
पटना/बिहार (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)14 अगस्त।बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय, मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग, बिहार सरकार द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित महत्वपूर्ण घटनाओं एवं व्यक्तियों के संबंध में जनमानस में जागरूकता के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से अभिलेख प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता रहा है।
इसी श्रृंखला में स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय द्वारा आज अभिलेख भवन के प्रागंण में ‘अभिलेखों में 1857 ई० का विद्रोह और बिहार विषय पर अभिलेख प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। प्रदर्शित अभिलेखों की विषय वस्तु अविभाजित बिहार के पटना, शाहाबाद, तिरहुत, सारण, पलामू आदि क्षेत्रों में 1857 ई0 के विद्रोह की गतिविधियों एवं उसे दबाने के लिए औपनिवेशिक शासन द्वारा किए जा रहे कठोर प्रयासों पर आधारित है। इनमें पीर अली खान एवं उनके अन्य साथियों को फाँसी की सजा, बाबू वीर कुंवर की आरा और उसके आसपास के क्षेत्रों में विद्रोही गतिविधियाँ, कुंवर सिंह के सहयोगी अमर सिंह से संबंधित ब्रिटिश पत्राचार, दानापुर छावनी में सैनिकों को विद्रोह के लिए उकसाने एवं राजद्रोह के आरोप में विद्रोही हरकिशन सिंह के मुकदमे की कार्यावाही, निशान सिंह की गिरफ्तारी, शाहाबाद के निःशस्त्रीकरण के अंग्रेजी प्रयास, पटना डिवीजन में 1857 ई0 के विद्रोह भाग लेने वाले व्यक्तियों की सूची आदि से संबंधित महत्वपूर्ण अभिलेखों को शामिल किया गया है। प्रदर्शित अभिलेख भारतीय स्वतंत्रता के प्रारंभिक संघर्ष में बिहार की महत्ती भूमिका को उजागर करते हैं।
प्रदर्शनी में प्रदर्शित अभिलेख में ब्रिटिश सरकार के 22 जून, 1857 के उस आदेश को भी लगाया गया है जिसमें नारायण सिंह फकीर, ज्वाला सिंह और रामदास को शाही सैनिकों को विद्रोह के लिए उकसाने के लिए छः महीने की कारावास की सजा सुनाई गयी थी।
पीर अली खान ने 3 जुलाई 1857 को पटना में विद्रोह का नेतृत्व किया। पीर अली खान को सार्वजनिक रूप से 07 जुलाई, 1857 ई0 को अन्य विद्रोहियों घसीटा खलीफा, गुलाम अब्बास, नंदूलाल उर्फ सिपाही, जुम्मन, मडुवा, काजिल खान, रमजानी, पीर बख्स, पीर अली, वाहिद अली, गुलाम अली, महमूद अकबर और असरार अली खान के साथ फॉसी दे दी गयी थी। इससे संबंधित अभिलेख भी अवलोकनार्थ प्रदर्शित किए गए है।
प्रदर्शनी में अंग्रेज अधिकारियों द्वारा लिखे गए कई ऐसे पत्रों को प्रदर्शित किया गया है जिसमें सासाराम और उसके आसपास के क्षेत्रों में कुंवर सिंह के नेतृत्व में विद्रोहियों की अंग्रेजों के साथ लड़ाइयों का वर्णन है। वहीं गोरखपुर, बलिया और आजमगढ़ में कुंवर सिंह की सेना ने जिस तरह से अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया, उसका भी उल्लेख मिलता है। कुंवर सिंह के लगभग 9 महीने के ऐतिहासिक लान्ग मार्च को मानचित्रों के माध्यम से प्रदर्शनी में अवलोकनार्थ रखा गया है। अभिलेखों से इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि अंग्रेजी सरकार कुंवर सिंह से इतनी भयभीत थी कि उनके जगदीशपुर से वापस लौटने के सभी रास्तों पर प्रतिबंध लगा दिए गए थे। कुंवर सिंह को जीवित पकड़ लाने हेतु अंग्रेजी सरकार द्वारा 25,000 रूपये का ईनाम देने से संबंधित 21 अप्रैल, 1858 को कलकत्ता गजट में उद्घोषणा प्रकाशित की गयी थी।6 सितंबर, 1857 को पटना के कमिश्नर ई० ए. सैमुअल्स का सचिव, बंगाल सरकार के लिखे पत्र में बिहार में 1857 के विद्रोह के फैलाव और उसके दमन हेतु ब्रिटिश सरकार द्वारा जो दमनात्मक कार्यवाही की गयी, उसकी विस्तृत चर्चा मिलती है।
अभिलेख निदेशक डॉ. मो. फैसल अब्दुल्लाह ने प्रदर्शनी के आयोजन की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को जानने की जरूरत है, क्योंकि अतीत की आधारशीला पर हीं एक सशक्त राष्ट्र और समाज का विकास हो सकता है। उन्होंने शोधार्थियों एवं विशेष रूप से स्कूल के छात्र-छात्राओं से प्रदर्शनी को देखने एवं अवलोकन करने की अपील की। प्रदर्शनी को सफल बनाने में उदय कुमार ठाकुर, सहायक अभिलेख निदेशक एवं मो. असलम, डॉ. भारती शर्मा, डॉ. शारदा शरण, डॉ. रश्मि किरण, राम कुमार सिंह, सरपंच राम, पल्लवी आनंद, रामाशीष कुमार, पंकज कुमार ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
