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क्यों लिखें अपनी किताब?

RKTV NEWS/रवींद्र पांडेय,11 जुलाई।समय तेजी से बदल रहा है। हम यंत्रों पर इतने निर्भर हो गए हैं कि स्वयं यंत्र बन गए हैं। हम दुनिया से जुड़ रहे हैं, लेकिन अपने से और अपने समाज से कट रहे हैं। लेखन की पद्धतियां बदल गई हैं। अब हम अपनी भावनाएं पत्रों में नहीं लिखते। पत्र-पत्रिकाओं की संख्या कम हो रही है। सब कुछ सोशल मीडिया पर आ गया है। लेकिन ध्यान देने की बात है कि सोशल मीडिया पर प्रकाशित रचनाएं ‘हवा मिठाई’ की तरह होती हैं। यहां उड़ेले गए विचार न तो किसी को स्थापित लेखक बना सकते हैं, न ही ये विचार इतिहास में कहीं दर्ज होंगे।
यहां यह चर्चा करना प्रासंगिक है कि हम अपनी किताब क्यों लिखें? मैं आपको ध्यान दिलाने की कोशिश करता हूं कि यदि आपके पास किसी भी प्रकार का अनुभव है, तो आपको अपनी एक किताब जरूर लिखनी चाहिए। क्यों लिखनी चाहिए? उसका कुछ कारण है। हमारे शास्त्रों में कई प्रकार के ऋण की बात की गई है। जैसे पितृ ऋण। जब हम खुद अपना पुत्र पैदा करते हैं तो पितृ ऋण से मुक्त हो जाते हैं।
लेकिन जरा सोच कर देखिए कि आपके जीवन का जो खट्टा-मीठा अनुभव है, वह अन्य लोगों तक पहुंचना चाहिए या नहीं? भूत में सहेजे गए अनुभव ही भविष्य का निर्माण करते हैं। यदि एडिसन का अनुभव नहीं होता, यदि कालिदास का अनुभव नहीं होता, तुलसीदास ने रामचरितमानस नहीं लिखी होती, वेदव्यास ने किताबें नहीं लिखी होतीं, श्री कृष्ण ने गीता नहीं बोली होती, तो आज हम कितनी बड़ी संपदा से चूक जाते। कृष्ण इस धरती पर आते, लेकिन यदि गीता न आती तो कृष्ण का आना एक काल विशेष के लिए महत्वपूर्ण हो गया होता। लेकिन गीता आने से युगों-युगों तक कृष्ण का आना सार्थक रहा।
आपके पास अनुभव है। उस अनुभव से आप अपना जीवन जी रहे हैं, लेकिन क्या ऐसा नहीं लगता कि आपको अपने अनुभव से बहुत लोगों को प्रभावित करना चाहिए। अपना अनुभव बांटकर आप लोगों की जिंदगी में गुणात्मक बदलाव ला सकते हैं। आपने जो इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टीज अपने भीतर डेवलप की है, उसका लाभ सोसाइटी को भी मिलना चाहिए।
हर युवा के मन में सफलता का एक पैमाना होता है। खुद की कमाई से एक अच्छा घर बनाए। एक अच्छी गाड़ी ले। उसका लाइफ स्टाइल बेहतर हो। यह उचित भी है। पर उस युवा के मन में सफलता का यह पैमाना भी बनना चाहिए कि अपने जीवन काल में एक किताब जरूर लिखे। भौतिक संपदा महत्वपूर्ण है। पर उससे भी महत्वपूर्ण है वैचारिक संपदा। आपकी भौतिक संपदा आपके या आपके परिजनों के काम आती है। पर आपकी वैचारिक संपदा का लाभ पूरी दुनिया के काम आ सकता है। बिना किसी संदेह के आपको इस पर भरोसा करना चाहिए कि आप विशिष्ट हैं। हर व्यक्ति विशिष्ट होता है।
प्राचीन काल में जब वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था थी, तो वे लोग जिनके पास जीवन की संपदा, अनुभव की संपदा, एकत्र हो गई वे लोग बाणप्रस्थ आश्रम बनाते थे। फिर गांव के बच्चों को बुलाकर जीवन की शिक्षा दिया करते थे। इसके बाद वे संन्यास आश्रम में जाते थे। लेकिन आज हम ऐसा कर रहे हैं क्या? जरा सोच कर देखिए, क्या हम अपने अनुभव से आगामी पीढ़ी को कुछ सिखा पा रहे हैं? उनका मार्गदर्शन कर पा रहे हैं? और यदि नहीं कर पा रहे हैं, तो क्या हमें करना नहीं चाहिए? और यदि करना चाहिए तो किताबें क्या युगों-युगों तक हमारी पीढ़ी को सिंचती नहीं रहेंगी? एक बार यदि आपने किताब लिख दी तो युगों-युगों तक आने वाली पीढ़ियां आपके अनुभव का लाभ लेकर के अपने जीवन को संवारती रहेंगी और आपको याद करती रहेंगी। यश तो वैसे भी मनुष्य की सबसे बड़ी ख्वाहिश है।

रवींद्र पांडेय(संपर्क :6202586817)

हर आदमी यश प्राप्त करना चाहता है। किताब आपको यशस्वी बना देती है। किताब हमें सामाजिक ऋण से मुक्त करती हैं।
एक और कारण यह भी है कि जब आप किताब लिखते हैं, तो अपने जीवन के गहराई में उतरते हैं। जीवन की गहराई में उतरना बहुत जरूरी है, क्योंकि हम जब तक अपने जीवन की गहराई में उतर कर आत्मनिरीक्षण नहीं करते हैं, तब तक हम खुद को भी तो नहीं समझ पाते। जब हम किताब लिखने जाते हैं, अपने अनुभवों को बारीकी से देखते हैं, उनका निरीक्षण करते हैं, उनका अवलोकन करते हैं, तो इससे दूसरे का विकास बाद में होगा, हमारा विकास सबसे पहले।
अब आप कह सकते हैं कि आपको किताब लिखना नहीं आता। तो मैं कहूंगा कि आपको तो घर बनाना भी नहीं आता। तो वह कैसे बन जाता है? आपके मन का नक्शा लेकर आप उसके पास जाते हैं, जिसे घर बनाना आता है। घर बनाने में आप उसकी सहायता लेते हैं और घर बन जाता है। बिल्कुल इसी तरह आपकी किताब भी बन जाएगी। बिल्कुल आसान है। मैं आपको प्रेरित करता हूं। इसपर गंभीरता से विचार कीजिए। खुद को अकेला मत समझिए। मैं आपके साथ हूं।

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