
RKTV NEWS/डॉ परमानंद लाभ,11 जनवरी।हमारा पवित्र भारतवर्ष ऋषियों, मुनियों, सन्त-महात्माओं का देश है। स्वामी शुद्धानन्दजी भारती ने कहा- ” संत हीं भारतवर्ष के स्मृतिकार हैं, संत हीं उसके कवि हैं, संत हीं उसके संदेशवाहक हैं और संत हीं उसकी संतान को प्रेम, ज्ञान और का पाठ पढ़ानेवाले हैं। …
संत हीं मानव- जाति के प्राण हैं, संत हीं संसार-रुपी पादप के अमृत-फल हैं, संत हीं सभ्य समाज को प्रकाश देने वाले प्रदीप हैं। वे हीं पाप-ताप से पीड़ित मानव-जाति को ऊपर उठाने वाली शक्ति हैं। … ”
भक्त, श्रोत्रिय, महात्मा, ऋषि, मुनि, त्यागी, सन्यासी, तपस्वी, योगी, ध्यानी, ज्ञानी– ये शब्द वैसे जीवों की साधनावस्था में भले भिन्नार्थक हैं, तथापि उनकी सिद्धावस्था में एकार्थक ही होते हैं। ये भक्तादिक सभी परिपूर्ण सुनिष्पन्नावस्था में पहुंचकर ‘संत ‘ कहलाते हैं ; इसलिए कि वे ‘असत् ‘ से ‘सत् ‘ हो जाते हैं।
इन सबों के बावजूद प्राचीन परम्परा के मध्यनज़र कोई व्यक्ति संत कहलाने का अधिकारी तब होगा, जब उसके लिए कृष्ण यजुर्वेद का योगशिखोपनिषद् के अध्याय पांच में वर्णित श्लोक–
” भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया: ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिनदृष्टे परावरे। ”
अर्थात् उस परे-से-परे (ब्रह्म) को देख लेने पर हृदय की ग्रन्थि (गांठ) टूट जाती है, सभी संशय छिन्न हो जाते हैं और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। – यह वाक्य सार्थक हो चुका हो।
” शांति को जो प्राप्त कर लेते हैं, संत कहलाते हैं ” – कहते हुए आगे महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज आगे स्पष्ट करते हैं कि संतों के धर्म या मत को संतमत कहते हैं। इसीमें फिर कहते हैं- ” शांति प्राप्त करने का प्रेरण मनुष्यों के हृदय में स्वाभाविक ही है और प्राचीन काल में ऋषियों ने इसी प्रेरण से प्रेरित होकर इसकी पूरी खोज की और इसकी प्राप्ति के विचारों को उपनिषदों में वर्णन किया। … संतमत की मूल भित्ति तो उपनिषद् के वाक्यों को ही मानने पड़ते हैं; क्योंकि जिस ऊंचे ज्ञान का तथा उस ज्ञान के पद तक पहुंचाने के जिस विशेष साधन- नादानुसंधान अर्थात् सुरत- शब्दयोग का गौरव संतमत को है, वे तो अति प्राचीनकाल की इसी भित्ति पर अंकित होकर जगमगा रहे हैं। ”
इन्हीं उपनिषदों में से एक उपनिषद् है- ‘ कठोपनिषद् ‘। इसके अध्याय 1,वल्ली 3 ,मंत्र 14 में आया है-
” उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। ”
(अरे अविद्याग्रस्त लोगों ! ) उठो, (अज्ञान-निद्रा से) जागो और श्रेष्ठ पुरुषों के समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करो।
” उतिष्ठत ” – उठो खड़े हो जाओ (आलस्य त्यागकर)।
” जाग्रत ” – जागो, सचेत हो जाओ (अज्ञानांधकार से)।
“प्राप्य ” – प्राप्त करके, मिलकर।
” वरान्न ” – श्रेष्ठों, ज्ञानियों, गुरुओं से।
“निबोधित ” – ज्ञान प्राप्त करो, समझो।
यह श्लोक अथवा मंत्र मनुष्य को कर्मठ, जागरुक और ज्ञान के लिए प्रेरित करता है।
इसीमें आगे कहा गया है-
“क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति। ”
यानी, जिसप्रकार क्षुरे की धार तीक्ष्ण और दुस्तर होती है, तत्वज्ञानी लोग उस मार्ग को वैसा ही दुर्गम बतलाते हैं।
प्रसंग यह है कि पिता से बहिष्कृत नचिकेता यम के पास पहुंच कर आत्म- दर्शन का ज्ञान (तत्त्व-ज्ञान ) की मांग करता है। इसपर यम कहता है- हे नचिकेता! यह विषय बहुत कठिन है। अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त व्यक्ति ही उसका दर्शन कर पाते हैं। लेकिन, निराश होने की बात नहीं है। उठो, जागो और कर्म में निरत हो जाओ। जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो, अपने अभियान में शिथिलता नहीं आने दो।
यम आगे कहता है कि यह मार्ग कठिन है तथा छुरे की धार पर चलने के समान है। जो सब प्रकार की विषय-वासना, रुप, रस और स्पर्श से परे है, जो सदैव समानावस्था में रहता है, आदि-अंतरहित है, अभेद्य और अखण्ड्य है, बुद्धि के द्वारा गम्य नहीं है, वही मात्र उस परमात्मा को हृदयंगम करके मरणशीलता से अपनी रक्षा कर पाता है।
इसप्रकार यम ने नचिकेता को वह लक्ष्य- स्थान बतलाया, जहां पहुंचना मनुष्य-मात्र का कर्तव्य है।… सत्य का ज्ञान प्राप्त करने पर ही विजय मिलना संभव है। सत्य है मनुष्य की आत्मा, जो अपरिवर्तनीय है। स्वामी विवेकानंद ने यम के इसी ज्ञान का लोकीकरण किया।
स्वामी विवेकानंद ने देखा कि एक ओर सम्पूर्ण भारत दरिद्रता, अज्ञानता, अविद्या, अन्धविश्वास दु:प्रवृत्तियों के आवरण में अपने अतीत के गौरवशाली आदर्शों को विस्मृत कर चुका है तो दूसरी ओर प्रबुद्ध शिक्षित वर्ग, और खासकर युवा वर्ग भोगवादी प्रवृत्ति, फैशन व अंधानुकरण के जाल में फंसे हैं। उनकी अन्तरात्मा राजनीतिक दासता और आत्महीनता की मनोवृत्ति तले दब गई है।
ऐसे निराशा के कुहासा में भटके देशवासियों और अंधकारमय परिवेश के बीच स्वामी विवेकानंद ने सोये लोगों को जगाया और कठोपनिषद् में वर्णित एक संदेश को उनके सामने रखते हुए कहा –
” उतिष्ठत् जाग्रत प्राप्य वरान्नि बोधत ”
यानी, उठो ,जागो और ध्येय की प्राप्ति तक रुको मत।
तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए स्वामीजी भावी कार्यक्रम पर विचार करने लगे, चिंतनशील हुए। देश और देश से परे पाश्चात्य देशों में जाकर भारत की अध्यात्म विद्या प्रचार करने की ठान ली।
लोगों की धारणा थी कि भारत के लोग असभ्य हैं, उनके आचार-विचार तथा रहन-सहन निम्न कोटि का है ,स्वामीजी के सत् व सतत् प्रयास से समस्त प्रगतिशील राष्ट्रों में भारत को गौरव का स्थान प्राप्त हुआ।
स्वामी विवेकानंद ने अपने आध्यात्मिक गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के निमित्त ‘ रामकृष्ण मिशन एवं मठ ‘ की स्थापना की। इनकी मान्यता थी कि यदि सेवा के मार्ग में, समर्पण के भाव में मन को जोड़ना है, तो इस कार्य के लिए स्वयं को न्यौछावर कर देने की भावना होनी चाहिए।
वैसे भी स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन का उद्देश्य स्वयं को ऋषियों के आदेश में रहने की ठान ली थी, जो था – “मनुर्भव:”, अर्थात् मनुष्य बनो। उनकी दृष्टि में थी कि ‘न मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित ‘ ,यानी, मनुष्य से बढ़कर कुछ नहीं है। मानव और उसका सत्य सर्वोपरि है। इसप्रकार स्वामीजी के आदर्श मनुष्य की महत्ता की उद्घोषणा करते हैं। मनुष्य और मनुष्यता के प्रति गौरव व सम्मान की उनकी भावना हमारी संस्कृति का एक दिव्य पक्ष है। मनुष्य को मनुष्य संस्कृति बनाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को ‘मनुष्य ‘ के रुप में संस्कृति ही गढ़ती है। संस्कृति मनुष्यता की धुरी है।
11 सितंबर, 1893 को अमेरिका में आयोजित विश्व-धर्म-सम्मेलन में अपने मधुर कंठ से स्वामी विवेकानंद ने जब कहना आरंभ किया – “अमेरिका के भाईयों और बहनों ” – शब्द निकलते हीं सभा-स्थली तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी। आगे कहा – “एक ईश्वर सभी दिव्यताओं से ऊपर है, यह एक ऐसी चीज है जो सभी प्रकार की धार्मिकताओं, भक्ति, रूढ़िगत आचारों, मतों, मंतव्यों आदि से ऊपर है और यह वह धर्म है, जिसकी बुनियाद पर सारा संसार – पूरब और पश्चिम एकता के सूत्र में बांधा जा सकता है। ”
अमेरिका के समाचार पत्रों में छपा कि ” विवेकानंद बिना पूर्व लिखित भाषण के बोलते हैं। उनका व्यक्तित्व ईसा मसीह के गुणों से मिलता-जुलता प्रतीत होता है। उनका विचित्र भेश-भूषा, तेजस्वी व्यक्तित्व, वाक्पटुता और हिंदू धर्म को प्रस्तुत करने के ढंग ने हमारी का मन मोह लिया है। अंग्रेजी भाषा पर उनका प्रभुत्व है। वे एक युगपुरुष हैं। उन्हें देखने, उनका भाषण सुनने का हमें सौभाग्य मिला है। ”
अमेरिका के तत्ववेत्ताओं व दार्शनिकों ने स्वामी विवेकानंद और भारतीय दर्शन को अपने देश में स्थायित्व देने के लिए ‘वेदांत सोसायटी ‘ की स्थापना की। पुन: बुलाबे पर स्वामीजी इंग्लैंड गए और उन्होंने भारतीय दर्शन के परचम को वहां फहराने का काम किया।
स्वामी विवेकानंद निषेधात्मक शिक्षा के विरोधी और सकारात्मक शिक्षा के समर्थक थे। वे भारत में गतिशील जीवनदायिनी तथा संस्कृति के आदर्शों को उजागर करने वाली शिक्षा को लागू करने के आकांक्षी थे। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि शिक्षा अन्तर्निहित शक्तियों के प्रदर्शन का साधन है- मनुष्य के अंत: में विद्यमान पूर्णता का विकास करना हीं शिक्षा है। ऐसी शिक्षा चाहिए जो जीवन-निर्माण, मनुष्य-निर्माण और चरित्र-निर्माण में सहायक हो; जिससे चरित्र बने, मानसिक वीर्य बढ़े, बुद्धि का विकास हो और जिससे मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
स्वामी विवेकानंद वेदांत में निहित आदर्शों के अनुरुप राजनीति के स्वरूप का प्रतिपादक थे। जिस तरह ईसा से अर्से कवल आचार्य चाणक्य ने कहा था कि जहां का सांस्कृतिक पर्यावरण सही नहीं होगा वहां अराजकताऐं निश्चित होंगी, ठीक उसी प्रकार स्वामीजी ने देशवासियों को बताया कि जब भी राजनीतिक दृष्टि से कमजोर हुआ, उस समय देश में अशांति, अराजकता आयी। नैतिक बल तथा राष्ट्रीय चरित्र को आघात पहुंचा। स्वामीजी की राजनीति का स्वरूप मुख्य रूप से राष्ट्रीयता के धार्मिक सिद्धांत, स्वतंत्रता सम्बन्धी धारणा और प्रतिरोध के सिद्धांत पर आधृत था।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार, धर्म हमारे राष्ट्र का मेरुदंड है। मनुष्य जाति के लिए हिंदुओं के पास अगर कुछ देने के लिए है तो वह आध्यात्मिक प्रकाश हीं संसार को भारत की देन है।
स्वतंत्रता के संबंध में स्वामी विवेकानंद लिखते हैं- ” शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्वतन्त्रता की ओर अग्रसर होना और दूसरों को ऐसा करने के लिए सहायता करना हीं मनुष्य का सर्वोत्कृष्ट मूल्य है। ” वे जीवन, सुरक्षा, स्वतंत्रता, सम्पत्ति तथा विचार की अभिव्यक्ति आदि को मानव के विकास के लिए आवश्यक मानते थे। ‘स्व ‘ को समझने के लिए आजादी मानव जीवन के लिए उनकी दष्टि में उतनी ही आवश्यक है ,जितना हवा, पानी और भोजन।
ब्रिटिश शासन के अत्याचारों व अन्यायों के विरोध के ख्याल से उन्होंने प्रतिरोध सिद्धांत का प्रतिपादन किया। भारतवासियों के लिए उनका संदेश था और है, कि भय की कल्पना मात्र से मनुष्य आत्मविश्वास खो देता है और आत्मविश्वास के अभाव में अपने अंदर की असीम शक्तियों को भूल जाता है। उसका आत्मबल क्षीण हो जाता है।
स्वामी विवेकानंद का स्पष्ट कहना था- ” मेरे धर्म का सार शक्ति है। वह धर्म, जो हृदय में शक्ति का संचार नहीं करता,मेरे लिए धर्म नहीं है।चाहे वह उपनिषदों, गीता अथवा भागवत धर्म ही क्यों न हो, शक्ति धर्म से महान् है तथा शक्ति से बड़ी चीज कोई नहीं है। ” इसीलिए शक्ति के उपासक, आधुनिक भारत के निर्माता स्वामी विवेकानंद ने देश के नौजवानों को परिश्रमी बनने और शारीरिक व बौद्धिक दृष्टि से समर्थशाली बनने के लिए ललकारा, आह्वान किया।
उनका मानना था कि देह में निहित चेतन आत्मा हीं एक पूजनीय परमेश्वर है। नर की सेवा नारायण की सेवा है।… ईश्वर तक पहुंचने का सर्वोत्तम मार्ग मानव-सेवा हीं है।
स्वामी विवेकानंद भारत माता को केवल एक राष्ट्र नहीं, एक जाग्रत देवि मानते थे और भारतवासियों में देवदर्शन करते थे।
स्वामी विवेकानंद सबसे अधिक व्यक्ति के चरित्र-निर्माण पर बल देते थे। एक बार किसी सुंदरी ने उनके समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह उनके जैसा हीं सुंदर पुत्र पाने की उनसे अभिलाषा रखती है। उनका जवाब था- मैं ही तुम्हारा बेटा हूं, तू मेरी मां हो।
एक दफे किसी ने शक्ति के समर्थक स्वामी विवेकानंद से पूछा कि यदि कोई शक्तिशाली किसी दुर्बल का गला घोंट रहा हो तो क्या करना चाहिए ? उनका सीधा उत्तर था- उस शक्तिशाली का गर्दन टोप दो।
इसप्रकार भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक दीप स्वामी विवेकानंद देश के युवकों को सदैव जगाते रहे, उनमें निहित शक्तियों का उन्हें भान कराते रहे। उन्होंने युवाओं को सचेत करते हुए कहा- “गीता का उपदेश कायरों को नहीं दिया गया था, बल्कि वीर, पराक्रमी और गांडीवधारी अर्जुन को दिया गया था। तुम्हारे देश को वीरों की आवश्यकता है, अत: सदैव वीर बनो। ”
सारत: महान् दार्शनिक और भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की स्वामी विवेकानंद के संदर्भ में इस उक्ति को हमें हृदयंगम करना चाहिए – “हमें उनकी शिक्षाओं को संगृहीत करना है, उन्हें अपने जीवन में उतारना है और अपने आप को देश का योग्य नागरिक सिद्ध करना है,जिसने विवेकानंद को जन्म दिया है। वे चाहते थे कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति शक्ति, सौंदर्य, स्वास्थ्य, सम्मान के साथ-साथ सच्चे रुप में मनुष्य बनें। ”
आइए, मनुष्य को “मनुष्य” बनाने वाले (Men-maker) ऐसे युगपुरुष स्वामी विवेकानंद के सम्मान में शत-शत नमन अर्पित करें।
