
आरा/भोजपुर 27 जून।बिहार कृषि आधारित गांवों का राज्य है जहां कृषकों का मुख्य पेशा कृषि है।अधिक से अधिक कृषकों का लाभ हो,कम समय में ज्यादा उत्पादन किया जा सके और उन्नत किस्म के बीज और खेती की नई तकनीक की जानकारी बिहार सरकार और केंद्र सरकार अपने कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों के माध्यम से अवगत करा रही है। वर्तमान मौसम खरीफ फसल धान के लिए उपयोगी है। इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर दिनेश प्रसाद सिन्हा ने कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर नरेश प्रसाद से बातचीत की है।अत्यधिक धान उत्पादन के संबंध में इन्होंने बताया की किसके लिए कृषकों को मिट्टी मृदा और जल आदि की व्यवस्था चाहिए। धान की उच्च उत्पादकता एवं मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है । फसल की आवश्यकता, मृदा परीक्षण रिपोर्ट एवं जलवायु परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए उर्वरकों का उचित मात्रा में प्रयोग करें। धान में प्रायः नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P), पोटाश (K) एवं जिंक (Zn) की कमी देखी जाती है। नाइट्रोजन की मात्रा को तीन भागों में विभाजित कर के दें – पहली खुराक रोपाई के 10-15 दिन बाद, दूसरी कूड़ाई/कल्ले निकलने की अवस्था (Tillering) के समय तथा तीसरी फूल निकलने से पहले । फास्फोरस, पोटाश एवं जिंक की पूरी मात्रा खेत तैयारी के समय मिट्टी में मिला दें।जैविक उर्वरकों जैसे गोबर की सड़ी खाद, वर्मी कम्पोस्ट एवं नीमखली का प्रयोग मृदा में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाकर पोषण उपलब्धता में सुधार करता है । साथ ही, धान के खेतों में रोपाई के 15-20 दिन बाद खेत में नील-हरित शैवाल (Blue Green Algae) को 12-15 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से डालें, जिससे खेत में नाइट्रोजन की प्राकृतिक उपलब्धता बढ़े और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटे । साथ ही, बिचड़ों पर पत्ती धब्बा, झुलसा या अन्य फफूंद जनित रोगों से सुरक्षा हेतु फफूंद नाशी दवाओं का छिड़काव करें, जैसे मैनकोजेब + कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें ।
जिंक सल्फेट को खेत में फास्फेटिक उर्वरक के प्रयोग के 24-48 घंटे के अंतराल पर प्रयोग करें।
