
भोपाल/ मध्यप्रदेश ( डॉ. मयंक चतुर्वेदी )28 मई।महापुरुष कभी इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं रहते, वे राष्ट्र की धमनियों में प्रवाहित होते हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में यदि किसी व्यक्तित्व ने क्रांतिकारी तेज, वैचारिक निर्भीकता, संगठन क्षमता और वैज्ञानिक दृष्टि का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया तो वह विनायक दामोदर सावरकर का नाम है। अंग्रेज उनसे इतने भयभीत रहे कि उन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
वे क्रांतिकारी, चिंतक, इतिहासकार, साहित्यकार, समाज सुधारक और राष्ट्रवादी विचारक सभी गुणों की खान थे। उनका जीवन संघर्ष, त्याग, वैचारिक स्पष्टता और राष्ट्र समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है जो आज भी देशभक्तों को ऊर्जा से भर देता है ।
हम जब उनके जीवन से जुड़े इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो ध्यान में आता है कि 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के भगूर में जन्मे सावरकर ने बहुत छोटी आयु में ही देशभक्ति का मार्ग चुन लिया था। किशोरावस्था में उन्होंने ‘मित्र-मेला’ नामक संगठन बनाकर युवाओं में राष्ट्रीय चेतना जगानी शुरू कर दी। 1901 में उन्होंने नासिक में महारानी विक्टोरिया की शोकसभा का बहिष्कार कराया और 1902 में एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण समारोह का विरोध किया। 1904 में उन्होंने ‘अभिनव भारत’ की स्थापना की।
1905 के बंग-भंग आंदोलन में उन्होंने युवाओं का नेतृत्व किया और विदेशी वस्त्रों की होली जलाने वाले पहले भारतीय बने। फिर जब 1906 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के प्रयासों से उन्हें छात्रवृत्ति मिली और वे कानून की पढ़ाई के लिए लंदन पहुंचे। वहां उन्होंने ‘फ्री इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना की। लंदन में रहते हुए उन्होंने भारतीय विद्यार्थियों और क्रांतिकारियों को संगठित किया। उनके संपर्क में लाला हरदयाल, मैडम भीकाजी कामा, मदनलाल धींगड़ा और अन्य कई क्रांतिकारी आए।
इसी दौरान उन्होंने ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक ऐतिहासिक ग्रंथ लिखा। इस पुस्तक ने अंग्रेजों द्वारा “सिपाही विद्रोह” कहे जाने वाले 1857 के संघर्ष को “भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” सिद्ध किया। ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रकाशित होने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। बाद में यह पुस्तक हॉलैंड से प्रकाशित हुई और क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।
मदनलाल धींगड़ा और क्रांतिकारी चेतना
1909 में जब मदनलाल धींगड़ा ने अंग्रेज अधिकारी कर्जन वायली की हत्या की, तब सावरकर ने खुलकर उनका समर्थन किया। उन्होंने लंदन टाइम्स में लेख लिखकर इसे न्यायोचित ठहराया। अंग्रेज सरकार के विरोध के बावजूद उन्होंने धींगड़ा के अंतिम वक्तव्य को युवाओं तक पहुंचाया। इससे ब्रिटिश सरकार की आंखों में वे और अधिक खटकने लगे।
कालापानी : यातना के बीच अदम्य साहस
1910 में उन्हें गिरफ्तार कर भारत लाया गया। फ्रांस के मार्सेई बंदरगाह पर उन्होंने समुद्र में छलांग लगाकर भागने का प्रयास भी किया, किंतु पुनः पकड़े गए। उन पर मुकदमा चला और उन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। 1911 से 1921 तक वे सेल्युलर जेल में बंद रहे। कालापानी की अमानवीय यातनाएं उनके जीवन का सबसे कठिन अध्याय थीं। उन्हें कोल्हू में बैल की तरह जोता जाता था। भोजन अल्प मिलता, कोड़े बरसाए जाते, परंतु हर प्रहार के साथ उनकी आवाज गूंजती, “वंदे मातरम्”। जेल की दीवारों पर कीलों और नाखूनों से कविता और साहित्य रचना करने वाला यह अदम्य व्यक्तित्व वास्तव में अद्वितीय रहा है।
सामाजिक सुधार और वैज्ञानिक दृष्टि
वस्तुत: सावरकर को सिर्फ हिंदुत्व का नेता मान लेना उनके व्यक्तित्व का अधूरा आकलन होगा। वे प्रखर बुद्धिनिष्ठ और विज्ञानवादी चिंतक थे। रत्नागिरी में नजरबंदी के दौरान उन्होंने अस्पृश्यता और जातिभेद के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाया। उन्होंने पतितपावन मंदिर की स्थापना कर सभी जातियों के लिए मंदिर प्रवेश का मार्ग खोला। उनका स्पष्ट मानना था कि समाज का निर्माण विज्ञान और तर्क के आधार पर होना चाहिए।
वे आजीवन अंधविश्वास, रूढ़ियों और कर्मकांडों के विरोधी रहे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि कोई भी धर्मग्रंथ अपरिवर्तनीय नहीं हो सकता। गो-पूजा, यज्ञ और ईश्वरवाद जैसे विषयों पर उन्होंने निर्भीकता से प्रश्न उठाए। उनका मानना था कि समाज को आगे बढ़ने के लिए विज्ञानवाद अपनाना होगा। वे कहते थे—“ईश्वरवाद बुद्धि के सही प्रयोग में बाधा बनता है।”
हिंदुत्व की अवधारणा
1923 में लिखे गए उनके ग्रंथ ‘हिंदुत्व’ ने भारतीय राजनीति और समाज को नई वैचारिक दिशा दी। सावरकर ने हिंदुत्व को सिर्फ धार्मिक पहचान नहीं दी, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी परिभाषा थी-
“आसिंधु सिंधुपर्यंतं यस्य भारतभूमिका।
पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरितिस्मृतः॥”
अर्थात जो व्यक्ति भारतभूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है, वही हिंदू है। उनका हिंदुत्व मूलतः सांस्कृतिक राष्ट्रभाव की अवधारणा थी। वे मानते थे कि अंततः समस्त मानवता एक है। उनका कथन है, “जब तक संसार में मुसलमानत्व और ईसाइत्व रहेगा, तब तक मेरा हिंदुत्व रहेगा; उसके बाद वह मनुष्यत्व में विलीन हो जाएगा।”
आजाद हिंद फौज के प्रेरणास्रोत
इतिहास के गंभीर अध्येताओं का मानना है कि सावरकर की सैन्य दृष्टि और ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ आजाद हिंद फौज की वैचारिक नींव बने। उन्होंने युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया ताकि वे युद्ध कौशल सीख सकें। बाद में यही प्रशिक्षित भारतीय सैनिक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज की शक्ति बने। 1944 में नेताजी ने स्वयं कहा था कि जब कांग्रेस भारतीय सैनिकों को “भाड़े का सैनिक” कह रही थी, तब वीर सावरकर युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित कर रहे थे।
साहित्य, भाषा और वैचारिक विरासत
सावरकर असाधारण साहित्यकार भी थे। उन्होंने इतिहास, राजनीति, समाज और संस्कृति पर हजारों पृष्ठ लिखे। ‘हिंदूपदपादशाही’, ‘माझी जन्मठेप’ और ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ उनकी प्रमुख कृतियां हैं। वे संस्कृतनिष्ठ हिंदी के समर्थक थे और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को स्थापित देखना चाहते थे। उनका प्रभाव भगत सिंह सहित अनेक क्रांतिकारियों पर पड़ा। भगत सिंह ने स्वयं स्वीकार किया था कि सावरकर की रचनाओं ने उनके जीवन को प्रभावित किया।
अंतिम वर्षों तक राष्ट्रचिंतन
स्वतंत्रता के बाद भी सावरकर राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रश्नों पर सक्रिय रहे। उन्होंने सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और वैज्ञानिक दृष्टि पर निरंतर लेखन किया। अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि उनके अंतिम संस्कार में कोई धार्मिक कर्मकांड न किया जाए और विद्युत शवदाह गृह में उनका दाह संस्कार हो।
वस्तुत: इस तरह से उन्होंने अपने जीवन से सिद्ध किया कि राष्ट्र निर्माण में जितना संघर्ष आवश्यक है उतना ही विचार, संगठन, त्याग और साहस की भी आवश्यकता होती है। आज भी जब भारत आत्मगौरव, सांस्कृतिक पहचान और आधुनिकता के बीच संतुलन खोज रहा है, तब वीर सावरकर का जीवन और चिंतन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनकर सामने आता है। वे आज हमारे लिए इतिहास का कोई अध्याय न होकर राष्ट्रचेतना की अखंड ज्योति के रूप में विद्यमान हैं, जो हर वक्त, किसी न किसी कोने में, किसी देशभक्त को उसके जीवन का ध्येयपथ दिग्दर्शन करा रही होती है, जिसमें भारत का हित ही सर्वोपरि है।
