RKTVNEWS/रवींद्र पांडेय 09 जून।मंगरा आज बहुत टेंशन में था। उसका बीपी अवसरवादी सेंसेक्स की तरह बिहेव कर रहा था। कभी आसमान में। कभी धड़ाम। हृदय में तूफान सा आया हुआ था। अजीब-अजीब सी आवाजें आ रही थीं- खटाखट… फटाफट…। इस खटखट-फटफट में पता ही नहीं चला कि क्या-क्या उड़ गया। सारे नारे उड़ गए। वादे उड़ गए। दावे उड़ गए। कबूतर जा… जा… वाला मामला बन गया। उसे पता था – जनता बेवफा होती है। इसलिए जनता को प्राथमिकता में रखना नासमझी मानी जाती। जनता से कोई उम्मीद न थी। इसलिए जनता से कोई शिकायत भी न थी। सारी शिकायतें राम जी से थीं। और ये वाजिब थीं। क्योंकि आसरा भी राम जी का ही था। मन में सुमिरन चलता रहता था – तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार… उदासी मन काहे को करे। … अब प्रभु की लीला। प्रभु जी ही जानें! तभी महसूस हुआ कि उसके शरीर में थरथरी सी हो रही है। टांगें कांप रही हैं। अचानक चिंता चिंतन में बदल गई। उसे लगा कि मनुष्य एक बेवश प्राणी है। उसकी टांगें उसे बेवश बनाती हैं। इन टांगों की कोई उपयोगिता नहीं है। टिटहरी की टांगों की उपयोगिता समझ में आती है। वे आसमान को धरती पर आने से रोकने का पुण्य कार्य करती हैं। पूरी सृष्टि को बचाए रखने में उसका अप्रतिम योगदान है। समस्त जगत उसकी कृपा पर टिका है। उसे यह मानने का पूरा अधिकार है कि ईश्वर ने उसको इस सृष्टि के रक्षार्थ ही धरती पर भेजा है। पूरे विश्व को उसका आभार मानना चाहिए।

वह विश्व रत्न जैसे किसी सम्मान की अधिकारी है। हे प्रभु! टिटहरी की टांगों को सलामत रखना। पर मनुष्य को आपने टांगें क्यों दे दीं? और देनी थी तो दो ही क्यों दीं? चार-छह दे देते तो क्या मुश्किल आती? कम से बैठने के लिए कुर्सियां तो न ढूंढ़नी पड़तीं। चलिए माना कि आपने दो ही टांगें दीं, तो फिर उसमें खींचने का सिस्टम देने की क्या जरूरत थी? टांगों के खिंच जाने का दर्द आप नहीं जानते प्रभु! अच्छा भला आदमी बैसाखियों पर आ जाता है। आपको पता नहीं है कि बैसाखियों की कितनी वेरायटी मार्केट में है। एक से बढ़कर एक बैसाखियां हैं। इनको खरीदना आसान नहीं। किसी पर एमआरपी तो लिखी नहीं होती कि गए और दाम देकर खरीद लिए। ये मुंहमांगे दाम पर मिलती हैं। और मुंह भी ऐसा जैसे सुरसा से कंपीटिशन चल रहा हो। ये जड़ बैसाखियां नहीं हैं। चेतन हैं। इनके पास मुंह होता है। दांत होते हैं। आंतें होती हैं। बहुत ही उन्नत किस्म का पाचन तंत्र होता है। बहुत ही भयानक टाइप की महत्वाकांक्षा होती है। कई बार तो ये खुद को बैसाखी मानती ही नहीं। टांगों जैसा बिहेव करने लगती हैं। ये आपस में बातें करने लगती हैं। सेटिंग करने लगती हैं। ये बैसाखियां बहुत सताती हैं। इनको बर्दाश्त करने की शक्ति देना प्रभु! दर्द आपने दिया है। दवा की उम्मीद भी अब आपसे ही है। जनता के लिए कोई चिंता नहीं है। वह तो जनार्दन है। सब समझती है। बैसाखी वाले के आगे हाथ नहीं पसारती। उससे कोई उम्मीद भी नहीं पालती।
