बैरन चिट्ठी
पिया द्वार पर डोली उतरी, पिया बने थे अनजाना; अल्हड़ थी, आयी थी, था मेरा नहीं ठिकाना ।
ऊपर नीचे देख के बोले, ऐसी प्रिया न होगी; जिसके माथे लगी न बिंदी, मेरी प्रिया न होगी।
बेवस होकर लौट चली, नैहर का राह न जाना; मैं भोली थी, नैहर भोला, रहा न होगा कौड़ी दाना ।
प्रेक्षागृह में पड़ी पाँव अब, सबने कहा हिया नहीं इसको; नस्तर लगा पेट में झट-पट, बची लाज नहीं अब तो इसकी ।
नन्हा निकला पेट से मेरे, उसकी हुई परीक्षा; नाम पड़ा लौटनवा उसका, घर जाने की ईच्छा ।
फटे हाल में लाज जो लगती, नया मिला एक लहंगा; दुहरी दाम पड़ी नैहर को, ये लहंगा तो महंगा ।
नयी उमर में ऐ निगोड़ी, तुम क्यों बनी भगोड़ी; कुछ तो अक्ल उधार का, ले सकती थी थोड़ी।
माँ माँगवाई लहंगा बिन्दी, फिर मैं बनी नवेली; लहंगे ऊपर सौ की बिन्दी, पहन बनी अब अलबेली ।
पिया चूम करर बोले अबकी, बहुत नई अब अठखेली; तुम कह देना ऐसा आना, जितनी भी हो सखी सहेली ।
अब से बैरन कभी न जाती, नैहर-सास दोनों को भाती, जहाँ-जहाँ मन मेरा करता, वहाँ-वहाँ चली जाती।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की इकतालीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

