नई दिल्ली/(भुनेश्वर भास्कर,कलाकार एवं कला लेखक) 31 अक्टूबर।किसी व्यक्ति ने बेचैन होकर पहली बार दाहिने पैर के अंगूठे से ज़मीन को खुरचा होगा तो ज़मीन पर कुछ रेखाएं उभर आई होंगी। जब उसने उन रेखाओं को देखा होगा तो उन रेखाओं के बीच अस्पष्ट आकृति नज़र आयी होगी। तब उस व्यक्ति ने उस आकृति को कुछ लोगों को दिखाया होगा। तब लोगों ने उसपर अपनी राय दी होगी। ऐसी ही स्थिति में रेखाएं हमारे बीच आयी होंगी। धीरे-धीरे समय बदलता गया। लोग नाखून, नुकीले पत्थर के टुकड़े एवं पतली लकड़ी के टुकड़े से ज़मीन, दीवार एवं कंदराओं के पत्थरों पर रेखांकन खींचकर अनगढ़ आकृतियां बनाने लगे। तब जीवन इस कदर विकसित नहीं था। लोग अपनी दिनचर्या में विभिन्न तरह के जीवन जीते थे। रेखाएं भी रेखा न होकर उनके जीवन में इस्तेमाल होने वाली चीजों की अनुकृति थी। शनै-शनै लोगों के भीतर कला की चेतना आती गयी और रेखाओं का स्वरूप बदलता गया। लोग रेखाओं के साथ जीने लगे। रेखाएं कला का एक माध्यम बनती गयीं। घरों को सजाने के लिए दीवार पर रंगों से विभिन्न तरह की आकृतियां बनाने लगे।
देश के विभिन्न भागों, क्षेत्रों में विभिन्न जाति-समुदाय के लोग रहते हैं। लोक जीवन में सभी के घर अलग-अलग तरह से जीने, खाने-पहनने के साथ-साथ अलग-अलग रीति-रिवाज एवं परंपराएं हैं। त्योहारों एवं परंपराओं के आयोजन के समय कला की विधिवत उपस्थिति है। जिसमें काफी विविधता है। कहीं रेखाओं का प्रयोग ज्यादा होता है तो कहीं रंगों का। एक कहावत है कि दो योजन पर पानी बदले चार योजन पर वाणी। इसी तरह भौगोलिकता के अनुसार बोली, भाषा के साथ-साथ कला के स्वरूप में भी बदलाव होता गया है। नाम अलग होता गया। झारखंड के हजारीबाग में दिवाली के एक दिन बाद सोहराई पर्व का आयोजन किया जाता है। उस दिन औरतें दीवार पर प्राकृतिक रंगों से विभिन्न तरह की आकृतियां यथा पशु-पक्षी, जानवर आदि का चित्रण करती हैं। वे खोरठा बोलती हैं।
इसी तरह महाराष्ट्र के पालघर इलाके में धान की खेती शुरू करने से पहले खेत में गोबर एवं सूखे पत्ते जलाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। इसे वरल कहा जाता है। इसी शब्द से वारली बना है। वारली जाति के लोग दीवार पर चावल, मिट्टी आदि से कृषि से संबंधित चित्रों को रेखांकित करते हैं। उड़ीसा के रायगडा क्षेत्र में जब खेत की फसल घर में आती है तो गांव का कुडंग बोई पूजा-अर्चना कराता है। उस समय अपने घर की दीवारों पर गेरू-चावल से अपने लोक देवता का चित्रण करता है और सौरा भाषा में गीत गाता है। उड़ीसा के विभिन्न मंदिरों की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से कहानीनुमा चित्रण करते हैं। इसे पटचित्र कहते हैं।
वही कलाकार अपने घर पर या बाजार में उन्हीं रंगों से कपड़ा पर चित्रण करते हैं। इसी तरह राजस्थान के भीलवाड़ा के शाहपुरा क्षेत्र में लोक देवी-देवताओं एवं पाबू महाराज तथा देवनारायण की जीवनी का चित्रण स्वनिर्मित कपड़े पर पत्थर से बने रंगों से किया जाता है। इसे फड़ कहा जाता है। इसी तरह मधुबनी क्षेत्र में बहुतायत रूप में सीता. राम, मछली, मानवाकृतियां आदि का चित्रण होता है। कहा जाता है कि राजा जनक की बेटी सीता की शादी के समय पूरे इलाके को सजाया गया था। उस समय से यह परंपरा चली आ रही है। कोहबर बनाने की परंपरा भी खूब है। इसी तरह बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में अगहन महीने के शुक्ल पक्ष द्वितीया को औरतें पिड़िया पर्व का अनुष्ठान करती हैं और सेम की पत्ती से हरा रंग बनाकर दीवाल पर पिड़िया माई की आकृति बनाती हैं। चावल से बने उजले रंग से रेखांकन करती हैं और सामूहिक रूप से गीत गाते हुए घी और सिंदूर से टीकती हैं।
इसी तरह मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में गोंड जाति के लोग शादी-विवाह एवं अन्य पर्व-त्योहारों के समय पहले दीवार पर गोबर का लेप लगाते हैं फिर इसके बाद पीली मिट्टी एवं काली मिट्टी से विभिन्न प्रकार की आकृतियां यथा पशु-पक्षी, कृषि से संबंधित वस्तुओं की आकृतियां आदि बनाते हैं। गोंड जाति के लोगों की इस कला परंपरा को गोंड कला कहते हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के मथुरा के आसपास के मंदिरों में पितृपक्ष के समय मंदिर की दीवारों एवं गर्भगृहों को खास पैटर्न में सजाया जाता है। इसे सांझी कला बोलते हैं। सांझी का मतलब सांझ होता है।
कहा जाता है कि राधा फूलों-पत्तियों से सुंदर पैटर्न बनाकर आकर्षक सजावट करती थी। उसी का अनुसरण करते हुए अन्य गोपियां भी यह कार्य करने लगीं। तब से यह प्रचलन में है। बज्जिका क्षेत्र में एक अलग तरह का कला रूप प्रचलित है। विभिन्न अवसरों पर इसका चित्रण होता है। इसी तरह भागलपुर एवं इसके आसपास के क्षेत्रों में जहां अंगिका बोली जाती है वहां बिहुला, बाला लखंदर, शिव, विषहरी, मनसा देवी का चित्रण कथा-कहानियों के आधार पर होता है। इसमें मुख्य रूप से हरा, पीला एवं गुलाबी रंग का प्रयोग होता है। इसी तरह कागज एवं गत्ते को पानी में फुलाकर तथा उसे कूट-कूटकर उसके लोंदे बनाने के बाद उससे कई तरह की वस्तुएं बनाकर उसे विभिन्न रंगों से रेखांकित करते हैं। इसे पेपर मेशी कहते हैं। कश्मीर में यह कार्य खूब होता है। इसी तरह उड़ीसा के गंजम जिले के कुछ गावों में दास जाति के लोग दुर्गा पूजा के समय दीवार पर प्राकृतिक रंगों से दुर्गा के साथ ही अन्य देवी-देवताओं का चित्रण करते हैं और उसकी पूजा-अर्चना करते हैं। इसे उषा कोठी कला कहते हैं। इसके साथ ही बंगाल के मेदिनीपुर जिले में चित्रकार लोग लंबे पेपर पर प्राकृतिक रंगों से कई तरह की आकृतियां बनाते हैं और बनाते समय उससे संबंधित गीत भी गाते हैं। इसी तरह झारखंड के देवघर में वैद्यनाथ धाम शैली में कलाकृतियां उकेरी जाती हैं। इसके अलावा आज बहुत सारे कलाकार रेखाओं के माध्यम से अपनी बातों के अभिव्यक्त कर रहे हैं। ऐसा ही कुछ महसूस हुआ विमला आर्ट फोरम, गुरुग्राम द्वारा अर्पणा आर्ट गैलरी, सिरीफोर्ट इन्स्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली में 28 अक्टूबर से 1 नवंबर 2023 तक आयोजित भारतीय लोक कलाकारों एवं समकालीन कलाकारों द्वारा सृजित एवं चित्रित कलाकृतियों को देखकर ।
प्रदर्शनी में शामिल लोक कलाकारों में अभिराम दास,पुरी, उड़ीसा, अभिशिखा जोशी, शाहपुरा, राजस्थान, अनुकृति कुमारी, भागलपुर, बिहार, अरुण कुमार साहू, गंजम, उड़ीसा, हेमा देवी, पटना, बिहार, जोगी सबर, रायगढ़ा, उड़ीसा, मस्सरत अली, श्रीनगर, कश्मीर, मोहन कुमार वर्मा, मथुरा, उत्तर प्रदेश, मोनिता सहाय, मुजफ्फरपुर, बिहार, नरेंद्र पंजियारा, देवघर, झारखंड, रामबाई तेकाम, भोपाल, मध्यप्रदेश, सहाजन चित्रकार, मेदनीपुर, पश्चिम बंगाल, सजवा देवी हजारीबाग, झारखंड, बालकृष्ण पन्हाड, पालघर, महाराष्ट्र, एवं विनिता कुमारी, रोहतास, बिहार हैं। समकालीन कलाकारों में भुनेश्वर भास्कर, दिल्ली, विपिन कुमार, गाजियाबाद, दिलीप कुमार शर्मा, दिल्ली,चेतन औदिच्य, उदयपुर, राजस्थान, कंचन मेहरा, गुरुग्राम, हरियाणा, मनहर कपाड़िया, अहमदाबाद, गुजरात, अरशद सौलेह, श्रीनगर, कश्मीर, रवि रंजन, दिल्ली, जय त्रिपाठी, गाजियाबाद, पंचानन समल, भुवनेश्वर, उड़ीसा, प्रमोद प्रकाश, मधुबनी, बिहार एवं श्रीनिवास चौधरी, मुजफ्फरपुर, बिहार हैं।
कई मायने में महत्वपूर्ण इस प्रदर्शनी को आयोजित करने के लिए संस्था के साथ ही संस्था के फाउंडर कंचन मेहरा, अध्यक्ष दिलीप कुमार शर्मा एवं संस्था के सभी सदस्यों को धन्यवाद।
