
संक्षिप्त महाभारत
रचना :-
ऋषि पराशर ने बतलाया, कीर्त्तिमान ही कुछ कर सकते, हे पुत्र व्यास, जब वेदों का संकलन तुम्हीं ही कर सकते।
अब इस पावन कथा को, तुम ही संसार को दिये जा, है मानस पटल में तेरे, अब जग को उसे दिये जा।
कुछ चिन्ता में खोये, फिर ब्रह्मा से रोये; एक कथा जो मैंने सोची है, प्रभुवर, कैसे उसको बोंये।
हे वत्स ! श्री गणेश को याद करो, और आगे मत घबड़ाओ;
कह ब्रह्मा हुए विलीन, गजानन, अब तो राह दिखाओ।
मेरी कथा को प्रभुवर लिख दें, आपसे यह विनती है, कितने विध्नों को कांटे है, उसकी भी क्या गिनती है।
माना, पर मेरी भी है शर्त्त व्यास, कहते कथा रुके कभी तो, बस बीच छोड़कर जाउँगा।
थी कठिन शर्त्त, पर मान लिए, एक शर्त व्यास भी ठान लिए; श्लोकों का अर्थ समझ लिखना, बोलें, क्या इसको जान लिए ।
रोक न माये हँसी गजानन, व्यास की छोटी बातों पर; कहे तथास्तु, फिर लगे लिखने, कथित व्यास की बातों पर।
मोदक प्रिय की गति तेज से, व्यास संशंकित रहते थे; अर्थ समझने लगे देर, इस रूह श्लोक भी भरते थे।
लेखनी अर्थ समझने तक थमती,
और नया श्लोक ही बन जाता;
ऐसे ही महाभारत रचा गया,
ग्रन्थों में यही कहा जाता।
प्रसार :-
तैयार जब हुआ था,
प्रचार का न साधन था;
रहे सुरक्षित युग-युग,
इसका न कोई भी साधन था।
रुके नहीं प्रचार कभी भी,
निज पुत्र को आगे लाया गया,
और महाभारत की कथा,
शुकदेव की कंठ में पिलाया गया।
कथा देवों को पहले,
नारद ने सुनायी थी;
गन्धर्व, राक्षस, यक्षों को,
शुक्रदेव ने बतायी थी।
इस महायज्ञ में सुनकर,
सूत जी की लालसा बनी थी; नैभिषारण्य में तब,
ऋषियों की सभा ठनी था।
जनमेजय के नाग यक्ष में
जो कथा सुनी थी मैंने;
और कुरुक्षेत्र की रण-भूमि में
जैसे देखी थी मैंने।
इतनी सी बात कहकर,
सूत जी अब आगे बोले;
महाभारत की कथा को,
ऋषियों के बीच वे बोले ।
कथावस्तु :-
था राज हस्तिनापुर का, शान्तनु वहाँ के राजा थे; उनके बाद चित्रांगद, बाद विचित्रवीर्य भी राजा थे।
विचित्रवीर्य के दो पुत्रों में,
धृतराष्ट्र जन्म के अंधे थे;
सिंहासन पर पंडु बैठे,
वेन कभी भी मन्दे थे।
पांडु की बड़ी रानी कुन्ती थी,
छोटी रानी तो माद्री थी;
होगा कोई अपराध
वनवास, पांडु को, एक कहानी थी।
राजा वनवास को गये थे,
रानी या साथ में गयी थीं;
वनवास कट भी न सका था,
पांडु चल बसे थे;
पाँचों अनाथ बच्चे;
ऋषियों से गये पले थे।
बड़े की जब सोलह गाँठ,
जन्म के बंधे थे;
भीष्म को हस्तिनापुर में,
पांडु पुत्रों को सौंपे गये थे।
तेज था पांडवों में,
जो पराक्रम के बली थे;
शास्त्र-शस्त्रों में निपुण,
क्यों ऋषियों से जो पले थे।
बुद्धि और शील में पाँचों ने,
सबको मोह लिया था;
जलने लगे थे कौरव,
दुख देना, उन्हें शुरू किया था।
बैर बढ़ता गया था,
भीष्म ने संधि करायी थी;
कौरव, पांडवों के बीच,
तबही राज्य सीमा बँटाई गयी थी।
हस्तिनापुर कौरव को मिला था, उनको छोटा ही मिला था;
इन्द्रप्रस्थ में छोटा हिस्सा,
तनिक शांति तब ही मिली थी।
अजब था रिवाज चौरस का,
तब के सब राजाओं में,
राज्य तक की बाजी लगती,
तबके सब राजाओं में।
चौरस को खेला था एक बार,
धर्मराज व दुर्योधन ने;
धर्मराज थे एक तरफ,
शकुनि को रखा दुर्योधन ने।
कुटिलता धर्म पर छायी,
युधिष्ठिर को शकुनि ने हराया,
और छली कौरवों ने,पांडवों से क्या-क्या नहीं कराया।
छीना गया राज्य, छीनी गयी द्रोपदी; और बनवास वर्ष, बारह का हुआ; लक्षा-गृह में जलाये भी गये, अज्ञातवास अंतिम एक साल का हुआ ।
द्रुपद सुता को साथ लिए, पाँचों पांडव वनवास हुए, वनवास कटा, अज्ञात कटा, फिर वापस वे पहुँच चले।
दुर्योधन को लालच ने घेरा था, हड़पे राज्य ये फेरा था; पांडवों ने अपना हक माँगा, बोले, ये कभी न तेरा था।
कुरु पुत्रों ने उनको दिया नहीं, पांडवों ने दुःख को पिया नहीं; युद्ध होना ही था, रुका नहीं, कौरव कुल में कोई जिया नहीं।
बारह वर्ष जो जंगल काटे, छत्तीस राज चलाये थे; पोता परीक्षित जो बड़ा हुआ, गद्दी का राज बताये थे।
अपने करने तप चले, द्रौपदी साथ में लगी रही, साथ कटी थी जंगल में तो, तप में भी वह लगी रही।
महाभारत की ये कहानी,
संक्षेप ही में कही गयी;
अनगिनत रत्न है सागर में,
बस थोड़े में ही कही गयी।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की छत्तीस्वीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)
