका आधार नव नालंदा महाविहार की विशेषज्ञता हो, लेकिन केंद्र की अपनी अकादमिक पहचान हो। इसी प्रकार वैशाली में प्राकृत, जैन साहित्य और श्रमण परंपरा के अध्ययन के लिए राष्ट्रीय केंद्र स्थापित किया जाए। ये घोषित उत्कृष्टता केंद्रों के प्रतिस्पर्धी विकल्प नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान-परंपरा को व्यापक बनाने वाली नई राष्ट्रीय पहल हों।
नालंदा केंद्र में पालि त्रिपिटक और अन्य पालि ग्रंथों के आलोचनात्मक संस्करण तैयार किए जाएँ। दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण और डिजिटलीकरण हो। पालि ग्रंथों के भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में उच्चस्तरीय अनुवाद किए जाएँ। पालि के साथ बौद्ध दर्शन, इतिहास, अभिलेख, पांडुलिपि-विज्ञान और एशियाई बौद्ध साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन विकसित किया जाए।
नालंदा को पालि का डिजिटल ज्ञान-केंद्र बनाया जा सकता है। पालि पांडुलिपियों और पुराने संस्करणों का डिजिटल संकलन हो, पालि कोश, पाठ-संग्रह और शोध-सामग्री विकसित की जाए। श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, जापान और अन्य बौद्ध देशों के विश्वविद्यालयों से अकादमिक सहयोग हो। विदेशी शोधार्थियों के लिए नालंदा पालि फैलोशिप में छह महीने, एक वर्ष और दो वर्ष की शोधवृत्तियाँ हों।
वैशाली में प्राकृत ग्रंथों का संरक्षण, संपादन, अनुवाद और डिजिटल अभिलेखीकरण हो। जैन साहित्य का गंभीर अध्ययन किया जाए और श्रमण परंपरा को भाषा, साहित्य, दर्शन, इतिहास और संस्कृति के विविध संदर्भों में देखा जाए। इससे वैशाली ऐतिहासिक स्मृति के साथ प्राकृत और जैन अध्ययन का जीवंत राष्ट्रीय केंद्र बन सकती है।
इस पूरी योजना में संस्कृति मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन तथा देश-विदेश के विश्वविद्यालयों को सहभागी बनाया जा सकता है। दोनों केंद्रों की स्थापना और मूल वित्तीय-संस्थागत जिम्मेदारी भारत सरकार की होनी चाहिए, ताकि इनका स्वरूप राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्त्व की दीर्घकालिक अकादमिक पहल का बने।
नव नालंदा महाविहार के पचहत्तर वर्ष इस प्रस्ताव के लिए विशेष अवसर हैं। उसकी पालि-परंपरा का मूल्यांकन हो, पुस्तकालय और प्रकाशनों की समीक्षा की जाए, दुर्लभ सामग्री का डिजिटलीकरण तेज हो और अगले पच्चीस वर्षों की अकादमिक योजना तैयार हो। पचहत्तर वर्षों की संस्थागत पूंजी को भविष्य की योजना में लगाना अधिक सार्थक होगा।
प्रश्न यह नहीं कि उत्कृष्टता केंद्र बिहार में क्यों नहीं आया। वह निर्णय हो चुका है। प्रश्न यह है कि नालंदा की पचहत्तर वर्षों की पालि-परंपरा और वैशाली की प्राकृत-जैन विरासत को भारत किस नई राष्ट्रीय दृष्टि से आगे बढ़ाएगा। नालंदा के पास संस्थागत आधार और शोध-संसाधन हैं; वैशाली के पास प्राकृत, जैन साहित्य और श्रमण परंपरा की असाधारण विरासत है।
भारत सरकार नालंदा में नव नालंदा महाविहार की 75 वर्षों की पालि-परंपरा को आधार बनाकर पालि के वैश्विक अध्ययन, शोध, संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय संवाद का राष्ट्रीय केंद्र स्थापित करे तथा वैशाली में प्राकृत और जैन साहित्य के विशिष्ट अध्ययन, शोध और संरक्षण के लिए राष्ट्रीय केंद्र बनाए। घोषित उत्कृष्टता केंद्र अपनी भूमिका निभाएँ; नालंदा और वैशाली अपनी ऐतिहासिक विशिष्टता के अनुरूप नई भूमिका ग्रहण करें।
तब बिहार अतीत के गौरव का केवल स्मरण करने वाला प्रदेश नहीं रहेगा। वह अपनी ऐतिहासिक विरासत को आधुनिक ज्ञान-व्यवस्था में रूपांतरित कर सकेगा। नालंदा पालि के वैश्विक अध्ययन का प्रमुख केंद्र और वैशाली प्राकृत तथा जैन साहित्य का विशिष्ट अध्ययन-केंद्र बने, तो यह भारत की ज्ञान-परंपराओं के भविष्य के लिए नई शुरुआत होगी।
