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धार्मिक ग्रंथ एवं भगवान के स्वरूप के साथ छेड़छाड़ के खिलाफ कानून बनना चाहिए : श्री जीयर स्वामी जी महाराज

सन्यासी को यह चार काम नहीं करना चाहिए : श्री जीयर स्वामी जी महाराज
भगवान श्री राम, भगवान वामन, गंगा जी एवं यमुना जी का जन्मस्थली है बक्सर : श्री जीयर स्वामी जी महाराज

भगवान धन्वंतरि और मोहिनी अवतार में भगवान का लीला स्वरूप का वर्णन
भगवान वामन के लीला स्वरूप का वर्णन

कामवासना पर नियंत्रण होना चाहिए

RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)25 जुलाई।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि वैदिक सनातन परंपरा के धार्मिक ग्रंथ एवं भगवान के अलग-अलग स्वरूपों के साथ छेड़छाड़ के खिलाफ सरकार को कठोर कानून बनाना चाहिए। जितने भी धार्मिक ग्रंथ हैं, उनके खिलाफ कभी भी कोई भी व्यक्ति कुछ भी बोलने लगता है। जिससे वैदिक सनातन संस्कृति पर गहरा चोट पहुंचाया जाता है। इसके खिलाफ कठोर कानून बनाना चाहिए।
साक्षात परम ब्रह्म परमेश्वर भगवान विष्णु के द्वारा अलग-अलग अवतार लेकर मानव के लिए मर्यादा इत्यादि को सुनिश्चित किया गया हैं। वही आज समाज में भगवान के अलग-अलग स्वरूपों के द्वारा भी छेड़छाड़ किया जा रहा है। स्वामी जी ने उदाहरण देते हुए कहा कि एक फोटो में शिव जी के चित्र को छेड़छाड़ करके उनके हाथ में चिलम पकड़ा करके बनाया गया। इस प्रकार के कई ऐसे भगवान के चित्रों के साथ छेड़छाड़ किया जाता है। जिससे समाज में भ्रम की स्थिति पैदा होती है। मानव जीवन जीने के लिए सदाचार जरूरी हैं। उसके लिए भगवान के द्वारा स्थापित 50000 करोड़ वर्ष पूर्ण वैदिक परंपरा के साथ किसी भी प्रकार के छेड़छाड़ के लिए सरकार को इसके खिलाफ कठोर कानून बनाना चाहिए।

सन्यासी को यह चार काम नहीं करना चाहिए

भारत के महान मनीषी संत पूज्य श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज ने अपने पूरे जीवन काल में संन्यास के मर्यादा के साथ जीवन व्यतीत किया था। स्वामी जी ने कहा कि पूज्य गुरुदेव कभी भी अपने जीवन काल में संन्यास से समझौता नहीं किए थे। आज कुछ लोग सन्यास धारण करते हैं, लेकिन संन्यास का पालन नहीं करते हैं। सन्यासी को अग्नि, स्त्री, भोजन बनाना एवं तंत्र मंत्र जादू टोना से दूर रहना चाहिए। यह सन्यासी के लिए वर्जित है।

भगवान श्री राम, भगवान वामन, गंगा जी एवं यमुना जी का जन्मस्थली है बक्सर : श्री जीयर स्वामी जी महाराज

बक्सर भगवान श्री राम की जन्मस्थली है। भगवान श्री राम का जन्म सूर्यवंश में हुआ था। भगवान सूर्य के पिता का जन्म बक्सर में हुआ था। इसीलिए कोई भी व्यक्ति जिसके माता-पिता का जन्म स्थान जहां पर होता है, वहां से कहीं जाकर के बाहर घर बना लेता है, तब भी उसका जन्म स्थान उसके माता-पिता के स्थान को माना जाता है। इसीलिए भगवान श्री राम की जन्मस्थली बक्सर है। भगवान श्री राम का बक्सर केवल शिक्षस्थली ही नहीं बल्कि जन्मभूमि भी है।
कश्यप अदिति के पुत्र सूर्य देव थे। सूर्य देव के वंश परंपरा में भगवान श्री राम का जन्म हुआ। जबकि कश्यप ऋषि का जन्मास्‍थली बक्सर है। इसीलिए उनके वंश परंपरा में भगवान श्री राम जन्म लिए जिसके कारण उनका भी मूल जन्म स्थान बक्सर हुआ।

भगवान वामन का भी जन्मस्थली है बक्सर

भगवान विष्णु के 15वें अवतार वामन भगवान का भी जन्मस्थली बक्सर है। जब राजा बलि के द्वारा देवताओं से पूरे राज पाट को छीन लिया गया था। तब देवता लोग भगवान विष्णु से जाकर के प्रार्थना किए, भगवान हम लोगों की रक्षा कीजिए। वही भगवान विष्णु वामन के रूप में अवतरित हुए थे। जिसके बाद भगवान वामन राजा बलि से तीन पग भूमि की मांग किए थे। राजा बलि ने तीन पग भूमि दान करने का वचन दिए। जिसके बाद वामन भगवान ने दो ही पग में पूरे आकाश पाताल को माप लिया था।
जिसके बाद वामन भगवान तीसरे पग में राजा बलि के शरीर को माप लिए। इस प्रकार से राजा बलि से पूरे पृथ्वी को मुक्त कराए। राजा बलि को भगवान वामन रसातल लोक में लेकर चले गए। जहां पर राजा बलि और उनके पूरे परिवार के लोग उनके साथ गए। जिसके बाद पूरे पृथ्वी को राक्षस से भगवान वामन ने मुक्त कराया।
गंगा और यमुना जी का भी जन्मस्थली है बक्सर। जब वामन भगवान का जन्म हुआ, उस समय ब्रह्मा जी वामन भगवान के पैरों को धो करके कमंडल में रखे थे। वही जल स्वर्ग लोक में नदी में डाला गया। बाद में वही शंकर जी के जटा में समेटा गया। वही गंगोत्री से गंगा जी निकली। जिनका मूल स्थान तो बक्सर से ही है। क्योंकि भगवान श्रीमन नारायण के चरण के जल से ही गंगा जी का आगमन हुआ था। गंगा जी वामन भगवान की बेटी हैं, इसीलिए उनका भी जन्मस्थली बक्सर हुआ।
वही सूर्य भगवान की बेटी यमुना जी हैं। इसीलिए जब सूर्य भगवान का जन्मस्थली बक्सर है तो उनकी पुत्री का भी जन्म स्थान बक्सर ही हुआ। इसीलिए गंगा जी और यमुना जी का भी जन्मस्थली बक्सर है।
14वां अवतार भगवान का नरसिंह अवतार जब हिरण्‍यकश्‍यपु के द्वारा लगातार देवताओं को परेशान किया जा रहा था तब देवता लोग भगवान से प्रार्थना किए। तब भगवान ने कहा कि अभी आप लोग इंतजार करिए, जब प्रहलाद का जन्म होगा उसके बाद ही हम अवतार लेकर हिरण्‍यकश्‍यपु को समाप्त करेंगे। वहीं प्रहलाद जी हिरण्‍यकश्‍यपु के पुत्र के रूप में हुए। जो भगवान के अनन्य भक्त हुए। राक्षस के पुत्र के रूप में जन्म लेने के बाद भी निरंतर भगवान श्रीमन नारायण का मनन, चिंतन, पूजन करने वाले प्रहलाद जी हुए।
प्रहलाद जी के पिता हिरण्‍यकश्‍यपु को यह सब चीज अच्छा नहीं लग रहा था। जिसके कारण प्रहलाद को खत्म करने के लिए कई प्रकार के षड्यंत्र रचे। कभी पानी में डूबा कर, कभी अग्नि में जलाकर, कभी हाथी से कुचल कर मारने का प्रयास किया गया। फिर भी प्रहलाद जी को कुछ नहीं हुआ। तब एक दिन हिरण्‍यकश्‍यपु ने सोचा कि स्वयं ही इसको खत्म कर देते हैं।
वहीं हिरण्‍यकश्‍यपु ने प्रहलाद जी से कहा तुम्हारे भगवान कहां है। प्रहलाद जी ने कहा भगवान आपके शरीर में भी है। मेरे शरीर में भी है। हर जगह पर भगवान वास करते हैं। वही हिरण्‍यकश्‍यपु ने कहा कि क्या भगवान तुम्हारे इस खम्‍भे में भी हैं। प्रहलाद जी ने कहा हां भगवान हर जगह पर है तो दिखाओ तुम अपने भगवान को वहीं भगवान नरसिंह खंबे से प्रकट हुए। जो हिरण्‍यकश्‍यपु को खत्म किए। वहीं भगवान का नरसिंहा अवतार हुआ। भगवान नरसिंह का उपासना करने से जीवन में जितने भी प्रकार की ग्रह इत्यादि का दोष होता है, वह समाप्त हो जाता है। भगवान नरसिंह कालों के महाकाल हैं। जिनके नाम स्मरण करने से सभी प्रकार के ग्रह नक्षत्र दोष इत्यादि का मार्जन हो जाता है।
श्रीमद्भागवत कथा अंतर्गत भगवान के 24 अवतार में भगवान का 12वां अवतार धनवंतरी के रूप में हुआ था। जब देवताओं और दैत्यों को द्वारा समुद्र मंथन करके अमृत की खोज की जा रही थी। उस समय भगवान धन्वंतरि समुद्र से प्रकट हुए थे। देवताओं और राक्षसों के द्वारा समुद्र मंथन के समय कई चीजों को समुद्र से निकल गया था। उस समय समुद्र से विष भी निकाला था। जिसका पान शंकर जी के द्वारा किया गया था। क्योंकि उस विष से पृथ्वी पर बहुत ज्यादा नुकसान हो सकता था। वही भगवान शंकर जी विष का पान कर लिए, जिसके कारण उनका कंठ नीला पड़ गया। तभी से शंकर जी का नाम नीलकंठ भी पड़ गया।
वही समुद्र मंथन के समय अमृत कलश को लेकर के भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। जिसके बाद उस अमृत कलश को भगवान ने देवताओं को दे दिया। देवताओं और दैत्यों के बीच में विवाद हुआ। जिसके बाद दैत्य अमृत कलश को लेकर के भागने लगे। वही बाद में देवताओं के द्वारा भगवान विष्णु से प्रार्थना किया गया। भगवान किसी भी प्रकार से इस अमृत कलश को दैत्य से मुक्त कराया जाए। जिसके बाद भगवान विष्णु मोहिनी का अवतार लिए थे।
भगवान का 13वां मोहिनी अवतार हुआ था। जिनका स्वरूप एक सुंदर स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। उन्हें मोहिनी के स्वरूप में देखकर के दैत्‍य लोग आकर्षित हो गए। जिसके बाद स्वयं ही दैत्य ने अमृत कलश को मोहिनी के रूप में भगवान विष्णु को दे दिया। जिसके बाद मोहिनी रूप में भगवान राक्षसों और देवताओं को अलग-अलग पंक्ति में बैठाए। मोहिनी के रूप में भगवान ने दैत्य से कहा कि अमृत कलश में सबसे ऊपर पतला अमृत है, उसको देवताओं को पहले पिला दिया जाए और नीचे जो अमृत कलश में अच्छा अमृत है, उसको आप सभी लोगों को पिलाया जाएगा। वहीं मोहिनी रूप में भगवान विष्णु सबसे पहले देवताओं को अमृत का पान कराने लगे।
उसी समय में एक राक्षस देवता का स्वरूप बनाकर के देवताओं के पंक्ति में आकर के बैठ गया। उसने भी अमृत का पान कर लिया। तभी भगवान मोहिनी के उस राक्षस के रूप को पहचान लिए। जिसके बाद उसको मारने के लिए अपना सुदर्शन चक्र छोड़ दिए। वहीं राक्षस दो भाग में कट गया। लेकिन उसने अमृत का पान कर लिया था। जिसके कारण अमर हो गया था। वहीं राक्षस राहु और केतु के रूप में देवताओं के रूप में भी माने जाते हैं।
इधर राक्षसों ने सोचा कि यह मोहिनी के रूप में स्त्री बहुत देर से अमृत का पान केवल देवताओं को करा रही है। हम लोगों के साथ लगता है किसी भी प्रकार का छल किया गया है। वहीं राक्षस समझ गए कि यह भगवान विष्णु हैं। जो मोहिनी के रूप में हम लोगों के साथ छल किए हैं। जिसके बाद फिर से झगड़ा हुआ। राक्षसों को अमृत नहीं मिल पाया जिसके बाद राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य के द्वारा राक्षसों को मंत्र के द्वारा अमृत का पान कराया गया। क्योंकि शुक्राचार्य को अमृत पान की मंत्र से पान कराने की शक्ति प्राप्त थी। वहीं राक्षसों को उनके द्वारा मंत्र से अमृत का पान कराके उनको अमृत को प्राप्त कराया गया। जिसके कारण राक्षस भी अमृत का पान कर पाए। इस प्रकार से भगवान धन्वंतरि और मोहिनी का अवतार हुआ।

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