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संतों के दर्शन से प्रारब्ध मिट जाता है : जीयर स्वामी जी महाराज

जीयर स्वामी जी के दर्शन के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, भक्ति सत्संग की बह रही सरिता।

दिनारा/रोहतास (डॉ अजय ओझा, वरिष्ठ पत्रकार) 31 मई। मउडीहरा गांव में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ में श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज के दर्शन तथा उनका प्रवचन सुनने के लिए श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ पड़ी है। श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पूज्य श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि नैतिकता के अभाव में धन बोझ हो जाता है। धर्म का मतलब रात दिन मंदिर में बैठना नहीं होता है। कर्म ज्यादा महत्वपूर्ण है। कर्म ही योग है। यह शरीर पंचतत्वों से निर्मित है। देवताओं द्वारा संचालित यह सृष्टि किसी को दुख देता है तो किसी को सुख। स्वामी जी ने कहा कि लोगों को पापी से घृणा नहीं करना चाहिए पाप से घृणा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुराचारी व्यक्ति भी अगर भगवान की चिंतन करता है तो उसका भी उद्धार हो जाता है। जैसे महर्षि वाल्मीकि डाकू होने के बावजूद राम नाम का जाप करने के कारण संत बन गए।

स्वामी जी ने कहा कि व्यक्ति अपने कर्म के अनुसार शुभ और अशुभ फल प्राप्त करता है। लेकिन प्रारब्ध के कारण कभी कभी उसे शुभ फल का भी अशुभ फल प्राप्त हो जाता है। संतों के दर्शन से प्रारब्ध मिट जाता है और पिछले जन्मों के पाप से मुक्ति मिल जाती है। संतों के साथ सत्संग करना सर्वश्रेष्ठ भक्ति है। तीर्थ, मंदिर में गलत करने पर दंड का भागी होना पड़ता है। जीव के जन्म लेते ही उसका सुख दुख हानि लाभ जीवन मरण सब तय हो जाता है। प्रारब्ध और होनी को टाला नहीं जा सकता। लेकिन अच्छा काम करने से उसका असर कम किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि मूर्ति पूजा का विरोध उचित नहीं है। मूर्ति पूजन का विरोध करने वाले स्वयं मूर्ति पूजा में व्यस्त रहते हैं। मूर्ति पूजा शास्त्र सम्मत है। स्वामी जी ने कहा कि भावना से भक्ति होती है। जाको रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। शास्त्रों के आधार पर गलत व्याख्या कर दुष्प्रचार नहीं करना चाहिए। असत्य के रास्ते पर चलने से रोकना धर्म है।
मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार शुभऔर अशुभ फल प्राप्त करता है, किंतु प्रारब्ध के प्रभाव से कई बार शुभ कर्मों का परिणाम भी विपरीत प्रतीत होता है। ऐसे समय में धैर्य खोने के बजाय धर्म, सत्य और सङ्कर्म के मार्ग पर अडिग रहना ही जीवन की सबसे बड़ी साधना है। अपने ओजस्वी एवं भक्तिरस से ओत-प्रोत प्रवचन में स्वामी जी ने कहा कि भगवान की शरण में आने वाला कोई भी व्यक्ति कभी निराश नहीं होता। स्वामी जी ने कहा कि नैतिक मूल्यों से विमुख होकर अर्जित किया गया धन अंततः मनुष्य के लिए बोझ और चिंता का कारण बनता है। धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल पूजा पाठ अथवा मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना ही सच्चा धर्म है। श्रद्धालुओं को धर्म और लोककल्याण की प्रेरणा देते हुए स्वामी जी ने महर्षि नारद का प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने कहा कि नारद मुनि को सृष्टि का प्रथम पत्रकार कहा जाता है। तीनों लोकों में उनकी निर्बाध पहुंच थी और देवता, दानव तथा मनुष्य सभी उनका सम्मान करते थे। आजकल के पत्रकारों को देवर्षि नारद मुनि का अनुकरण करना चाहिए।

उधर काशी से पधारे कथावाचक पूज्य पंडित विश्वकांताचार्य जी महाराज ने श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के चौथे दिन कथा का विस्तार करते हुए हिरण्यकशिपु और उसके पुत्र भक्त प्रह्लाद के प्रसंग का संगीतमयी वर्णन करते हुए कहा कि यह कथा असुरों के राजा के अहंकार, एक बालक की अटूट भक्ति और भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार के माध्यम से धर्म की स्थापना का प्रतीक है। हिरण्यकशिपु और उसका भाई हिरण्याक्ष, वैकुण्ठ धाम के द्वारपाल जय और विजय थे। सनकादि ऋषियों के श्राप के कारण उन्हें पृथ्वी पर असुर कुल में जन्म लेना पड़ा। अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु का बदला लेने के लिए हिरण्यकशिपु ने मंदराचल पर्वत पर घोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे अजेय होने का वरदान दिया जिसके अनुसार वह किसी से भी अवध्य हो गया। वरदान पाकर वह अहंकारी हो गया और स्वयं को भगवान मानने लगा। उसने तीनों लोकों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता द्वारा लाख समझाने और असुर गुरुओं द्वारा पढ़ाने पर भी प्रह्लाद की हरि भक्ति कम नहीं हुई। एक दिन क्रोध में आकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा कि तेरा भगवान कहाँ है ? प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि वे सर्वव्यापी हैं और इस खंभे में भी मौजूद हैं। अहंकार में आकर हिरण्यकशिपु ने अपनी गदा से खंभे पर प्रहार किया। खंभा टूट गया और उसमें से भगवान विष्णु नरसिंह अवतार (आधा मनुष्य, आधा सिंह) के रूप में प्रकट हुए।संध्या समय गोधूलि बेला में, महल के दरवाजे की देहरी (न अंदर न बाहर), भगवान ने उसे अपनी जांघों पर लिटाकर (न भूमि न आकाश) अपने नाखूनों से (न अस्त्र न शस्त्र) हिरण्यकशिपु का वध कर दिया और प्रह्लाद को बचाया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि अहंकार कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः भक्ति और धर्म की ही विजय होती है। विश्वकांताचार्य जी ने मधुर वाणी में समुद्र मंथन, श्री वामन अवतार, श्री रामकथा और सूर्य वंश तथा चंद्र वंश की कथा सुनाई जिसे सुनकर श्रद्धालुगण भावविभोर हो गये। वास्तव में आजकल मउडिहरा में भक्ति और सत्संग की सरिता बहन रही है। मौके पर ज्ञान यज्ञ समिति के अध्यक्ष महेन्द्र नाथ ओझा, दीनानाथ ओझा, शोभनाथ ओझा, देवेन्द्र ओझा, भूलन ओझा, ललन ओझा, शत्रुघ्न जी, नागेन्द्र दुबे, रामापति ओझा, गुड्डू ओझा, बड़क पासवान तथा मीडिया प्रभारी डॉ अजय ओझा उपस्थित थे।

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