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भोजपुर:जैन धर्म का सम्मान त्याग से ही है: मुनिश्री विशल्यसागर

आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)04 सितंबर।श्री चंद्रप्रभु मंदिर में विराजमान मुनि श्री विशल्यसागर जी महाराज ने पर्युषण महापर्व के अवसर पर त्याग धर्म पर धर्मोपदेश देते हुए बोले कि जैन धर्म का सम्मान त्याग के कारण ही है। आचार्य भगवन कहते है जिन-जिन वाह्य कारणों से आत्मा में विकार उत्पन्न हो रहे हैं उन्हें छोड़ने का नाम ही त्याग है। जो आत्म कल्याण में बाधक तत्व है उनका विसर्जन ही त्याग है। मोहमाया से मुक्त होने के प्रयास का नाम ही त्याग है। परमात्मा से सम्बन्ध बनाने का प्रयास ही त्याग है। सांसारिक ऐश्वर्य को छोड़कर आध्यात्मिक ऐश्वर्य की उपलब्धि का पुरुषार्थ ही त्याग है। संसार के प्रति मरना, सन्यास के प्रति जाग्रत होने का नाम ही त्याग है। वस्तु के त्याग के साथ उससे ममत्व भाव के छोड़ने का नाम ही त्याग है। आज आदमी वस्तु को तो छोड़ देता है पर ममत्व भाव को नहीं छोड़ पाता। इसलिए उसका त्याग अधूरा है। कई साधक यह कहते पाये जाते हैं कि जिस समय मैंने घर छोड़ा मेरे पास इतनी सम्पत्ति थी, तो उनका घर तो छूट चुका पर ममत्व, स्मृति व वचन के रूप में सम्पदा के प्रति आसक्ति नहीं छूटी। इसलिए ऐसा त्याग अहंकार के जागरण में कारण होता है। भगवान महावीर स्वामी कहते हैं- छोड़ो, क्योंकि जितना छूटेगा उतना ही दुःख मिटेगा। भगवान आदिनाथ से महावीर स्वामी तक सभी तीर्थंकरों ने मात्र छोड़ा है उसी का परिणाम है कि उन्हें मुक्ति मिली है। उन्होंने कहा भी है- ‘त्येन त्यक्तेन भुंजितः’ जितना आदमी छोड़ता है वैसा ही भोगता है। मैंने एक घर की रोटी छोड़ी सैकड़ों घरों की रोटियाँ हे स्वामी! नमोऽस्तु, नमोऽस्तु कहकर बुलाने लगी। एक छप्पर छोड़ा, सारा आकाश छप्पर हो गया। एक माता-पिता परिवार छोड़ा, सारा विश्व परिवार हो गया। एक घर की सुरक्षा छोड़ी, सारा समाज सुरक्षा में तल्लीन हो गया। कहने का तात्पर्य इतना ही है कि जो जितना छोड़ता चला जाता है वह उससे कई गुना ज्यादा पा जाता है पर पाने का भाव नही होता। इसलिए मानवता के शिखर का स्पर्श करने के लिए त्याग आवश्यक है। मीडिया प्रभारी निलेश कुमार जैन ने बताया कि जैन मन्दिरों में भक्तगण जिनेन्द्र प्रभु की भक्तिपूर्वक अभिषेक, पूजन, भक्ति आराधना कर अपने जीवन को सार्थक कर रहे हैं। पर्युषण महापर्व में “उत्तम त्याग धर्म” आत्मा के अंदर के राग-द्वेष को छोड़ने और पर द्रव्यों से मोह त्यागने का प्रतीक है, जो आध्यात्मिक शुद्धि के लिए आवश्यक है।

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