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थैला-पैसा द्वन्द!

थैला-पैसा द्वन्द !

निकलो घर से आज, तुम्हें बतलाता हूँ; तंग अंधेरी नगरी वाले, आज तुम्हें बतलाता हूँ।
बन्द करो मुँह अपना, क्यों नाहक ही फैलाते हो; शर्म करो अपनी हालत पर, क्यों बढ़कर बात बनाते हो।
रे पगला तू क्या बोलेगा, छुपे-छुपे क्यों रहते हो; दशा देख ले अपनी तू, क्यों, ताले में बन्द बराबर रहते हो।
कहते तुमको लाज न लगती, क्यों सूई तुम्हें चुभायी जाती; दुर्बुद्धे ! क्या हरदम तुमको, नाथ-नाथ नहीं रखी जाती।
रे मति भ्रम, उल्लू के पट्टे, क्या होश गँवाकर आये हो; क्यों गला लगाकर भट्ठी में, तुम पिट-पिट नहीं आये हो।
बेशर्म ! ठोक कील लटकाये जाते, इतने पर भी होश नहीं; इसीलिए गर्दन में फाँसी, लगती तेरी कभी-कभी ।
चुप रह, छोड़ो शेखी अपनी, डर को पास तु आवोगे; तुम्हें छुपाकर रखु नहीं तो, रात क्या दिन में लूटे जावोग।
रे पेटू ! क्यों चुप न रहता, मेरे पास ही आवोगे; अगर न चाहूँ, पेट में अपने तू, एक दाना कभी ना पावोगे ।
रे अद्यम् ! मैं राजा के मुकुट में शोभु, ललनाओं के “हार में; इठलाकर तो मैं चलता हूँ, भरे हुए बाजार में।
मूर्ख ! अपने मुँह से आप बड़ाई, क्यों अक्ल गयी हैं तेरी मारीः राज’ तुम्हें कर बंद थैली में रखता, बोलो, तुम भारी या मैं भारी।
निर्लज्ज ! मैं रहता हूँ राजकोष में, सौदागर सेठों के घर में; तुम्हारे जैसा दर-दर मारा, कभी न फिरता घर-घर में।
अंधे ! कैसी है बकवास ये तेरी, राजा-रंक तो सब हैं मेरे;थैला का उपयोग नहीं बस, तुम्हें छुपाना, रहता हर समान अंदर में मेरे।
मैं न रहूँ तो तुम रोओगे, तुम भी नहीं बचोगे; तो दोनों मिल साथ रहे, और बचेंगे, नहीं रोयेंगे।
चलो मुझे तुम सैर करा दो, आज मुझे बाजार दिखा दो; बंद तिजोरी में दम घुटता, थोड़ी हवा लगा दो।
आज तेरा, मैं पेट भरूँगा, रख-रखने की नेकी को अब नहीं भूलूंगा; तेरे खातीर हाथों-हाथों,कोई ओर छोर अब नहीं छोडूंगा।
अपने पेट के अंदर रखकर, तुमको सदा बचायेंगे; और बना व्यापार नहीं तो श्रम से, तुम्हें पास फिर लायेंगे ।
जय पैसा की, जय थैला की, जय थैला की, जय पैसा की, जय दोनों की, कदम चाल की, रखे दोनों को, जो जैसा की।
रचनाकार:डॉ कृष्ण दयाल सिंह

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की सताइस्वी रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

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