जब दुल्हा बना!
सताइस अप्रैल उन्नीस सौ चौरासी
पारीवारिक रजामंदी
मेरी मौन स्वीकृति
बात बनी तिलक हुआ
पांच बजे निकली बारात
पहुंचने में हुई आधी रात
रस्म अदायगी
सुबह तक शादी
शाम तक जोड़ा बनकर वापस।
तब से आज तक
खुशियों के गीत गाता हूं
साथ चलता और वादा निभाता हूं
पति पत्नी का रिश्ता सदा अक्षुण्ण रहे,न टूटे न छूटे अंतिम सांस तक चलता रहे।

हनुमान जी का दर्शन
संकट मोचन है हनुमान
विध्न बाधाओं को करते पार
नाम स्मरण से बनता काम
मेरे राम मेरे श्याम वीर हनुमान


