
देवव्रत (भीष्म)
एक नारी जो यौवन थी, और रूप की परी थी; खड़ी नदी के तट पर, तरूणाई लिए भरी थी।
मादकता ने मोह लिया था, धन और प्राण तुम्हीं पर अर्पण; सुन्दरी तू आओ एक बार, सब कुछ अर्पण, सारा अर्पण ।
शान्तनु प्रेम में विह्वाल थे, गंगा भी आस लगाये थी; बोले, पत्नी तू बन जाओ, बनूँगी, पर शर्तें कुछ लगाये थी।
बोले, हर बात को तेरी मानूँगा, प्राणों से बढ़कर जानूँगा; बोलो, गंगे, कैसे होठो पर होठ, तुम्हारे पा लूँगा।
है शर्त्त एक, कूल जिसकी हूँ, कोई पता नहीं तक पुछेगा; मेरी कामों को कोई भी, भूलकर कभी न पुछेगा।
न होंगी आँखें लाल कभी, न कोई मुझको डाँटेगा; जाऊँगी भाग मैं उसी समय, जब बात कभी तू काटेगा।
जो बोलो, मैं मानूँगा, कामांगी यदि मैं पा लूंगा; ऐसे मिले वो दोनों ही, हर पल, बोले, मैं पालूँगा।
गंगा से घर अब शोभ चली, राजा भी थे भली-भली; नित प्रेम सुधा में नहलाते, कब दिन ढला, कब रात ढली।
पति-पत्नी के प्रेम से, जितने पुत्रों ने जन्म लिया, माँ ने सबको धारा में, न जाने क्योंकर फेंक दिया।
थे राजा चकित, और गंगा मुस्काती रहती थी; सुन्दर मृदु बदनी के, हर कामों की चिन्ता रहती थी।
ये तरुगी कहाँ पली होगी, और कैसे यहाँ चली होगी; थे उठते भाव दिलों में, शायद ये मुझे छली होगी।
सोचते केवल न पुछ पाते, वचनों ने उनको बाँधा था; पहले सात जब फेंक चुकी, तब वचनों को भी टाला था।
आंठवे को लेकर नदी किनारे, गंगा जब चली है; रोक न पाये अपने को, पुछे, क्यों पाप पर तुली है।
गंगा मुस्कायी मन में, बोली, क्यों हैं शर्तों को भूल गये; संतान प्रेम पालें हैं बढ़कर, भेद अभी ये खुल गये ।
लो इसे नहीं अब फेंकुगी, परिचय गंगा का जानो तो; सात बहे धारा में वसु थे, था शाप वशिष्ठ का जानो तो।
सातों को शाप मिला था, कि मृत्यु लोक में जायेंगे; पर चिन्ता थी उनको, कैसे झट लौट के आयेंगे।
उनकी सूनी रुदन थी, माँ उनकी ही मैं बनी थी; तुमको लुभाया मैंने, फेंका उनको जब जनी थी।
यह भाग्य है तुम्हारा, वसुओं के पिता बने हो; अन्यथा न आते मुझको, जैसे की साथ रहे हो।
जाती हूँ मैं वापस अब, जैसे की मैं चली थी; आठवाँ अभी न दूँगी, मातृत्व भर चली थी।
लेकर गोद गयी वह, बच्चा हुआ जो पैदा; देवव्रत पड़ा था नाम, इतिहास हुआ था पैदा।
चली गयी गंगा जो, तो राजा थे हुए विरक्त; भोगों से हट गये थे, हुए थे राजा तब सशक्त ।
करने शिकार एक दिन, गंगा के तट गये थे; देखा एक अलौकिक, वो दृश्य जो घट गये थे।
बहती हुई धारा भी, बाणों से रुक गयी थी; था युवक जो वहाँ पर, शक्ति मायामयी थी।
शान्तनु हुए थे दंग, और गंगा सामने आयी थी; देवव्रत है तेरा मेरा पुत्र, गंगा ने उन्हें बतायी थी।
शिक्षा इसे मिली है, ऋषि वशिष्ट के संग में; शास्त्र और शस्त्रों का कौशल, कुटा गया है अंग में।
शास्त्रों में है शुक्राचर्य, तो शस्त्रों में हैं परशुराम; ये तो कुशल एक योद्धा हैं, ये है एक नयनाभिराम ।
निज पुत्र को अब ले जाओ, ये साथ आपके जायेगा; कह चूम लिया माथे को, माँ का आशिष भी जायेगा।
अगर किसी तरुणी के होठों का मद, कभी पिया हो जिसने; मादकता को, मधु उरजों का, किसी यौवना का छुआ हो जिसने ।
फिर पुंकेसर का सींचन पराग में, किसी कली के, अगर किया हो जिसने; या बिछोह चंचल भार्या का, भरी जवानी में न सहा हो जिसने ।
काश ! अगर एक वज्र, गिरा हो ऐसे ही वस जिसपर; अतृप्त काम की नजरों को, क्यों न डाले किसी सुरभी बाला पर।
यदि रूप जवानी दोनों और सुरभित पुष्प कली हो; नदी तीर पर कहीं अगर वह, मन्द पवन से कम्पित हो।
ऐसे में पथिक गुजरता हो, बरबस मद होश हो जायेगा; तोड़ कली को रखूँ पास में, यह हलचल मन में आयेगा।
फूलों के डंठल में होंगे काँटे, तनिक भर सोच नहीं वह पायेगा; हाथ बढ़ायेगा चुपके वह, भले बींध रह जायेगा।
था सत्यवती ने दिया कुतुहल, यमुना तट पर राजा को; स्पन्दन अभिसुप्त काम से, मोहित शान्तनु हुए रूप को।
याचना प्रेम का कर बैठे, केवट कन्या के नयनों से; बोली, आशिष पिता का ले लो; दिल लगा टुटने शर्तों से ।
बेटी का बेटा, फिर उसका बेटा, राज करेगा बाद, यही कह दो; फिर ले जाओ इस रूपवाला को, पहले बस, तुम यही कह दो।
एक वज्र घात हुआ राजा पर, जग क्या समझेगा, रहने दो; गंगा सुत भी क्या समझेगा, मर जाना ही अच्छा होगा, रहने दो।
अतृप्त काम में वो ज्वाला है, हरा वृक्ष भी जल जाये; जब रमण कराने की वर्षा हो, शायद उसे बचा पाये।
और इसी चिन्ता से, बस राजा जलते जाते थे; रमण करे रमणी संग, सोच कृशकाय हुए जाते थे।
व्यथित पिता को देख, हर पुत्र द्रवित हो जाता है; दुर्लभ हो औषधि, वह खोज उसे ही लाता है।
किस बात की है चिन्ता, जो आप दुखी हैं रहते; देवव्रत ने पुछा, पिता श्री, क्यों आप दुखी हैं रहते।
निर्लज्ता थी आरुढ़ काम पर, दिलों की बात, पिता ने प्रकट किया; एक पुत्र कोई पुत्र नहीं, छद्म से शास्त्रों को ही प्रकट किया।
बोले, चिन्ता है बस ईसी की, इससे ही जल रहा हूँ; कैसे मिटेगी चिन्ता,बस सोचे ही गल रहा हूँ।
लगी देर नहीं पढ़ते भावों को, जो राजा ने नयनों में पाले थे;फिर बात सारथी ने खोला, बस भूले हैं, केवट कन्या के बालों में।
पहुँचे पास केवट के,कन्या से शादी, राजा का हो माँग दिये; और केवट के हर शर्तों को,बस एक-एक कर के मान लिये।
पितृ भक्त जो बालक था, तनिक नहीं बिचलित हुआ; आजन्म कुँवारा रह लूँगा, बेटा का नाम चिर लिखित हुआ।
एक कटु सत्य का जन्म हुआ,जिसकी न कभी भी आशा थी; और प्रतिज्ञा सुन रोमांचित, गूँज उठी तब दसों दिशा थी।
देवव्रत बन गया भीष्म,देवों ने भी फूल बरसाये; यह कैसा है भीष्म प्रतिज्ञा, जय घोष तभी थे लहराये।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की सैंतीसवी रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)
