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गरीबन के होली!

फोटो सौ: सोशल मीडिया

गरीबन के होली

फटही बा हमरो, आ मेहरी के गुदरी, बहरी बुतुरवा वा लँगटे में लुढ़कल, बोलऽ कैसे खेलब हम होली हो।

तनीका धीरज तू धरऽ हो सजनी, नीयरे बा भोटवा के दिन, धोती-साड़ी के बन्धल वा आसरा हो, ऐही आसरा में खेलबऽ हम होली हो।

बज्र पड़ो, वोह सब कलमुँहन के, इहे सब खइलेबा हवाला के झोली हो, रंग-गुलाल के बात इ बतावे, ना समझे गरीबी, अपना रंगरेली में बोलऽ कइसे खेलब हम होली हो।

छलके गुलाल गाल फुलवा बा उनकर, इहाँ पिचकल बा गाल कटोरी अइसन; उहाँ चुटकी भर लागी, यहवा लागी पसेरी अइसन, काहे कि गाल गड़हा बनलवा इ खाड़ी अइसन ।

अत महँगा गुलाल ना मिली, बोलऽ कइसे खेलव हम होली हो।

होली के भस्म, गुलाल ह गरीबन के, रखवे बुझाता गुलाल ह गरीबन के; आ एहीं रखवे से खेली आपन होली हो।

नइखे पुआ-पकवान, एह से मत घबड़ायी जा, चलऽ अलुआ पका के, आज साथे-साथ खायी जा, ढीबरी में तेल नइखे, मत सकुचायी जा, बस चंदा के चाँदनी में प्यार के लुटायी जा

बीचे रख के बुतुरवा के, प्यार से नहलायी जा, नया आयी एक विहान, इहें आसरा जगायी जा, एही आसरा में खेलब आपन होली हो।

रचनाकार:डॉ कृष्णदयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ सिंह की वर्ष 1998 में प्रकाशित पहले काव्य संग्रह” यत्र तत्र” से ली गई है।रचनाकार डाक विभाग से सेवानिवृत अधिकारी है जिनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है)

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