सांस्कृतिक धरोहर और इतिहास को समझने की पहल।
खैरागढ़/छत्तीसगढ़ (रवींद्र पांडेय) 17 फरवरी। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग एवं कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा के संरक्षण में पुरालिपि एवं पुरालेख अध्ययन विषय पर आयोजित सात दिवसीय कार्यशाला का कल शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा, कार्यशाला के निर्देशक प्रो. डॉ. राजन यादव, विषय विशेषज्ञ डॉ. टी.एस. रविशंकर (भूतपूर्व निदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मैसूर), प्रभारी कुलसचिव वेंकट रमन गुड़े एवं संयोजक डॉ. आशुतोष चौरे द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया।
अतिथियों के स्वागत पश्चात कार्यक्रम के संयोजक डॉ. आशुतोष चौरे ने स्वागत भाषण में कार्यशाला के उद्देश्य एवं स्वरूप की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने इराक, मेसोपोटामिया तथा भारत जैसी प्राचीन सभ्यताओं का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए इतिहास और अतीत की समझ को वर्तमान समाज के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विभिन्न विषयों के विद्यार्थियों को पुरालिपि (प्राचीन अभिलेखों) के माध्यम से ऐतिहासिक ज्ञान से परिचित कराना है, ताकि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझ सकें। अंत में उन्होंने आयोजन के लिए कुलपति के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया।
कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध प्रदेश है। उन्होंने विद्यार्थियों को विशेषज्ञों के व्याख्यान से लाभान्वित होने और अपनी संस्कृति एवं इतिहास को गहराई से जानने के लिए प्रेरित किया। सिरपुर की अपनी हालिया यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रदेश की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत पर प्रकाश डाला। विषय विशेषज्ञ डॉ. टी.एस. रविशंकर ने भारत की समृद्ध अभिलेखीय परंपरा पर अपने विचार व्यक्त करते हुए अभिलेखीय साक्षरता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि प्राचीन अभिलेख हमारी अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें संरक्षित करना एवं समझा जाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि वे विस्मृति के गर्त में न जाए।
उन्होंने छत्तीसगढ़ की धरती को अभिलेखीय संपदा से परिपूर्ण बताते हुए इसकी सराहना की।
कार्यक्रम के अंत में अधिष्ठाता, कला संकाय एवं कार्यशाला निर्देशक प्रो. डॉ. राजन यादव ने कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ एवं सुमित्रानंदन पंत की पंक्तियों का सस्वर पाठ करते हुए प्रेरक उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास केवल अतीत की कथा नहीं बल्कि हमारी जड़ों और पहचान का आधार है। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. कौस्तुभ रंजन, सहायक प्राध्यापक द्वारा किया गया। उन्होंने इस कार्यशाला को विद्यार्थियों के लिए ऐतिहासिक धरोहरों को समझने का एक सशक्त मंच बताया। अंत में प्रभारी कुलसचिव वेंकट आर. गुडे ने उपस्थित अतिथियों, विश्वविद्यालय प्रशासन, संकाय सदस्यों, आयोजकों, शिक्षकों एवं सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

