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तो क्या प्रशासन के एक तरफा निर्णय को कंठ तक यूँ ही उतर जाने दूँ…… : अनायास

RKTV NEWS/आरा ( भोजपुर)06 मई।“नेतागिरी” लेखक डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित उनकी नाटक और कहानी संग्रह”अनायास” की दूसरी रचना है। जिसमें लेखक ने संगठन के नेतृत्व क्षमता और नियोक्ता की कार्यवाहियों की साकारात्मक रूप से विवेचना की है।

नेतागिरी(नाटक)

नेपथ्य से
पहले सबकी सेवा नेता करते थे, अब करते सब उनकी ।

सही नेता वही है बन्दो,जो दुर्दिन में साथ रहेगा;अपने पहले ही जो
हम सब की बात कहेगा ।

(दृश्य-डाक कर्मचारी संघ का कार्यालय)

मूलचन्द -सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।

राकेश-बस, बस बन्द करोगे भी या अप्राप्य साधन स्रोत का फौव्वारा ही बिखेरते रहोगे ?

विमलेश-भूल जाओ इन आदर्शों को। ब्रह्माण्ड से धरती पर पैर रखो आज जमाना “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” का है। क्यों राकेश मेरी बातों में तुम्हारी सहमति है न ?

सीमा-क्यों राकेश को अपने बीच डालकर कुछ प्रभावित कर भी सकोगे क्या ?

मूलचन्द -तुम्हारी बातों से तो कुछ कडुआहट का आभास हो रहा है, सीमा ।

सीमा-आभास नहीं कहते, सत्य का साक्षात् भी हो जायेगा ।

राकेश -मुझे अपमानित करने का मंच तो तैयार नहीं हो रहा है।

विमलेश-नहीं मित्र, इनका इशारा तो उस दिन के सफर की घटना की तरफ है जब पंकज परिवहन से पटना की रैली में जाते समय भाडे के लिए नोंक-झोंक हुई थी।

राकेश-वाह ! उचित किराये से अधिक के विरोध को क्या नोंक-झोंक कहा करते हैं। पर छोड़ो भी इन बातों को। मुख्य बिन्दु पर तो आप सब चुप्पी साधे हुए हैं।

मूलचन्द -कौन सा मुख्य विषय-आपको स्मरण हो रहा है ?

राकेश – वही, डाकघर के भवन का स्थानान्तरण । इस स्थानान्तरण को कभी भी सफलीभूत नहीं होने देंगे। इसके लिए मंत्रीजी सदस्यों की आम राय जानने के लिए बैठक करें ।

मूलचन्द – लगता है सफलता असफलता की ठीकेदारी तुम ही ले रखे हो।

राकेश-तो क्या प्रशासन के एक तरफा निर्णय को कंठ तक यूँ ही उतर जाने दूँ। फिर कर्मचारियों के बीच क्या कह कर समझायेंगे ? लेकिन इस संबंध में सदस्यों की राय जान लेने में क्या आपत्ति हो सकती है।

सीमा-अच्छा होता, हम सब मिलकर प्रशासन को पहले ही समझा पाते । अपनी कार्यकारिणी के प्रस्तावों के पक्ष में अपनाये गए रवैये से भी उन्हे अवगत करा सके ।

विमलेश-रवैये की बात करने का अभी सही समय नहीं है। बस खुद ही सोच-समझकर कदम उठाना हितकर रहेगा।

राकेश-संघ चलाना सामूहिक उत्तरदायित्व की चीज है। समय नहीं होने का बहाना निकालकर कुछ भी करना सही नहीं होगा। सदस्यों को ऐसा भेड़ का झुंड न समझ लिया जाय कि आप जैसे सचिव के कुँए में कूदते ही सभी कूद पड़ेंगे ।

विमलेश-कैसी बेतुकी बातें कर रहे हैं? क्या अपने दावँ को पहलेही प्रचारित कर पक्ष-विपक्ष में सदस्यों को बाँट दूँ। और जब आप स्वयं स्थानान्तरण रुक जाने के पक्षधर हैं तो फिर राय किसकी जानने को रह जाती है। सदस्यों की राय जान लेने में व्यर्थ का समय गँवाने से क्या लाभ । मैं तो कहना चाहूँगा, हम सब चलें और प्रदर्शनकारी जत्थे को नारे लगाते चलने का निर्देश भी कर दें।

राकेश-अपना कुछ भी थोपने से विक्षोभ बढ़ेगा। इसको सहज भाव से नहीं लिया जाय ।

।। दृश्य-प्रमंडलीय डाक अधीक्षक का कार्यालय ।।

इन्कलाब जिन्दावाद-जिन्दाबाद, जिन्दाबाद। भवन स्थानान्तरण वापस करो-वापस करो, वापस करो। शिष्टमंडल से बातें करो,- बातें करो, बातें करो ।

सहायक डाक अधीक्षक (डाक अधीक्षक से) महाशय, कर्मचारियों के प्रतिनिधिगण आपसे बातें करने मुख्य द्वार तक आ पहुँचे हैं।

डाक अधीक्षक-शिष्टमंडल के विशिष्ट नेताओं को सम्मानपूर्वक आमंत्रित कर बैठाया जाय ।

सहा. डाक अधी-कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व कर रहे अध्यक्ष एवं सचिव जी. बातें करने के लिए आमंत्रित हैं। आप लोग स्थान ग्रहण करें।

(अध्यक्ष एवं सचिव द्वारा आसन ग्रहण)

डाक अधी.आपलोगों का वार्ता टेबुल पर स्वागत है।

अध्यक्ष-धन्यवाद महोदय ।

सचिव-महाशय, भवन स्थानान्तरण का निर्णय कर्मचारियों के हितों के अनुकूल नहीं है, इसे रद्द कर देना ही उचित होगा।

डाक अधी-लेकिन स्थानान्तरण का निर्णय तो विकास से जुड़ा हुआ है। दो अतिरिक्त पदों के सृजन के बाद तो वर्त्तमान भवन में स्थानाभाव भी हो गया है।

सचिव – कैसा विकास ? इस निर्णय से तो कर्मचारियों में क्षोभ ही पैदा हुआ है। हर एक के आवास से नये भवन की दूरी बढ़ जायेगी, या नहीं तो डाकघर के नये भवन के आस-पास उँचे किराये पर आवासीय मकान लेने पर विवश होना पड़ेगा ?

अध्यक्ष – सचिव जी का कहना तो ठीक ही जान पड़ता है। इसमें मेरा अपना सुझाव यह है कि वर्तमान डाकघर भवन का विस्तार करा दिया जाय अथवा इसके कार्यकाल को दो पालियों में बाँट देने पर भी वर्त्तमान दायरे में काम चल सकता है।

डाक अधी. – पर डाकघर तो दूसरे के मकान में किराये पर है। मकान मालिक से निजी उपयोग हेतु खाली कराने के लिए दबाव आ रहा है।

सचिव-खाली कराने के लिए दवाव का आना कहाँ तक न्यायसंगत है। जहाँ तक जानकारी है, मकान के लीज की अवधि भी तो समाप्त नहीं हुई है ?

डाक अधी. – लीज ? लीज का निबंधन तो हुआ ही नहीं है किराये का भुगतान तो माह-दर-माह स्वामित्व अधिनियम के अन्तर्गत हो रहा है।

सचिव- बगैर लीज निबंधन कराये ही इस किराये के मकान में जाने की कैसी बाध्यता रही होगी ?

डाक अधी- ये प्रश्नवाचक जानकारी अगर तत्कालीन सचिव राकेश जी उस समय के डाक अधीक्षक से किये होते तो शायद आज आपको यह मौका सुलभ ही नहीं होता ।

सचिव-राकेश जी के सामने चाहे जो भी लाचारी रही हो, पर आज संघ बेचारा बन कर बैठा तो नहीं रह सकता ?

डाक अधी.– सोच लीजिए आप दोनों। आवेश में आकर जल्दबाजी मे निर्णय लेना कोई अच्छी बात नहीं होती। भवन स्थानान्तरण का निर्णय हर पहलू पर विचार कर के लिया गया है। इसको रद्द कर देना श्रेयस्कर नहीं होगा, और कठिनाइयां भी तो सामने हैं।

सचिव -और हमें भी अपने सदस्यों को इस वार्ता की नकारात्मक उपलब्धि सुनाने में उतना ही कष्ट होगा, क्योंकि हर पहलू में प्रशासन की सुविधा का ही ख्याल किया गया होगा और कर्मचारियों के हितों को नजरअन्दाज किया गया है।

डाक अधी– नहीं ऐसी बातें नहीं हैं। नये भवन में हर सुविधा रहेगी, जो वर्त्तमान भवन में है ही नहीं। इसमें कर्मचारियों के हितों की अनदेखी कहाँ है ? आपलोग नाहक ही गलत अवधारणा रखे हुए हैं।

अध्यक्ष-इसका मतलब “संघ संगठनात्मक कार्यवाही करने को स्वतंत्र समझा जाय’?

डाक अधी– इसका अर्थ आप सब जैसे भी लगायें। प्रशासन अपने दायित्वों से मुँह तो नहीं मोड़ सकता।

अध्यक्ष एवं सचिव– (चलते-चलते) ठीक है, अब अगली मुलाकात शायद संघर्ष के रास्ते पर ही हो सके। अच्छा नमस्ते महोदय ।

डाक अधी-नमस्ते ! पर पुनः विचार करने का आपलोगों से मेरा आग्रह है। ठुकरायें नहीं ।

सचिव-बाँधे रहें आग्रह की अपनी पोटली। इसका अंत देखने को आपके सिवाय दूसरा और कौन रहेगा।

॥ दृश्य – डाक कर्मचारी संघ का कार्यालय ।।

इन्कलाब जिन्दाबाद-जिन्दाबाद, जिन्दाबाद। संघ एकता जिन्दाबाद-जिन्दाबाद जिन्दाबाद। हम अपनी मांगें लेके रहेंगे, लेके रहेगे, लेके रहेंगे ।

सचिव-शान्त, शान्त मित्रो । बड़े भारी मन से बताना पड़ रहा है कि वार्ता भंग हो चुकी है। निराशापूर्ण उपलब्धि का मुकाबला करने के लिए फौलादी एकजुटता का विकराल रूप प्रदर्शित करने का एक मौका आपके ऊपर लाद दिया गया है। आपकी हौसला बुलन्दी की परीक्षा की घड़ी आ गयी है। अब आपके बीच आगामी दिनों संघ द्वारा आपनाये जानेवाले कार्यक्रमों की घोषणा अध्यक्ष महोदय स्वयं करेंगे। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है, आप सभी इन्कलाबी ललकार के साथ समर्थन करेंगे ।

अध्यक्ष-मित्रो, वीर भोग्या वसुन्धरा ।” एक जुटता ही वीरत्व है। प्रिय मित्रों ! प्रशासन के इरादे नेक नहीं है। उनके पास कल्याणकारी योजना नहीं है। आपकी मुसीबतों की उन्हें परवाह नहीं है। आज हमारे कुछ कर दिखाने के सामर्थ्य को ललकारा गया है। हमें आप पर पूरा भरोसा है, आपकी शक्ति पर एहसास है । भवन स्थानान्तरण की अधिसूचना आज ही निकलनेवाली है। आज से ठीक ३०वें दिन स्थानान्तरण का दिन तय है। प्रशासन को निर्णय रद्द करने के लिए बाध्य करने हेतु जुझारू संघर्ष का कार्यक्रम भी बनाया गया है। जो इस प्रकार होगा :-

हस्ताक्षर अभियान-१९ सितम्बर

काला बिल्ला धारण- २६ सितम्बर

दैनिक प्रदर्शन-२ अक्टूबर से

नियमबद्ध कार्य संपादन-१० अक्टूबर से

कलमबंद हड़ताल – १२ अक्टूबर

मानव श्रृंखला कायम करना १५ अक्टूबर। अब आप हाथ उठाकर बतावें कि इन कार्यक्रमों से कितने आदमी सहमत हैं। (एक साथ सारे के सारे हाथ ऊपर उठ जाते हैं)
ठीक है, हाथ नीचे करलें। जैसी आप से उम्मीद थी, उत्साह उससे भी ऊँचा है। जिस तरह की एकजुटता का इजहार अभी आप सबों ने किया है, अगर कायम रखें तो प्रशासन के जहरीले पंजों को तोड़कर रख देने में देर न होगी। ठीक है, सचिव जी अब आप कार्यक्रमों की सूची उद्देश्य मूलक प्रस्ताव के साथ प्रशासन एवं उच्चस्तरीय संघों को भी भेज दें।

सचिव-मित्रो ! इसके पूर्व कि अध्यक्ष महोदय सभा को समाप्त घोषित करे, मैं यह कहना चाहूँगा कि लक्ष्य प्राप्ति हेतु हर भूमिका निभाने के लिए तैयार रहें। हो सकता है संघर्ष लम्बा खिचे। इस संघर्ष में शक्ति एवं साधन दोनों ही स्रोतों को एक साथ झोंकना पड़ सकता है। आप में अपार शक्ति संचित है, जो कभी भी अंगारा बन, प्रशासन के बुरे इरादे को भस्म कर सकती है, बस पलीता लगाने भर की देर होगी, पर सावधान, कोई भी काम पूरे नियंत्रित ढंग से होना चाहिए। साथियो ! आपके पास विपुल शक्ति है, जहाँ शक्ति है साधन जुटाना कोई बड़ी बात नहीं। अभी संघ के पास साधन सीमित है। आपसे आग्रह यह भी होगा कि संघर्ष कोष में खुलकर सहयोग करें।

अध्यक्ष-आप सब कार्यक्रम को सफल बनाने में लग जायें। इन्हीं शब्दों के साथ सभा विसर्जित की जाती है।

जय हिन्द । जय संघ

॥ दृश्य – डाक अधीक्षक कार्यालय का ।।

सहा. अधी.- नमस्ते महोदय ।
डाक. अधी.- नमस्ते ! कहिए प्रमंडल के सुचारु रूप से चलने में कोई बाधा तो नहीं खड़ी हुई है।
स० डाक अधी. नहीं महोदय, सब ठीक-ठाक है। हाँ श्रमिक संघ का भवन स्थानान्तरण के विरोध में एक प्रस्ताव आया है।
डाक अधी.-ठीक है उसे संचिका के साथ प्रस्तुत करें। हाँ डाक निरीक्षकों की मिटिंग अगले शुक्रवार २५ सितम्बर को बुलायी जाये ।

स. डाक. अधी. संचिका प्रस्तुत है महाशय, और ये रहा मिटिंग के कार्यक्रम का प्रारूप । पर महोदय डाक निरीक्षकों का समूह तो आज आने ही वाला है, उन्हें तो पहले से ही गवन निरोधक प्रयासों की प्रगति की समीक्षा के लिए वार्ता हेतु आहूत किया गया है। अगली मिटिंग के मसौदा पर भी क्यों न आज ही चर्चा कर ली जाय ।

डाक अधी. आपकी सलाह समयोचित है।

स. डाक अधी-महाशय, निरीक्षक गण तो शिकायत निरीक्षक के साथ आ भी रहे हैं। सभी निरीक्षक (बारी-बारी से) नमस्ते महोदय । नमस्ते छोटे साहब

डाक अधी- नमस्ते, नमस्ते। कहिए आप सभी ने तो गबन से संबंधित शेष मामलों का ब्यौरा तैयार ही कर रखा होगा। उनमें से लम्बी अवधि से लम्बित रहे मामलों के निपटान में चुस्ती लानी होगी। हमें ऐसा कोई भी मौका नहीं देना चाहिए जिससे कि परिमंडलीय कार्यालय को खरा-खोटा स्मार पत्र देना पड़ जाय ।

शिक- निरी-नहीं महोदय, इस गबन निरोधी पखवारे मे तो जिस स्फूर्त्ति से मामलों का निपटान किया गया है कि अब प्रमंडल में सिर्फ १० मामले ही लम्बित रह गये हैं। उनमें ५ मामले अदालतों में लम्बित है, तीन अभी पुलिस छानबीन कर रही है, एक परिमंडलीय कार्यालय “राइट ऑफ” के लिए भेजा जा चुका है। सिर्फ एक मामला विभागीय अनुसंधान के लिए शेष है जो दिन-दहाड़े राहजनी का मामला है, जो केवल दूसरे दिन की घटना है, जिसकी पुलिस में प्राथमिक सूचना आज दे देना जरूरी होगा ।

डाक अधी.-और अनुशासनिक कारवाई के लिए कितने मामले अभी लम्बित हैं ?

शिक. निरी. – सिर्फ ६ मामले महोदय। उनमें दो पर निर्णय लिया जाना बाकी है। दो की अंतिम सुनवाई भी समाप्त हो चुकी है। बाकी दो के लिए प्रयास जारी है।

डाक. अधी.-ठीक है, गबन एवं अनुशासनिक दोनों के शेष लम्बित मामलों का भी जल्द निपटान कर लिया जाय। निर्णय लिया जाने को बाकी उन दोनो मामलों की संचिका शिकायत निरीक्षक अभिरुचि रखकर प्रस्तुत करायेंगे । अनुशासन बनाये रखने में कोई कोर-कसर नहीं बरती जाय । श्रमिक संघ की तरफ से धमकी प्राप्त हुई है, उसको सहजता से नहीं लेना है। अधिक मुखर और अधिक भागीदारी वालों को पहचान कर लेना होगा ताकि समय रहते समस्या पर काबू पाया जा सके ।

अनु. मं. निरी– कैसी धमकी महोदय ?

डाक अधी – वही डाकघर के भवन स्थानान्तरण के विरोध में झंडेबाजी शुरू हो गयी है।

अनु. डा. निरी– पर इससे श्रमिकों का क्या लेना-देना है।

सहा. डाक अधी. – लगता है हर मुद्दे पर अड़ंगेबाजी करने में ही वे नेतागिरी में निखार समझ बैठे हैं।

डाक निरी– महाशय, मेरी एक सलाह है, आज पूर्व सचिव राकेश जी आनेवाले हैं। उनसे बातें कर ली जाय, शायद कुछ रास्ता निकल जाय । ऐसे अवसर पर व्यक्तिगत लाभ का लेमनचूस चखाकर देखा जा सकता है।

सहा. डाक अधी.- भवन स्थानान्तरण के विरोध का पहला संकल्प तो उन्हीं का है।

डाक निरी-है नहीं, था कहिए। संघर्ष से पहले सदस्यों की आम राय जान लेने की राकेश एवं सीमा की सलाह को कार्यरत सचिव ने नहीं माना, जिससे वे क्षुब्ध हैं।

डाक अधी– क्यों, वे क्या आजकल संघ से विमुख रह रहे हैं? कहीं बाद में चलकर सिद्धान्तबाद की दुहाई तो नहीं देने लगेंगे ?

डाक निरी. – इसे संघ से विमुख नहीं कहा जाय महोदय । उनका तो हर मुद्दे पर एक सकारात्मक दृष्टिकोण रहता है। वे तो भावी उम्मीदवार भी हैं। अगर हमलोग उनको माध्यम बना दें तो बात बन सकती है। नेतागिरी के आगे लक्ष्मी की पादुका को रखकर देखा तो जाय ।संकट में होंगे तो, पहनना उनकी विवशता होगी। फिर काम बना ही समझा जाये ।

राकेश-नमस्ते महोदय ।

डाक अधी. – नमस्ते । कहिए अनायास आने का प्रयोजन ।

राकेश-डाक सहायक मदन की बीमारी बढ़ गयी है। उसका कुछ चिकित्सा विपत्र आपके कार्यालय में स्वीकृति के लिए लंबित है, अगर उसे स्वीकृत कर दिया जाता तो बड़ी मदद होती ।

सहा.डा. अधी-क्यों इस विपत्र के भुगतान से संघ के संघर्ष कोष में दान भी देना है, कहना भूल रहे हैं क्या ?

राकेश-नहीं, आपका अनुमान सही नहीं है। यह तो संघर्ष ही बेतुका है। सदस्यों की आम राय लिए बिना ही इसे थोप दिया गया है। फिर ऐसे में संघर्ष कोष में दान हीं क्या देना है। स्थानान्तरण होना चाहिए था, यदि सदस्यों की आम राय बनती तो। पर अभी का विरोध तो सचिव जी का निजी स्वार्थ साधने का तरीका मात्र है। उनका घर तो वहीं है जहाँ वर्त्तमान भवन है। वे कब चाहेंगे कि नये भवन में जाने के बाद रोजाना समय, परिश्रम और अधिक पैसा खर्च किया जाय ।

डाक अधी – ये रही जानकारी की बातें। अच्छा राकेश जी, चिकित्सा विपत्र स्वीकृत हो जायेगा। आप संघर्ष को टालने मे सहयोग करेंगे?

राकेश-सचिव जी आम राय नहीं लिए फिर भी हम सब स्थानीय बैठक में पहले ही तय कर चुके हैं और इस संघर्ष में स्थानीय सदस्यों की भागीदारी भी कम ही होगी। सचिव जी तो बाहरी ताकतों पर ज्यादा भरोसा रखते हैं जो संघ संचालन का सही तरीका न होकर महज हथकंडा मात्र है और हथकंडो से कोई स्थायी निदान नहीं मिल सकता । ठीक है, अब चलने की इजाजत हो । नमस्ते।

डाक अधी. – अच्छा, अब आप सभी निरीक्षक भी अपने-अपने क्षेत्रों मे जायें। संघर्ष में भाग लेने वालों पर विशेष नजर रखें। संघर्ष में कर्मचारियों की भागीदारी का प्रतिशत कार्यालय को देते रहें।

सभी डाक. निरी.- (एक साथ) नमस्ते महोदय । (बचत विकास पदाधिकारी – (डाक अधीक्षक से एकांत में) महाशय संघर्ष टालने के अन्य पहलू पर क्यों नहीं सोच रहें हैं। क्यों नहीं वर्त्तमान मकान में थोडी वृद्धि एवं परिवर्तन कराकर उसके किराये में बढ़ोत्तरी कर दी जाय। इससे संघर्ष तो रुक ही जायेगा, बढ़ोत्तरी का कुछ अंश मकान मालिक से प्राप्त भी हो सकता है। क्यों नहीं एक तीर में दो शिकार कर लेते हैं।

डाक अधी. – पर मकान मालिक की तरफ से निजी उपयोग हेतु खाली कराने का दबाव जो आ रहा है।बचत विकास पदाधिकारी-एक बार आप मेरे प्रस्ताव पर हाँ तो कहकर देखिए। बाकी सब काम मुझपर छोड़ दें ।

डाक अधी – पर सब कुछ होने के उपरांत किराया आकलन समिति गले का फाँस बन जायेगी और प्रतिष्ठा धूल चाटने लगेगी ।

बचत विकास पदा०-क्यों, आकलन समिति को आप सतयुगी समझ बैठे हैं क्या ? उनका भी मुँह बन्द करने का प्रबंध कर दिया जायगा ।

डाक अधी. बातें बढ़ाने से कोई लाभ नहीं। जाइये अपना काम कीजिए ।

बच. वि. पदा-नमस्ते महोदय ।

॥ दृश्य – बीमार डाक सहायक मदन का घर ॥

राकेश-मदन घबड़ाना नहीं। पैसे के अभाव में इलाज में कोताही नहीं बरतना । ये रहा स्वीकृत चिकित्सा विपत्र ।

मदन-लाख-लाख ध्अन्यवाद राकेश भैया। डाक अधीक्षक को भी कोटिशः धन्यवाद ।

सुचित्रा-नमस्ते राकेश भैया। कहो क्या हाल-चाल है ? सुना है कल शायद प्रमंडलीय कार्यालय गये थे। यह भी सुनने में आया है कि भवन स्थानान्तरण के विरोध में सचिव जी संघर्ष का विगुल फूंक चुके हैं। जगह-जगह संघर्ष कोष में दान माँगा जा रहा है, हाँलाकि अपेक्षित उत्साह नजर नहीं आ रहा है। अब तुम्हीं बताओं हमें क्या करना चाहिए ।

राकेश-पहले तो हमें मदन की भली-भाँति देख-रेख करनी चाहिए। जहाँ तक भवन स्थानान्तरण के विरोध का मुद्दा है, यह बात साफ तौर पर समझ लेना है कि संघर्ष पर बाहरी शक्तियों के सहारे आरूढ रहना और बात है, पर सफल हो पाना कुछ और। जो सदस्यों का दिल जीत नहीं सके उन्हें नेता पद पर बने रहने का कोई औचित्य ही नहीं है। आप सबों को मालूम ही है, अभी जिस मकान में डाकघर संचालित हो रहा है उसमें आवश्यक सुविधाओं की कमी है, जगह भी कम है। ऐसे में अगर अच्छे भवन में स्थानान्तरण हो ही रहा है तो इसमें दखलंदाजी किस बात की ?

सुचित्रा-क्या समझ रखा है विमलेश ने अपने आपको ? सचिव क्या बन बैठा, बिना सदस्यों के राय लिए ही संघर्ष चालू कर देता है। ना भैया ना, इसमें तो भागीदारी नहीं चाहिए। नेतागिरी क्या है इसे विमलेश क्या जानेगा ? नेता कहीं चुना नहीं जाता, न नामजद किया जाता है और नहीं उसे बहाल ही किया जाता है। नेता तो वही हो सकता है जिसे सभी स्वीकार करें, उनका अनुसरण करें।
सुख-दुःख में साथ रहे बिना स्वीकार्य भी कोई कसे हो सकता है।

राकेश – ठीक कह रही हो, सुचित्रा। तुमने देखा होगा, रस्ताक्षर अभियान १५% रहा, काला बिल्ला का प्रतिशत १२ रहा है। दैनिक प्रदर्शन में भाग लेने कर्मचारी आ नहीं रहे हैं। वहीं कार्यकारिणी के पाँच सदस्य एवं सड़क छाप दूसरे समुदाय से भाड़े पर बुलाये गये लोग।

सुचित्रा-तब रिले भूख हड़ताल एवं नियम बद्ध कार्य संपादन का क्या होगा ?

राकेश-बस टॉय-टॉय फिस्स । अच्छा अब तो मदन के स्वास्थ्य में कुछ सुधार दिखायी पड़ने लग गया है। अभी डाकघर खुलने का समय होने ही वाला है, हमलोग चलें, फिर बाद में कभी देख लेंगे।

मदन-आपलोगों की सेवा एवं सहानुभूति को कभी भुलाया नहीं जा सकता ।

।। दृश्य डाक अधीक्षक का कार्यालय।।

सहा.डाक अधी. महोदय, लगता है संघर्ष ठंढा पड़ता जा रहा है। औसत भागीदारी का प्रतिशत १४ तक ही है। नियमबद्ध कार्य संपादन में चार शामिल हुए हैं। भूख हड़ताल पर तो मात्र छः व्यक्ति ही थे। हाँ जूस पीने के समय मेला लगा हुआ था शाम को, जो हास्यास्पद था, क्योंकि नगण्य भागीदारी को उपहास का द्योतक, लोग बता रहे थे।

डाक अधी.-ठीक है, उन चिन्हित कर्मचारियों के विरुद्ध अनुशासन भंग करने का आरोप-पत्र तैयार कर भेजा जाय। कार्य में बाधा डालने के आरोप में विमलेश को निलंबित भी कर दिया जाय। एक साधारण पत्र भी सभी डाकपालों को प्रेषित कर दिया जाय कि अनुशासन भंग एवं काम में उच्छृंखलता को कदापि सहन नहीं किया जा सकता। संघर्ष में भाग लेने वाले कठोर दंड के भागी बनाये जायेंगे और जो निष्ठावान बने रहेंगे, विशेष सहानुभूति के पात्र होंगे।

सहा. डाक अधी.आरोप पत्र का प्रारूप अभी तैयार है महोदय ।

डाक अधी.- ठीक है इसे अनुशंसित एवं स्वीकृत किया गया। देखें, इस आदेश को पंजीकृत-स्वीकार पत्र के साथ आज की डाक से भेज दिया जाय ।

शिकायत निरीक्षक-महोदय, आरोप पत्र के तत्काल तामिली से श्रमिकों में एका-एक आक्रोश पैदा हो जाने की आशंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है। उनमें बौखलाहट पैदा हो सकती है। इसै तो बाद में भी तामिल कराया जा सकता है। पहले तो हमें स्थिति पर काबू पाने की व्यवस्था पर ही ध्यान केन्द्रित किये रखना होगा। केवल सचिव को ही निलंबन कर उन्हें अकेले ही कटघरे में खड़ा करना ठीक होगा, पर थोड़ा सा धैर्य और बनाये रखना ठीक होगा।

सहा. डाक अधी. – निरीक्षक महोदय की सलाह समयानुकूल उचित जान पड़ती है महाशय । इस बीच कर्मचारियों के उचित लंवित विपत्रों को स्वीकृत कर भुगतान के लिए भेज देना भी ठीक होगा। इससे होगा यह कि उनका प्रशासन की तरफ का क्षोभ ठंढा पड़ जायेगा। सप्ताह भर बाद निलंबन वाला आदेश तामिली हेतु मुक्त कर दिया जायेगा ।

डाक अधी.-ठीक है ऐसा ही किया जाय। जबतक मामला कुछ ढंढा रहे इसी बीच १५ अक्टूबर के दिन भवन स्थानान्तरण का कार्य पूरा कर दिया जाय । इसके लिए परिवहन एवं अन्य व्यवस्था पूरी कर ली जाय । व्यवस्था में कहीं त्रुटि नहीं रहे। जरूरत के अनुसार डाक अधिदर्शकों की सेवायें भी ली जायँ ।

सहा. डाकअधी.- व्यवस्था पक्की हो चुकी है, महोदय ।

डाक अधी.-ठीक है, कार्यों पर नजर रखी जाय एवं समय का इंतजार किया जाय ।

॥ दृश्य – डाक कर्मचारी संघ का कार्यालय ।।

सीमा-प्रिय मित्रों ! लगता है आज प्रशासन वर्बरता पर उतर चुका है। सचिव का निलंबन उसका एक छोटा रूप है। कल यह आफत दूसरों पर भी कहर ढा सकती है। प्रशासन के इन आतंक फैलाने वाले फनों को कुचलने का संकल्प लेना ही होगा, नहीं तो यह जहर संघ को ही पंगु बना देगा। ऐसे में आज हम सब चुप बैठने वाले नहीं है। यदि इसको चुपचाप सहन करते रहे तो यह आपकी कायरता होगी। अब हाथों में चूड़ियाँ पहन कर घूँघट में रहने का समय नहीं रहा। यह तो प्रशासन के क्रूर हाथों को मरोड़ने का समय है। निलंबन का कहर दूसरों तक पहुँचकर उनके मनोबल को कम कर सके, उसके पहले ही शपथ लेनी होगी। जब तक प्रशासन निलंबन को वापस नहीं लेता, तबतक संघर्ष चाहे जितना लम्बा खिंचे जारी रहेगा। समय आ गया है, कुछ कर दिखाने को अब तो हर किसी को कुर्बानी के लिए तैयार रहने की जरूरत है। एक तरफ सचिव का निलंबन, दूसरी तरफ विपत्रों को स्वीकृत कर भुगतान की व्यवस्था, यह तो उनकी दुरंगी नीति है। इर छलावो में हम नहीं आनेवाले हैं। हाँ परिमंडलीय संघ का सहार लेना उचित होगा ।

(सीमा दीदी चिन्दाबाद, जिन्दाबाद, जिन्दाबाद)

विमलेश – मित्रो ! मेरे निलंबन वापसी को मुद्दा नहीं बनाया जाय, नहीं भवन स्थानान्तरण विरोध के उद्देश्य से हम भटक जायेंगे। प्रशास ने सोची-समझी चाल के तहत हमारे रास्ते में काँटें बिछा रखे। ताकि हम उसी में उलझ जाएं और हमारे हाथ उन फलों तक ना पहुँच पायें जिनके लिए जुझारू संघर्ष पर लंगोटा कसे हैं। आपव निशाना भवन स्थानान्तरण को रोकना मात्र होना चाहिए । मुद्दा तो कर्मचारियों के काम के लिए यही तो तपने का अवसर मिला है। तपने के बाद सोने में निखार आता है। निलंबन के बाद नेतृत्व ओछा तो नहीं होगा और जाग्रत हो उठेगा ।

मूलचन्द -नहीं विमलेश ! क्या बोल रहे हो ? क्या तुम्हें भँवर में यों ही छोड़ देना ठीक होगा। हमें सोचना होगा अपनी कमजोरियों की तरफ सोचना होगा संघर्ष के प्रति कर्मचारी इतने उदासीन क्यों रहे, व उनकी भागीदारी का औसत प्रतिशत १४ से ऊपर नहीं जा सक हमें सोचना होगा डाक अधीक्षक के रवैये के प्रति भी। क्या लुभाव चरित्र रहा उनका इन दिनों जो कर्मचारियों को अपनी ओर आकर्षित किये हुए हैं। कहीं उनका भवन स्थानान्तरण का कदम सही तो नहीं है।

सुचित्रा- क्यों, आप सब अपनी कमजोरी की अनदेखी कर रहे हैं। राकेश के इस कथन में क्या गलती थी कि संघर्ष थोपने के पहले सदस्यों की आम राय जान ली जाय। बाहरी शक्तियों के भरोसे क्यों संघर्ष छेडा गया। मदन की बीमारी पर आप सबों के ऑस क्यों सुख गये थे ? अपने आवास के नजदीक ही, पर सुविधाविहीन डाकघर का भवन बना रहे, इसके लिए सचिव द्वारा बिना आम राय लिए जेहाद छेड देना स्वार्थ परक नहीं तो और क्या है? कार्यक्रमों में जब अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा था तो बीच में ही समीक्षा कर उसमें नीतिगत परिवर्तन कराने से कौन मना किये हुए था ?

मूलचंद – मित्रो ! अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है। उचित को उचित कहना, भले ही देर से ही सही, कहीं गलत थोड़े ही होता है। पहले आम राय की जानकारी लेनी चाहिए थी। आखिर डाक अधीक्षक भी तो प्रमंडल की, पूरी डाक व्यवस्था का प्रमुख होने के नाते नेता ही है न, उनसे बैर भाव ठीक नहीं है। उनके पास प्रशासनिक शक्ति है, दंडात्मक अधिकार हैं। फिर देखो न ऐन मौके पर मदन के चिकित्सा-विपत्र- और बाद में सभी के अन्य विपत्रोंको इसी संघर्ष के दौरान स्वीकृत्त कर कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त कर ली। उन्हीं के पास सब कुछ है और हमलोगों के पास कुछ भी नहीं है ऐसा तो नहीं है। हमारे पास भी सांगठनिक शक्ति है, हम लोगों के पास श्रम-शक्ति है। उनके पास दंडात्मक अधिकार हैं तो हमलोगों के पास असहयोग का अस्त्र है। उनके पास जो भी प्रशासनिक शक्ति है उसका उन्हें दुरुपयोग तो नहीं करना चाहिए। जायज विपत्रों को यों ही लटकाये क्या इसीलिए रखे थे कि हड़ताल तोड़ने हेतु उसका उपयोग समय पर किया जायेगा ?

मूलचन्द- नहीं सीमा, निधि का अपर्याप्त होना भी कारण हो सकता है। बिना जाने ही कोई दुर्भावना पाले रखने से कटुता में कभी तो नहीं आ सकती । संघ एवं प्रशासन एक ही गाड़ी के दो पहिये है, अतः व्यवस्था के सुचारू रूप से चलने के लिए दोनों में सौहार्द रहना जरूरी है। पर इन गीतों के गाने से लाभ ही क्या है। सदस्यों की भावनाओं को पढ़ना पड़ेगा, उन सभी की भावनाओं का आदर करना। अगर नेतृत्व भूल जाये तो अभी क्या आगे दिन भी एकता बनाये रखने में मुश्किलों का सामना करते रहना पड़ेगा। अभी हम सबों का ध्यान, सचिव की निलंबन वापसी पर रहना है। इस संबंध में डाक अधीक्षक से बातें करनी पड़ेगी और इसमें हुई प्रगति के वाद पूरे विषय की समीक्षा भी की जायेगी। आप सब मर्माहत जरूर हुए हैं, पर जोश में होश खोना तो प्रशंसनीय नहीं कहा जायेगा।

सीमा-ठीक है आपकी जैसी मर्जी ।

।। दृश्य – डाक अधीक्षक का निवास॥

मूलचन्द – नमस्ते महोदय ।

डाक अधी. – नमस्ते अध्यक्ष जी ।

अध्यक्ष- महोदय, परिवार के प्रमुख तो अन्य सदस्यों की छोटी गलतिया को नजर अन्दाज ही करते है । विमलेश का निलंबन वापस कर लेने से आपकी प्रतिष्ठा उत्कृष्ट हो जायेगी। कुछ गलतफहमी तो कार्य संपादन के दौरान अनायास भी कभी घटित हो जाती है। अतः उसे ही मुद्दा बनाकर ढोते रहना महज शव को ढोने के बराबर ही तो होगा ? उसे दफन कर देना ही ठीक होता है। समझें तो आपसे आग्रह ही है, इसको यहीं समाप्त समझा जाय ।

डाक अधी.– ठीक है, पर सौहार्दपूर्ण रवैये के लिए वातावरण भी तो सहज होना चाहिए। क्यों नहीं विमलेश को समझा देते हैं। उनको आरोप पत्र का बचाव पक्ष प्रस्तुत करने को ? क्यों नहीं सलाह देते हैं ?

अध्यक्ष- जरूर कह देंगे यदि आप सहानुभूति की आशा बंधाये तो ।

डाक अधी.- आप तो जानते ही हैं, मुख्य उद्देश्य भवन स्थानान्तरण का था जो कि पूरा हो चुका है। विमलेश को अन्य कर्मचारियों से बाहर थोड़े ही मानता हूँ।

अध्यक्ष- आशा है संघ एवं प्रशासन का संबंध मधुर ही बन पायेगा। अच्छा अब जाने की अनुमति प्रदान की जाय ।

डाक अधी. – जैसी इच्छा ।

अध्यक्ष- नमस्ते महोदय ।

डाक अधीक्षक– नमस्ते ।

॥ दृश्य – डाक कर्मचारी संघ का कार्यालय ॥

मूलचन्द – विमलेश, तुम्हारे निलंबन का आदेश वापस हो जायेगा, ऐसा आश्वासन प्राप्त हो चुका है। सिर्फ आरोप-पत्र में लगाये गये हर आरोप परिच्छेद का बचाव-पत्र तैयार कर भेज देना है। उसमें बता देना होगा कि जो भी किया संघ के निर्णय को लागू करने के लिए किया जिसकी जिम्मेवारी का भार तुम्हारे कंधों पर था। लेकिन विमलेश, हमें मिल बैठकर समीक्षा तो करनी ही पड़ेगी कि किन कारणों से ऐसी परिस्थिति देखने को विवश होना पड़ा कौन सी खामियों के चलते सफलता दूर होती गयी ।

सुचित्रा-यही तो आजकल पूरे प्रमंडल में चर्चा का विषय बना हुआ है। डाक अधीक्षक द्वारा लिए गये निर्णय एवं उसे लागू करने में अपनाये गये कदमों की सराहना हर ओर हो रही है।

विमलेश-मुझे तो अपने ही सदस्यों की नाराजगी का शिकार होना पड़ा है। जिनपर भरोसा था, साथ छोड़ गये। सचिव पद पाने के लिए स्पर्धा की जगह ईर्ष्या का सहारा लिया गया। अगर लोगों को संघर्ष का रास्ता पसंद नहीं था तो विशेष बैठक का आग्रह करते, बातें तय कर ली जाती । नेता का इस तरह पैर खींचना संघ की एकता के लिए घातक ही होगा। संघ की नैतिकता को ओछा क्यों बना दिया गया ?

नीरज – पर विमलेश तुमने मौका दिया ही कहाँ, बस संघर्ष का निर्णय थोप दिया। तैयारी का समय भी नहीं दिया। सदस्यों को तो मात्र भेड़ का झुंड समझ लिया था। क्या राकेश ने तुम्हें संकेत नहीं किया था। चुनाव जीत कर सचिव का पद प्राप्त कर लेना अलग बात है, दिल जीत लेना कुछ और। चुनाव तो आजकल महज हथकंडे का खेल रह गया है। तुम्हें शायद मालूम भी होगा, एक नेता, सचिव इसलिए बन बैठा कि उसने ज्यादातर सदस्यों को शराब में रात भर गोते रखा और एक कोठरी में बंद रखा एवं वहाँ से सीधे चुनाव स्थल पर ही जाने दिया। कहीं दूसरे से संपर्क का मौका ही नहीं दिया । एक अन्य जगह तो अपने पिट्दुओं से पैनल प्रस्तुत करने का अधिकार ही प्राप्त कर पढ़ दिया एवं स्वयं सचिव बन बैठा । चुनाव किसी तरह जीत जाने से ही कोई नेता नहीं बन जाता । मैं क्या बतलाँऊ, सीमा तो सबकुछ डाकघर के नये भवन के गेट पर हुए मिटिंग को सुनकर आयी है, उसी के मुँह से नेतागिरी क्या है सुन लो न ।

मूलचंद – क्यों सीमा ,क्या नेतागिरी के पाठ को केवल कंठस्थ ही किए रहोगी या उससे दूसरों को लाभान्वित होने का अवसर भी प्रदान करोगी?

सीमा- सुना तो मैंने बहुत कुछ है। पहले तो मैं अचंभित रही। वैसे-वैसे लोगों को सुनने का अवसर मिला जिनसे ऐसे विचार प्रकट करने की उम्मीद नहीं करती थी। पर बाद में निचोड़ तक जाने पर लगा हम सवों का संघर्ष दिशाहीन हो चुका था। राकेश ने नये भवन के अहाते में खचाखच भरी सभा में उन सभी विन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए जो विवेचन प्रस्तुत किया वह काविले तारीफ है। उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम पड़ेगी। सुनना ही चाहते हो तो धैर्य से सुनो कि नेतागिरी वास्तव में है क्या। नेता के गुण एवं आचरण कैसे होते हैं एवं किस तरह वह लक्ष्य प्राप्ति की तरफ अग्रसर होता है एवं लोग क्यों और कैसे उसका अनुसरण करते हैं। कोई स्वयंभूनेता नहीं होता, नहीं वह नामजद या चयनित किया जाता है। न तो वह निर्वाचित किया जाता, नहीं वह बहाल ही किया जता है। नेता वह होता है जिसे लोग स्वीकृत करें एवं उसका अनुसरण करें ।

नीरज-लेकिन सीमा, हम किसी व्यक्ति विशेष को नेता मान ही क्यों लेते हैं ? क्या हर कोई उद्देश्य के मूल्यों को नहीं समझ पाता?

सुचित्रा- नहीं नीरज, समूह में काम करने वालों के अन्दर एक अनिश्चितता की अनुभूति तो हर एक में रहती ही है। इस अनिश्चितता की अनुभूति ही अपने बीच नेता चुनने को उद्वेलित कर देती है, जो उनके संशय को कम कर सके। तुम्हीं देखो न यह डाक-व्यवस्था भी तो संस्था के रूप में अधिकारी से कर्मचारी तक एक सूत्र मे बंधे ही हैं यानी व्यवस्था भी एक संगठन है, जिस तरह श्रमिक संगठन के नेता को अध्यक्ष एवं सचिव के रूप में हम जानते हैं, उसी तरह डाक अधीक्षक भी प्रमंडलीय डाक व्यवस्था के एक नेता ही हैं। लो राकेश भी पहुँच ही गये, विस्तार से अब ये ही बतायेंगे।

मूलचन्द – बैठो राकेश, सुना है बड़ी सभा में शिरकत कर आ रहे हो, और सारगर्भित भाषण देने की शोहरत भी तुम्हें ही प्राप्त हुई है।

राकेश- कोई गलत नहीं सुना है आपने, पर मार्मिक भाषण तो डाकपाल का ही रहा था।

विमलेश- क्या कह रहे थे; मेरी घावों को किस तरह हरा कर रहे थे वे ? कहो कहने पर बुरा तो नहीं मानोगे ?

राकेश- अपनी कमजोरी को सुन लेने को बुरा नहीं माना जाता है।विमलेश।

सुचित्रा- कुछ कहोगे भी, या तुम भी विमलेश के जख्मों को कुरेदना नहीं छोड़ोगे ?

राकेश- सुनो सुचित्रा, डाकपाल जी कह रहे थे कि कोई भी व्यक्ति नेता तभी बन सकता है जब कि वह दूसरे के प्रति गुणात्मक स्थिति एवं आचरण को पदस्थापित कर सके तभी तो उसके निर्देशों पर लोग लट्टू बन कर उत्पादक कार्यों में संलग्न हो जाते हैं। यह तो तुम सब जानती ही होगी कि किसी भी नेता में दो स्थिति की पहचान जरुरी है।

मूलचन्द – वे दोगुण कौन-कौन होते हैं राकेश ?

राकेश-अध्यक्ष जी, पहला तो यह कि वह अपनी कल्पना शक्ति को इस तरह विस्तृत करके प्रभावकारी बना डाले तथा दूसरा कि संवेदनाओं में अपनी भागीदारी बना डाले, यानी दूसरे को अच्छी तरह परख सके। पर हाँ, उनकी भावनाओं में स्वयं डूब न जाय।

मूलचन्द – यानी तुम्हारे कहने का मतलब यह है कि चिकित्सक रोगी की पीड़ा को तो समझे, पर इतना भाव विह्वल न हो जाय कि ऑपरेशन टेबुल पर स्वयं भी रोना शुरू कर दें। ऐसे में रोगी का कल्याण नहीं, हानि ही पहुँचाने वाला डाक्टर साबित होगा ।

सुचित्रा- क्या विमलेश से हाँ कह देने का इशारा तो नहीं है ?

सीमा- ऐसी बात न कहो सुचित्रा, बीच ही में व्यवधान पैदा हो जाय कि। वह नेता का दूसरा गुण कहने ही वाला है। कहो राकेश, कहो

राकेश- दूसरा गुण यह कि नेता को नेतागिरी करते समय कोई चालबाजी या अड़ंगेबाजी वाली चाल नहीं चलनी चाहिए और न तो झूठे आश्वासन देकर दूसरों आशाएँ बन्धानी चाहिए । विश्वसनीयता बनाकर ही समूह को संगठित रखा जा सकता है। अपने को स्वयंभू नेता या सर्वे-सर्वा मान लेने से तो केवल आत्म संतोष ही हो सकता है, उससे समूह को कोई लाभ नहीं हो सकता है।

मूलचन्द- पर राकेश, अधिकार परस्त व्यक्ति को, जो कि अपने अधीनस्थों पर रोव-दाब रख कर बने रहते हैं, क्या नेता नहीं कहा जा सकता ? सीमा- क्यों नहीं, उन्हें तो अधिकार परस्ती वाला नेता कहा जायेगा, जो दूसरे अधीनस्थों पर दंड के सहारे अपने तलवे के नीचे समझते हैं। ऐसे व्यक्ति की नेतागिरी में संगठन के उत्पादन एवं अनुशासन पर नकारात्मक परिणाम ही तो मिलता है। नेतागिरी तो वह प्रक्रिया है जो लक्ष्य प्राप्ति की क्षमता को प्रभावित एवं नियंत्रित रख सके।

सुचित्रा – लेकिन प्रभाव का आकलन कैसे किया जायेगा, यह भी तो बताओ।

सीमा- क्यों सुचित्रा, तुम नहीं जानती की मनचाहा परिणाम पाने के लिए किसी व्यक्ति या समूह को उकसाने यानी जागृत करने की क्षमता को ही तो प्रभाव कहा जाता है।

सुचित्रा- तब तो कहो न कि किसी व्यक्ति में निहित शक्ति की मात्रा से ही उसके प्रभावकारी क्षमता का आकलन हो सकता है। पर क्या ये बतलाना आवश्यक नहीं है कि किसी व्यवस्थापक या अधिकारी में निहित शक्ति के कौन-कौन से स्रोत हैं।

राकेश- तुमने तो सुचित्रा, सवाल को ठीक चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। अगर कोई अधिकारी या व्यावस्थापक नेतृत्व कर रहा हो तो, यह समझना ही पड़ेगा कि उसमें शक्ति के व्यापक स्रोत हैं। एक कुशल व्यवस्थापक में नेता के गुण मौजूद रहते हैं।

मूलचन्द – पर ये कौन-कौन से स्रोत अधिकारियों में होते हैं, या निहित रहते है?

राकेश- मुख्यतः दो स्रोत तो निश्चित ही अधिकारियों में होते हैं। एक तो पद निहित अधिकार, जिस अधिकार को अधीनस्थों द्वारा साधारणतया स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया जाता है। जैसे डाक सहायक के लिए डाक पाल, डाकपाल के लिए डाक अधीक्षक, डाक महाध्यक्ष और डाक महाध्यक्ष के लिए डाक महानिदेशक । इनके बीच पदेन संबंध हैं। इसी के अनुरूप नीचे से ऊपर तक उत्तरदायित्व रहता है। देखा नहीं, डाक निरीक्षक एवं सहायक डाक अधीक्षक, डाक अधीक्षक के पास यथा समय सूचना देते जा रहे थे। दूसरी शक्ति को पुरस्कृत एवं दंड देने की स्वीकृत शक्ति कहते हैं। इसके अन्तर्गत वार्षिक वेतन वृद्धि, पदोन्नति, दक्षता-रोध को पार करना और किसी को झिड़की एवं नियम में दिये गये दंड प्रावधानों को नियम १४ एवं १६ के अनुसार दंडित करना आता है। छंटनी एवं निलंबन भी इसी शक्ति के प्रयोग का फल होता है। मदन के चिकित्सा-विपत्र की स्वीकृति एवं विमलेश का निलंबन इसी शक्ति के द्वारा डाक अधीक्षक ने किया था ।

सीमा – पर क्या, इन शक्तियों के दुरुपयोग होने पर स्फूर्त न्याय पाने के लिए यथोचित अवसर बचाव के लिए प्रभावित व्यक्ति को मिलता है?

राकेश-हाँ, हाँ, बिना बचाव के लिए यथोचित अवसर दिये कोई भी अधिकारी किसी अधीस्थ कर्मचारी को दंडित नहीं कर सकता।

सीमा -लेकिन इसके अलावे भी तो व्यवस्थापक या अधिकारी, कभी कर्मचारियों को मानसिक प्रताड़ना एवं पुरस्कृत करते हैं। काम अच्छा नहीं होने से अनुभाग से हटा देना, भरे मुँह बोलना नहीं एवं किसी कर्मचारी से उनके हाल-चाल की जानकारी रखना, किसी से हाल-चाल पुछना तक नहीं, ये सभी बातें तो उनके लिए बड़ी सहज है।

सुचित्रा- लेकिन क्या इन शक्तियों के प्रयोग में व्यवस्थापक यानी नेता को निपुणता हासिल होना जरूरी नहीं है ?

सीमा- हाँ सीमा, तुम्हारा यह सवाल बिलकुल सही है। केवल शक्तियों के प्रयोग में ही निपुणता नहीं, नेता में तो हर काम करने की दक्षता होनी चाहिए। दक्ष व्यवस्थापक से कर्मचारी खुश रहते हैं एवं बताये गये मार्ग का अनुसरण भी सहजता से करते हैं। समय पड़ने पर प्रयोगात्मक रूप में उस काम को करके दिखाना नेता का गुणा होता है। जिस नेता में कार्य करने की दक्षता एवं निपुणता रहती है उसमें बिद्यमान इस शक्ति को “निपुणता की शक्ति’ कहते हैं।

मूलचन्द – यह सब तो सामान्य स्थितियों में उपयोग की शक्तियाँ है। आकस्मिक परिस्थितियों का सामना करने के लिए तो नेता में अदम्य साहस एवं बेजोड़ दक्षता होनी चाहिए, जिससे विकट परिस्थितियों में समय पर तत्क्षण एवं निर्भीक निर्णय ले सके । समर्थकों के संवेगों पहचान के विवेक का होना नेता में जरूरी है। नेता की इस शक्ति को “उदाहरण योग्य प्रस्तुति शक्ति’ कहा जाता है।

राकेश- ठीक है अध्यक्ष जी कि नेता को आकस्मिक परिस्थितियों में विवेक से निर्णय करना पड़ता है, लेकिन इसे भी याद रखना कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि नेता या व्यवस्थापक को समस्या का निदान दूढ़ते समय दूसरों के विचारों को जानकर उसे तर्क की कसौटी पर कसते हुए अपनी वाता को रखना चाहिए। किसी पर अपना निणर्य थोप नहीं देना चाहिए। उदाहरण के लिए कोई बहुत पीछे जाने की जरुरत नहीं है, भवन स्थानान्तरण के विरोध में लिए गये निर्णय को देखेंगे तो पायेंगे कि यह निर्णय विमलेश ने अपने ही आप लिया था, सदस्यों की राय कहने के बावजूद नहीं लिया। संघर्ष को सदस्यों पर थोपकर उन्हें उत्प्रेरित करने की कोशिशें की गयी, जिसका परिणाम आप सबों से ओझल नहीं है, यानी आवश्यक समर्थन नहीं जुटाया जा सका और संघर्ष विफल हुआ। विमलेश को चाहिए था कि विषय विन्दु को समूह के सामने रखकर,सबकी बातों को सुनकर निर्णय लिया होता तो सबका सहयोग मिलता । समर्थकों को राय में रखना नेता को जरूरी होता है। इस तरह की शक्तिवाले नेता को “समर्थक संग्राही शक्ति” वाला नेता कहा जाता है।

सुचित्रा- और कितनी शक्तियाँ गिनाते रहोगे राकेश, क्यों नहीं कह देते की नेता में अभूतपूर्व विलक्षण शक्ति होती है, जो हर समय अधीनस्थों /कर्मचारियों के पथ को आलोकित किये रहती है। पर राकेश, नेता के आचरण के बारे में भी कहोगे या उनकी शक्ति की बिरदावली ही गाते रहोगे ।

सीमा-आचरण नहीं रहने पर नेता सन्निहित शक्ति का भरपूर प्रयोग भी कभी कर पायेगा क्या ?

राकेश- ठीक कह रही हो सीमा। आचरण भ्रष्ट होने से ही तो रावण की शक्ति क्षीण होती गयी और उसका पतन हो गया। नेता के कामों का लेखा-जोखा सही होना चाहिए। नेता तो जन प्रतिनिधि होता है। मोटे तौर पर नेता के आचरण के कुछ एक बिन्दुओं की तरफ आप सब का ध्यान बँटाना चाहूँगा :-

१. नेता में व्यवस्था के साथ अधीनस्थ कर्मचारियों/समर्थकों की समस्याओं को सही ढंग से प्रस्तुत करने का आचरण होना चाहिए।
2. समूह की कमजोरियों एवं संशय को दूर कर माँगों पर संघर्ष में समझौता करानेका आचरण भी होना चाहिए ।

३.अनिश्चितता में समस्या के समाधान के समय सहनशील होना चाहिए।

४. सकारात्मक संवेगों को बार-बार मित्रतापूर्वक तार्किक ढंग से प्रस्तुत कर समर्थकों में साहस भरते रहना चाहिए ।

५. अधीनस्थों/कर्मचारियों/ समर्थकों को हमेशा लक्ष्य एवं कार्य श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होते रहने के लिए प्रोत्साहित करते रहना चाहिए।

६. कार्य संपादन एवं उसकी संपन्नता के लिए साधन एवं सुविधा की शत्तों को पूरा कराना चाहिए ।

आप जानते ही हैं कि वर्तमान भवन में सुविधाओं की कमी थी, जिसके चलते डाकघर के दैनिक कार्य संपादन में गति लाना दूभर हो रहा था, और धीमी गति के चलते कर्मचारियों को प्रताड़ना मिला करती थी। अतः संघर्ष पर जाने के निर्णय से कर्मचारी-हितों पर सचिव द्वारा स्वयं ही तो आघात किया जा रहा था।

विमलेश- अभी घुंघलापन दूर हुआ एवं बातें स्पष्ट रूप से समझा सके राकेश भाई। अब कभी मौका आने पर सही तरीके से नेतागिरी को निखारा जा सकता है।

सीमा- देखना, फिर कभी भूल नहीं कर बैठना ।

सुचित्रा- दुबारा मौका मिलने के पहले तुम्हें तपना पड़ेगा विमलेश; और राकेश तुम्हें भी तो नेतागिरी का यह पाठ पहले ही समझाना चाहिए था ।

मूलचन्द- चलो देर से आये तो क्या, कम-से-कम नेतागिरी क्या है, समझ तो सके ।

।। जय हिन्द ।।

डॉ कृष्ण दयाल सिंह
( लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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