
RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)19 मई। ख्याति प्राप्त लेखक,कवि, व्यंग्यकार,समीक्षक,अनुवादक डॉ कृष्ण दयाल सिंह की पहली और दूसरी पुस्तक यत्र तत्र और अनायास की रचनाएं प्रकाशित की जा चुकी है।लेखक की तीसरी रचना” यथावत” है जिसका प्रकाशन किया जाना है ,इससे पूर्व उनकी पुस्तक “यत्र तत्र” और “अनायास” पर कई नामी साहित्यकारों और संस्थाओं द्वारा पत्रों के माध्यम से अपनी अपनी सकारात्मक टिप्पणियां भेजी है।
प्रिय श्री कृष्ण दयाल सिंह ‘यत्र-तत्र’ पढ़ने से लगा
बड़ी सी
सफेद चादर पर
काली चीटीं
खोज रही है
सफेद चीनी का दाना
दोड़ रही है
दाँये से बाँये
ऊपर से नीचे
बना रही है
आकृक्तियाँ
और रेखाएँ
बस सुख ले रही है
सफेद में
सफेद को
खोजने का…
प्रो० एस०शर्मा (कला एवं शिल्प महाविद्यालय,पटना)
(प्रतिलिपि)
प्रेषक :
प्राचार्य,
डाक प्रशिक्षण केन्द्र, दरभंगा ।
सेवा में,
निदेशक (राजभाषा),
डाक विभाग, डाक भवन,
नयी दिल्ली : ११० ००१
सं०: हिन्दी/अनु/पुस्तक/पत्रिका/८३
दिनांक: ११.११.१९९२
विषय : हिन्दी में मौलिक पुस्तकें लिखने के लिए “इन्दिरा गाँधी पुरस्कार” वर्ष १९९१-९२
संदर्भ : आपका पत्रांक ई-२००१८/१/९२-रा. भा. दिनांक २०,१०.९२
महोदय,
उक्त संदर्भ में यह निवेदन है कि इस कार्यालय के प्राध्यापक श्री कृष्ण दयाल सिंह ने हिन्दी में एक मौलिक पुस्तक लिखा है । पुस्तक का नाम “यत्र-तत्र” है । “इन्दिरा गाँधी पुरस्कार” के लिए चयन हेतु इस पाण्डुलिपि पुस्तक की तीन प्रतियाँ भेजी जाती हैं। आशा है चयन में स्थान देकर असीम यश के भागी बनेंगे ।
अनुलग्नक : ३ (तीन)
भवदीय
(एम० कुमार)
प्राचार्य, डाक प्रशिक्षण केन्द्र, दरभंगा
मिथिलेश्वर
महाराजा हाता, कतिरा,
आरा ८०२ ३०१ बिहार
दिनांक : १९.४.१९९४
बंधुवर
दिनांक ९.४.१९९४ के आपके पत्र के साथ “यत्र-तत्र” नामक आपके कविता-संग्रह की पाण्डुलिपि मिली। इस वय में आपका यह उत्साह और साहित्य के प्रति आपकी ऐसी निष्ठा से मुझे हार्दिक खुशी हुई। मेरा साधुवाद स्वीकारें ।
इस संकलन में विभिन्न विषयों पर आधारित आपकी कविताओं को पढ़ने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि आपमें सृजन की क्षमता और प्रतिभा है, लेकिन उसका सम्यक विकास और उपयोग आपने नहीं किया । लगता है डाक विभाग की नौकरी की व्यस्तता के बीच साहित्य-सृजन के लिए पर्याप्त समय आप नहीं निकाल सके । सवाल सिर्फ लिखने का ही नहीं, उस लिखे को एक स्वरूप देने और समग्रता में उसे दृष्टि सम्पन्न बनाने का होना चाहिए ।
आपका प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय एवं प्रशंसनीय है। मेरी समस्त हार्दिक बधाईयाँ और तमाम मंगल कामनायें आपके साथ हैं।
सप्रेम !
आपका,
(मिथिलेश्वर)
प्रति
श्री कृष्ण दयाल सिंह,उपाधीक्षक रेल डाक सेवा, पटना-८०० ००४
तारामंडल
आरसी प्रसाद सिंह
फोन : ५७७३१
रोड नं० १३ बी०,
राजेन्द्र नगर, पटना : ८०० ०१६
डॉ० कृष्ण दयाल सिंह की कविताओं का संकलन “यत्र-तत्र” पढ़कर मुझे सद्भावनाओं का एक शीतल, सुखद स्पर्श का सुख मिला । प्रस्तुत काव्य की मुख्य धारा में परम्परागत संवेदनाओं का संदेश है और कुछ नये अनुभव भी । “महाभारत” से भी प्रेरणा मिली है और कुछ इधर-उधर से भी । अतः “यत्र-तत्र” नाम की सार्थकता सिद्ध होती है। डॉ० कृष्ण दयाल सिंह डाक विभाग में सेवारत हैं, इसलिए अपने कार्य क्षेत्र से जुड़े उनके अनुभव बहुत सटीक उतरे हैं । कुल मिलाकर “यत्र-तत्र” की सारी कविताओं का विषय मानव-कल्याण की भावनाओं से ओत-प्रोत है। जो पाठक भाषा, छन्द एवं व्याकरण संबंधी रचना पर ध्यान न देकर सद्भावनाओं की अनुभूतियों में तल्लीन होना जानते हैं, वे इन कविताओं में विशेष रूचि लेंगे ।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं “यत्र-तत्र” के सद्भावक कवि कृष्ण दयाल सिंह के प्रति अपनी हार्दिक शुभकामना व्यक्त करता हूँ। आशा है कि इस काव्य के सहृदय पाठक भी कविता माधुरी का रसपान कर संतृप्त होंगे ।
पटना : ३० अप्रैल, ९४
आरसी प्रसाद सिंह
प्रिय श्री सिंह
श्री कृष्ण दयाल सिंह, सहायक निदेशक (स्टाफ), बिहार सर्किल, पटना द्वारा लिखित विभिन्न प्रकार की कविताओं का संग्रह “यत्र-तत्र” की पाण्डुलिपि देखने का अवसर मिला । जैसा कि नाम से यह स्पष्ट है, जब जहाँ-कहाँ से भाव प्रवणता के छांटे मिले, कवि ने उन्हें अपनी कविताओं में आबद्ध करने की कोशिश की है। कहीं स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन-चरित्र को तो कहीं उनके आदर्शों को चित्रित करने का प्रयास किया है। वहीं रामायण व महाभारत के पात्रों के माध्यम से कुछ कहने का प्रयास किया गया है तो कहीं-कहीं कवि की स्वयं की व्यथा ने भी अभिव्यक्ति देने की कोशिश की है। कुल मिलाकर कवि ने जो प्रयास किया है, उसमें सार्थक सफलता की आत्मा दिर्शी पड़ती है । कविता छप कर जब तैयार होने लगेगी तो मुझे उम्मीद है कि भाषाई कसाब भी आने की गुंजाइश होगी ।
मैं कवि के नव प्रयास का, उनके उभरते उत्साह का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ और कवि कोई और नयी चीज हमें दे सकें, उसकी भी मैं मंगल कामना करता हूँ ।
ह०/-
(डॉ० गिरिवरधारी सिंह)
दिनांक : १४ अगस्त, १९९५ निदेशक (राजभाषा)
संचार मंत्रालय, डाक भवन, भारत सरकार, नयी दिल्ली
विष्णु दत्त राकेश प्रोफेसर तथा अध्यक्ष हिन्दी विभाग गुरूकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार(उत्तरांचल)
बंधुवर,
नमस्कार। ‘अनायास’ की प्रति आनायास मिली। धन्यवाद। आपकी रचानाशीलता से प्रभावित हुआ। जीवन की विकृतियों से रूबरू होना ही साहित्यकार की नियति है और उनके संहार के लिए कलम उठाना उसका पुरूषार्थ है। आप यह कार्य सुचारू रूप से कर रहे हैं। निरन्तर लिखते रहिए। नई पीढ़ी को मार्ग दर्शन चाहिए। आशा है, प्रसन्न हैं।
हरिद्वार
01.05.02
सप्रेम
आपका विष्णु दत्त राकेश
“आज” शनिवार 28 मार्च 1998 (दृष्टि-साहित्य) के विचार-पुस्तक परिचय में।
‘यत्र-तत्र’ में सर्वत्र की कवितायें
लोग लिखने की शुरूआत तो स्वतः सुखाय ही करते हैं पर धीरे-धीरे आसपास की संवेदनाओं से जुड़ते हुए न केवल आपनी रचनाओं की परिपक्वता देते हैं बल्कि एक ऊँचाई भी।
डा० कृष्णा दयाल सिंह रचित ‘यत्र-तत्र” नामक काव्य संग्रह से गुजरा जाय तो आप पायेंगे कि स्वांतः सुखाय ही कवि का मकसद रहा है। मंच तथा पत्रिकाओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर कविताएं लिखी गयी हैं। अनिश्चित कालीन डाक हड़ताल या डा० लोहिया, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद जैसे महापुरूषों पर लिखी कविताएं कुछ ऐसा ही अहसास कराती हैं। इस संग्रह में शामिल पचास से अधिक कविताएं कवि की भाषा पर पकड़, भावों की संप्रषित करने की क्षमता को प्रदर्शित करती हैं।
संग्रह की शुरूआत प्रार्थना से हुई है। देशभक्ति की भावना से प्रेरित तिरंगा झंडा, राष्ट्रगीत, एकता, सांप्रदायिक मेल जैसी कविताएं है तो गांधी दर्शन एवं गाँधी विचार भी इनकी लेखनी से उतरी है। गांधी दर्शन की चार पंक्तिया बताती है कि अपने सामाजिक परिप्रेक्ष्य पर कवि की पैनी नजर है “विश्व बैंक के कर्जेका, अब तक हम मुहताज नहीं रहते। अपनी पूंजी आपना हुनर, इससे ही बस काम चलाते”।
कवि का व्यंग्य बोध “नेता चरित्रम्” एवं ‘जनप्रतिनिधि’ में देखने को मिलता है “नेता चरित्रम्” में कहा गया है ‘पहले सबकी सेवा नेता करते थे, अब करते सब उनकी, घर डूबा कुछ राहत भेजो, कैसी बातें करते सनकी। इसी तरह ‘जनप्रतिनिधि’ में कहा गया है’ हे मेरे मतदाता, मुझको एक बार संसद पहुंचाते। तो मैं बहलाने का हर रहस्य पा जाता और जनप्रतिनिधि कहलाता”। इसी तरह समाजिक समस्याएं भी मुखरित हुई हैं। दहेज का फल, सती प्रथा, नारी अपहरण आदि कविताएं इसके उदाहरण हैं। धार्मिक भावना से प्रेरित संक्षिप्त महाभारत, भीष्म, द्रोपदी आदि कविताएं भी है।
सबसे बड़ी बात यह है कि कवि डाक विभाग में नौकरी की एवं यह विभाग कभी साहित्य में नहीं आ सका तो इस विभाग पर भी कवि ने कविताएं लिखी है। बैरंग चिट्ठी, डाकघर, डाक जीवन बीमा, आर०एम०एस०, जिला योग छटाँई आदि कविताएं इसके प्रमाण हैं। कुल मिलाकर इस संग्रह में तरह-तरह के विषयों एवं भावों की कविताएं है। कवि ने सर्वत्र नजर डाली है इसलिए संग्रह का नाम भी ‘यत्र तत्र’ रखा गया है। अगर संपूर्णता में कहा जाय तो मिथिलेश्वर की यह पंक्ति सटीक लगती हैं, सृजन की क्षमता और प्रतिभा है लेकिन उसका सम्यक विकास और उपयोग आपने नहीं किया।
(अजय)
आज शनिवार 6 फरवरी 1999 (दृष्टि-साहित्य) के विचारनये प्रकाशन में
अनायास
‘आनायास’ डा० कृष्ण दयाल सिंह के नाटकों और कहानी का संग्रह है। इस संग्रह में डा० सिंह के तीन लघु नाटक ‘गुलसिता’ “नातागिरी” और ‘नववर्ष’ तथा एक कहानी ‘पहिल रोपना’ एवं काव्य- एकांकी ‘थैला-पैसा द्वन्द’ संकलित है। डा० सिंह जमीन से जुड़े रचानाकार है। जीवन को उन्होनें जैसा देखा है और महसूसा है उसी को अपनी संवेदना की चासनी से सराबोर कर अभिव्यक्त किया हैं। उम्मीद है जिन लोगों की जिन्दगी को उनकी कलम ने स्पर्श की है उनके बीच यह संग्रह समाहृत होगा।
(राकेश प्रवीर)
अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन
43 ग्रीन एवन्यु, कोलार रोड़ पो० वाक्स न- 25
रविशंकर नगर भोपाल 462016
21.01.1999
प्रिय श्री कृष्णा दयाल सिंह,
आपकी पुस्तक ‘अनायास’ नाटक और कहानी संग्रह प्राप्त कर हार्दिक प्रसन्नता हुई। आपके नाटकों में यथार्थ और आधुनिक समाज की विसंगतियों को उजागर किया गया है। साहित्य को समाज का दर्पण माना गया है।
वर्तमान में हमारे समाज में जो भ्रष्टाचार और अनाचार दिखाई देता है उसका खुलकर विरोध करना साहित्यकार का परम दायित्व है।
आपके गुलसिताँ में शासन के चिकित्सालय में कार्यरत डा० अपने निजी स्वार्थ के लिए जो कुछ कर रहे है वह अक्षभ्य है और नेतागिरी के नाम पर अपने स्वार्थों की पूर्ती में संलग्न नेतागण किस प्रकार कर्मचारी संघों का दुरूपयोग कर रहे है उसकी अच्छी तसवीर नेतागिरी नाटक में मिलती है।
आशा है आप इसी प्रकार समाज सेवा के लिए साहित्य लिखते रहेंगे।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सतीश चतुर्वेदी
डा० कृष्ण दयाल सिंह
वशिष्ट पुरी, पो० चन्दवा- 802301
जिला- भोजपुर (आरा), बिहार
डा० स्वर्ण किरण
संपादक ‘नालंदा दर्पण
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग,
किसान कॉलेज, सोहसराय (नालंदा)
3719/98, 30/03/98
11274/98, 21/12/98
श्रद्धेय भाई,
अनायास की प्रति कृपा पत्र के साथ अभी-अभी प्राप्त हुई।
अनेकशः धन्यवाद।
‘अनायास’ नाटक, काव्य एकांकी एवं कहानी के गुलदस्तों के रूप में स्वागत के योग्य हैं। लेखक एवं कवि की वर्षों की साध ना का यह फल है अतः इसे अनायास कहना बदलो व्याघात दोष मालूम पड़ता है। लेखक आज की गतिविधि एवं आज के वतावरण से दुःखी है। रचनाओं के माध्यम से दुःख निवारण लेखक का लक्ष्य है, ऐसा कहने में हिचक का अनुभव नहीं होता।
अनायास की चर्चा नगर में करूँगा।पूर्व की रचना ‘यत्र तत्र’ में आपके ‘कवि’ की छटपटाहट देखते बनती है। भाव प्रवणेता की दृष्टि से कविताएँ मूल्यवान है।
प्रतीक्षा विनीत
आपका अपना
स्वर्ण किरण
सेवा में –
डा० कृष्ण दयाल सिंह
नंदन कानन, वशिष्टपुरी
डाक० – चन्दवा, भोजपुर (आरा)
गिरिडीह
18/01/99
आदरणीय के० डी० बाबू,
प्रणाम।
एक दिन अनायास ही आपके द्वारा भेजी गई ‘अनायास’ की प्रति प्राप्त हुई। अद्योपान्त पढ़ा। लगता है जैसे दशकों से संचित निधि को आपने पन्नों पर उड़ेल दिया है। एक-एक रचना अपने उद्देश्य को प्रतिविम्बित करती प्रतीत होती है। आपकी उपलब्धि अत्यन्त प्रशंसनीय है।
स्नंहातुर
(हरेन्द्र सिंह)
सेवा में –
श्री के० डी० सिंह
(सेवा निवृत सहायक निदेशक, डाक विभाग)
वशिष्टपुरी, चन्दवा (आरा)
नंदन
नई पीढ़ी का सचित्र मासिक
हिन्दुसतान टाइम्स हाउस, 18-20 कस्तूरबा गाँधी मार्ग,
नई दिल्ली 110001
10 अप्रैल 1998
प्रिय डा० सिंह जी,
आपका कविता संग्रह “यत्र-तत्र मिला। रूचि के साथ पढ़ा। खास तौर से कुछ रचनाओं में कवि का आत्म अनुभव मुखरित हुआ है। जहाँ-तहाँ लोक गीतों का मिठास भी है।
प्रकाश्यान के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।
आपका
(जय प्रकाश भारती)
संपादक
सेवा में –
डा० कृष्ण दयाल सिंह सहायक डाक निदेशक (अवकाश प्राप्त)
बिहार परिमंडल, पटना 802301
