
RKTV NEWS/पटना(बिहार)07 अप्रैल।भारतीय नृत्य कला मंदिर में आयोजित किताब उत्सव के चौथे दिन सोमवार को छह सत्रों में कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत ‘किलकारी’ संस्था से जुड़े बाल कवियों के स्वरचित कविताओं के पाठ के साथ हुई। इसके बाद पूर्व डीजीपी अभयानंद की आत्मकथा ‘असीम’, फणीश सिंह और वन्दना राग द्वारा सम्पादित किताब ‘वैशाली की विरासत’ और संगीता मिश्र के कविता संग्रह ‘सीपी में शंखनाद’ का लोकार्पण हुआ। साथ ही फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और एलिस फ़ैज़ के एक-दूसरे को लिखे पत्रों के संग्रह ‘सुख़न तुम्हारे’, रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा ‘अपनी धुन में’ और गीतकार शैलेन्द्र के भोजपुरी गीतों पर चर्चा हुई।
‘वैशाली की विरासत’ किताब का लोकार्पण मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर ने किया। इस दौरान जावेद अख़्तर पाठकों से रू-ब-रू हुए और उनसे बातचीत की। 7 अप्रैल को शाम छह बजे से किताब उत्सव में जावेद अख़्तर की किताब ‘सीपियाँ’ के सन्दर्भ में प्रभात सिंह उनसे बातचीत करेंगे। इसके बाद वे पाठकों के साथ भी कुछ समय बिताएंगे।
‘दो इंकलाबी दिलों की ख़त-ओ-किताबत: सुखन तुम्हारे’
दूसरे सत्र में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और एलिस फ़ैज़ के एक-दूसरे को लिखे पत्रों के संग्रह ‘सुख़न तुम्हारे’ पर चर्चा हुई। इस दौरान किताब के अनुवादक ज़फ़र इक़बाल ने फैज़ से अपने लगाव पर बात करते हुए कहा कि एलिस को लिखे अपने ख़त में फैज़ अपने निजी दुःख को दुनिया के तमाम दुखों से जोड़ते हैं और जेल के कठिन हालातों में भी एलिस की चिंता करते नज़र आते हैं। उन्होंने कहा कि ये चिट्ठियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं और निजी अनुभवों को व्यापक मानवीय संवेदना में बदल देती हैं। सत्र के अंत में दीपशिखा ने किताब से कुछ पत्रों का पाठ किया।
रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा : ‘अपनी धुन में’ पर बातचीत
तीसरे सत्र में रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा ‘अपनी धुन में’ पर अनुवादक प्रभात सिंह से लेखक एवं रेडियो उद्घोषक यूनुस ख़ान ने बातचीत की। सत्र की शुरुआत करते हुए यूनुस ख़ान ने कहा कि यह किताब अनुवाद न लगकर स्वयं रस्किन बॉन्ड द्वारा लिखी गई प्रतीत होती है, जिसे पढ़ते हुए उनके उपन्यासों जैसा रस मिलता है।
वहीं प्रभात सिंह ने कहा कि उनकी चार पीढ़ियों ने रस्किन को पढ़ा है। इस किताब को उनकी रचना-प्रक्रिया को समझने के लिए पढ़ा जाना चाहिए। रस्किन बॉन्ड के लेखन में मौजूद डेज़ा वु प्रभाव को समझने के लिए उनके जीवन को जानना ज़रूरी है।
अनुवाद के दौरान आई चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कई बार अंग्रेज़ी मुहावरों के हिंदी रूपांतरण में कठिनाई हुई। इस प्रक्रिया में वे इतने रच-बस गए कि सपनों में भी अनुवाद करते रहे।
रस्किन बॉन्ड के जीवन के उतार-चढ़ाव पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि उनका अधिकांश जीवन अकेलेपन से भरा रहा। बचपन के एकांत से लेकर असफल प्रेम और पिता की मृत्यु तक। उन्होंने कहा कि यह किताब भले ही अनुवाद है, लेकिन वे इसे अपना हिस्सा मानते हैं।
रोचक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि रस्किन बॉन्ड स्वयं को हमेशा पहाड़ों का वासी मानते रहे। लंदन से लौटने के बाद भी उनका मन पहाड़ों में ही लगा रहा और वे दिल्ली में अधिक समय नहीं रह पाए। कई मौकों पर उन्हें अपने ही देश में बाहरी जैसा महसूस हुआ।
सुपर 30 के पीछे की सोच : ‘असीम’
अगले सत्र में पूर्व डीजीपी अभयानंद की आत्मकथा ‘असीम’ का लोकार्पण हुआ। इस दौरान डॉ. ऋषिकेश से बातचीत करते हुए अभयानंद ने कहा, पुलिस की निगरानी कौन करेगा से लेकर पुलिस की जिम्मेदारी तय करने तक कई सवाल इस किताब में हैं, जिनसे वे जीवनभर जूझते रहे। स्पीडी ट्रायल प्रक्रिया के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि पुलिस प्रशिक्षण के दौरान यह नहीं सिखाया गया था, लेकिन नालंदा में एक हत्याकांड की गुत्थी सुलझाते हुए उन्होंने पहली बार इसका प्रयोग किया और 20वें दिन सज़ा मुकर्रर हुई, जो पुलिस महकमे के लिए चौंकाने वाली घटना थी। उन्होंने कहा कि अपराधियों के मन में सज़ा का डर होना ज़रूरी है और सज़ा की सुनिश्चितता ही अपराध नियंत्रण का प्रभावी तरीका है।
सुपर 30 से अपने जुड़ाव पर उन्होंने कहा कि वे शुरू से शिक्षक नहीं थे, लेकिन डीआईजी रहते हुए बच्चों को पढ़ाने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि एक शिक्षक का असली कर्तव्य सही जवाब देना नहीं, बल्कि सही सवाल पूछना है।
वहीं डॉ. ऋषिकेश ने कहा कि यह एक ऐसे मन की यात्रा है जो लगातार सवाल करता है। एक पुलिस अधिकारी को उनकी यात्रा ने इंसान बनाकर रखा।
जावेद अख़्तर ने किया ‘वैशाली की विरासत’ किताब का लोकार्पण
पाँचवें सत्र में फणीश सिंह और वन्दना राग द्वारा सम्पादित किताब ‘वैशाली की विरासत’ का लोकार्पण जावेद अख़्तर ने किया। सत्र में वरिष्ठ कवि विजय कुमार चौधरी, वन्दना राग और गीताश्री ने वक्तव्य दिया। फ़नीश सिंह की स्मृति का ज़िक्र करते हुए विजय कुमार चौधरी ने कहा कि नालंदा, वैशाली और एथेन्स जैसे नाम जादू सा असर करते हैं। वैशाली प्रथम प्रजातंत्र रहा है और बुद्ध भी उससे प्रभावित थे तथा कई वर्षों तक वहाँ रहे। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर का जन्म भी वैशाली में हुआ। मध्यकाल में यहाँ सूफ़ी संतों की उपस्थिति रही। उन्होंने कहा कि इस किताब में इतिहास, राजनीति सहित कई आयामों की चर्चा की गई है।
किताब पर बात करते हुए गीताश्री ने कहा कि वैशाली की चर्चा आम्रपाली और बुद्ध के चार वर्षों के प्रवास के बिना अधूरी है। संविधान की परिकल्पना भी वैशाली से ही ली गई। आम्रपाली के माध्यम से उन्होंने वैशाली और लिच्छिवी परंपरा की पड़ताल की है।
वंदना राग ने इसे भावुक क्षण बताते हुए कहा कि इस किताब की प्रासंगिकता आज इसलिए है क्योंकि वैशाली में प्रतिरोध का स्वागत होता था, जबकि अब वैसी स्वतंत्रता नहीं रही, जिससे यह किताब आज के समय में और महत्वपूर्ण हो जाती है।
जावेद अख़्तर ने अपने संबोधन में कहा कि गर्व करने योग्य बातों का उल्लेख कम होता है और हम अपनी धरोहर भूलते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि एथिज्म का दौर पश्चिम में कुछ वर्षों पहले आया, जबकि भारत में यह हजारों वर्ष पुरानी परंपरा है। उन्होंने कहा कि हम जिस ज़मीन पर खड़े हैं, वह कभी रोशनी का ऊँचा मीनार थी, लेकिन हम अच्छी बातों को भूल जाते हैं। बुरी बातों को छोड़कर अच्छी बातों को याद रखना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि हम अपनी भाषा से कटते जा रहे हैं और ऐसे पेड़ बो रहे हैं जिनकी जड़ें नहीं हैं। अंग्रेज़ी की दौड़ में हमारी अपनी भाषाएँ पीछे छूटती जा रही है, जो चिंता का विषय है। बच्चों को पूरा पेड़ बनाने की ज़रूरत है, जिनकी जड़ें गहरी हो और इसमें किताबों की भूमिका बहुत अहम होती है। अंत में उन्होंने कहा कि वैशाली जैसे गणराज्य को समझने के लिए यह एक बेहद ज़रूरी किताब है, जिसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचना चाहिए।
शैलेन्द्र के भोजपुरी गीतों पर हुई चर्चा
अगले सत्र में गीतकार शैलेन्द्र के भोजपुरी गीतों पर केन्द्रित रहा जिसमें ‘उम्मीदों के गीतकार : शैलेन्द्र’ किताब के लेखक यूनुस ख़ान से निराला बिदेसिया की बातचीत हुई। शैलेन्द्र के साहित्यिक और सिनेमाई योगदान पर बात करते हुए यूनुस ख़ान ने कहा, शैलेन्द्र का भोजपुरी सिनेमा में प्रवेश ‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ जैसी ऐतिहासिक फिल्म से हुआ, जो भोजपुरी सिनेमा की पहली फिल्म मानी जाती है। उनके भोजपुरी क्षेत्र से गहरे जुड़ाव और मातृभाषा के प्रति आत्मीयता ने उनके गीतों को विशेष संवेदना दी। वे अपने निजी जीवन में भी भोजपुरी का प्रयोग करते थे और संगीतकार के साथ उनकी बातचीत भी प्रायः इसी भाषा में होती थी।
उन्होंने कहा कि शैलेन्द्र और राज कपूर की साझेदारी हिन्दी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली रचनात्मक संबंधों में से एक रही है। दोनों के बीच सिनेमा और संगीत को लेकर गहरी वैचारिक समानता थी, जिसने अनेक कालजयी गीतों को जन्म दिया।
हालांकि शैलेन्द्र ने लगभग छह भोजपुरी फिल्मों के लिए गीत लिखे, लेकिन ‘गंगा मैया…’ जैसा व्यापक प्रभाव अन्य गीतों को नहीं मिल सका। इसका कारण फिल्मों का अपेक्षित रूप से सफल न होना बताया गया, जिससे गीत भी व्यापक लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाए।
चर्चा में यह भी सामने आया कि कम उम्र में निधन और सीमित दायरे में काम करने के कारण शैलेन्द्र को वह व्यापक पहचान नहीं मिल सकी, जिसके वे हकदार थे। इसके बावजूद “भैया मेरे राखी के बंधन को” और “नानी तेरी मोरनी” जैसे उनके गीत आज भी हर पीढ़ी में लोकप्रिय हैं। द्वारा गाए गए उनके कई गीतों का विशेष उल्लेख किया गया।
सत्र के दौरान गीतकारों की तुलना के प्रश्न पर यह स्पष्ट किया गया कि और शैलेन्द्र की तुलना करना उचित नहीं है; प्रत्येक रचनाकार का मूल्यांकन उसके अपने कार्य और संदर्भ में किया जाना चाहिए।
शैलेन्द्र की रचनाशैली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लोकधर्मी दृष्टि और सहज भाषा रही, जिसने आम जन की भावनाओं को सीधे और प्रभावी रूप में अभिव्यक्त किया। शैलेन्द्र अपने दौर के अग्रणी गीतकारों में रहे, जिन्होंने अपने समय, समाज और लोकजीवन की संवेदनाओं को सरल लेकिन गहन शब्दों में ढाला।
नए इलाके में : काव्य पाठ
अंतिम सत्र काव्य-पाठ का रहा जिसमें आलोक कुमार श्रीवास्तव, निहारिका छवि, भावना शेखर, श्वेता सिंह उमा, रमेश ऋतंभर, रवीन्द्र भारती, राकेश रंजन, संगीता मिश्र, संजय कुमार कुंदन ने कविता पाठ किया। कार्यक्रम के अध्यक्षत आलोकधन्वा ने की, वहीं सत्र का संचालन डॉ. विनय कुमार ने किया। सत्र के अंत में संगीता मिश्र के कविता संग्रह ‘सीपी में शंखनाद’ का लोकार्पण हुआ।
