
आरा/ भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)07 अप्रैल।देवीशंकर अवस्थी सम्मान 2024 दलपतसिंह राजपुरोहित को ‘सुन्दर के स्वप्न’ नामक आलोचनात्मक पुस्तक के लिए दिया गया है। राजपुरोहित अमेरिका की टेक्सस यूनिवर्सिटी, ऑस्टिन में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। 5 अप्रैल 2025 को संध्या 5:30 बजे साहित्य अकादमी सभागार, नई दिल्ली में उन्हें वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने यह सम्मान प्रदान किया। जिसे उनकी अनुपस्थिति में उनके मित्र अजय यादव ने प्राप्त किया।सम्मान समारोह में ‘आस्था की विडम्बनाएं’ विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन भी किया गया। जिसमें पुरुषोत्तम अग्रवाल, रमाशंकर सिंह और सुधा रंजनी को आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी जी ने की।
एम.एम.महिला कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ सुधा रंजनी ने आस्था को मानवीय जीवन का अनिवार्य अंग मानते हुए इस बात को रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति के साथ संवाद और संबंध पहले विश्वास और बाद में आस्था में बदलता है लेकिन आस्था में विवेक का होना आवश्यक है। उनका मानना था कि स्त्रियां आस्था से अधिक संचालित और प्रभावित होती हैं क्योंकि उनका जीवन आशंकाओं और अनिश्चितताओं से भरा है। आजकल आस्था के नाम पर आक्रामकता का संस्कार दिया जा रहा है। स्त्रियां भी पहले की तरह शिष्ट, सभ्य और अहिंसक नहीं रहीं बल्कि उनमें भी हिंसा और आक्रोश पुरूषों की अपेक्षा कम नहीं है। आस्था का न तो दुरुपयोग होना चाहिए और न ही उसे विवेकहीन। कार्यक्रम में दिल्ली के जाने-माने साहित्यकारों अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

