दिल्ली सरकार का फैसला अवसर भी है और चेतावनी भी।
नई दिल्ली/प्रोफेसर बीके सिंह*(रसायन विज्ञान विभाग,दिल्ली विश्वविद्यालय)दिल्ली में नए निजी विश्वविद्यालयों के गठन का रास्ता खोलने का दिल्ली सरकार का फैसला पहली नजर में उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम दिखाई देता है। बढ़ती आबादी, उच्च शिक्षा की लगातार बढ़ती मांग और रोजगार की बदलती प्रकृति को देखते हुए विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाना निश्चित रूप से आवश्यक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या *विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाना ही उच्च शिक्षा के विस्तार का पर्याय है?*
इस प्रश्न का उत्तर आसान नहीं है। क्योंकि विश्वविद्यालय केवल इमारत, स्मार्ट कक्षाओं, आधुनिक प्रयोगशालाओं और चमकदार परिसर का नाम नहीं है। विश्वविद्यालय एक ऐसी बौद्धिक संस्था है जहां ज्ञान पैदा होता है, प्रश्न पूछे जाते हैं, असहमति का सम्मान होता है, शोध होता है और समाज को नई दिशा देने वाली पीढ़ियां तैयार होती हैं। इसलिए दिल्ली में निजी विश्वविद्यालयों को अनुमति देने का निर्णय केवल प्रशासनिक या आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि दूरगामी सामाजिक और शैक्षणिक परिणामों वाला फैसला है।
सरकार के निर्णय का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि इससे उच्च शिक्षा में निजी निवेश बढ़ सकता है। सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की क्षमता सीमित है। लाखों विद्यार्थी हर वर्ष उच्च शिक्षा के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। ऐसे में नए विश्वविद्यालय सीटों की उपलब्धता बढ़ा सकते हैं। आधुनिक पाठ्यक्रम, उद्योग-अकादमिक सहयोग, नई तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा साइंस, जैव-प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में निजी संस्थान अपेक्षाकृत तेजी से कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं।
यदि इन संस्थानों में पर्याप्त निवेश, योग्य शिक्षक और विश्वस्तरीय शोध सुविधाएं हों तो दिल्ली के शिक्षा तंत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है। निजी क्षेत्र की दक्षता और सरकारी संस्थानों की अकादमिक परंपरा एक-दूसरे के लिए चुनौती ही नहीं, प्रेरणा भी बन सकती है।
सरकार द्वारा दिल्ली के विद्यार्थियों के लिए 25 प्रतिशत सीटों का प्रावधान प्रस्तावित करना भी स्वागतयोग्य है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है—दिल्ली में स्थापित विश्वविद्यालयों का लाभ स्थानीय विद्यार्थियों को मिले। लेकिन यहां एक असुविधाजनक प्रश्न भी है: *क्या सीट मिलना ही अवसर मिलना है?*
यदि फीस इतनी अधिक हो कि सामान्य मध्यमवर्गीय या निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को वहां भेज ही न सकें, तो 25 प्रतिशत सीटों का प्रावधान कागज पर आकर्षक और व्यवहार में सीमित साबित हो सकता है। इसलिए स्थानीय विद्यार्थियों के लिए सीटों के साथ-साथ पर्याप्त छात्रवृत्ति, फीस में पारदर्शिता और जरूरत-आधारित वित्तीय सहायता भी अनिवार्य होनी चाहिए।
यहीं से निजी विश्वविद्यालयों की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है— *शिक्षा और बाजार के बीच संतुलन।*
निजी निवेश अपने साथ पूंजी लाता है, लेकिन पूंजी स्वाभाविक रूप से प्रतिफल भी चाहती है। उच्च शिक्षा यदि केवल निवेश और लाभ के गणित में फंस गई तो विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र के बजाय डिग्री प्रदान करने वाले महंगे संस्थान बन सकते हैं। देश में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जहां शानदार परिसर तो दिखाई देते हैं, लेकिन स्थायी संकाय, गुणवत्तापूर्ण शोध और मजबूत अकादमिक संस्कृति का अभाव है।
इसलिए दिल्ली सरकार को एक बात बिल्कुल स्पष्ट करनी होगी— *विश्वविद्यालय खोलने की अनुमति आसान हो सकती है, लेकिन विश्वविद्यालय चलाने की जवाबदेही बेहद कठोर होनी चाहिए।*
नए विश्वविद्यालयों के लिए केवल जमीन, भवन और वित्तीय क्षमता को पर्याप्त मान लेना गंभीर भूल होगी। स्थायी और योग्य शिक्षकों की नियुक्ति, शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात, प्रयोगशालाओं की गुणवत्ता, पुस्तकालय, शोध सुविधाएं, अकादमिक स्वतंत्रता, पारदर्शी प्रवेश व्यवस्था, फीस नियंत्रण, छात्र कल्याण और शोध की गुणवत्ता को मान्यता की अनिवार्य शर्त बनाया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शोध का है। यदि निजी विश्वविद्यालय केवल बीबीए, बीसीए, एमबीए, इंजीनियरिंग, कानून और अन्य लोकप्रिय पाठ्यक्रम चलाकर फीस वसूलने तक सीमित रहेंगे, तो उन्हें विश्वविद्यालय कहना ही विश्वविद्यालय की अवधारणा को कमजोर करना होगा। विश्वविद्यालय की पहचान इस बात से होनी चाहिए कि वह *क्या नया ज्ञान पैदा कर रहा है,* न कि केवल कितने विद्यार्थी दाखिला ले रहे हैं।
इस संदर्भ में दिल्ली के मौजूदा सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की उपेक्षा सबसे बड़ी नीति-गत भूल होगी।
दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों ने दशकों में जो अकादमिक प्रतिष्ठा अर्जित की है, वह रातोंरात नहीं बनी। इन संस्थानों ने देश को वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासक, न्यायविद, लेखक, राजनयिक और सार्वजनिक जीवन के असंख्य प्रतिभाशाली लोग दिए हैं। नए निजी विश्वविद्यालयों को बढ़ावा देना उचित हो सकता है, लेकिन इसकी कीमत पर सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में निवेश कम करना आत्मघाती होगा।
वास्तव में सरकार को निजी और सार्वजनिक शिक्षा को *प्रतिद्वंद्वी नहीं, पूरक* मानना चाहिए।
यदि निजी विश्वविद्यालयों को भूमि, सुविधाएं और नियामकीय छूट मिलती है, तो सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के लिए भी पर्याप्त वित्तीय संसाधन, आधुनिक प्रयोगशालाएं, नए संकाय पद, शोध अनुदान और छात्र सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए। सरकार को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि निजी विश्वविद्यालय सार्वजनिक संस्थानों की कमी की भरपाई कर देंगे।
एक और गंभीर मुद्दा है— *नियमन* ।
भारत में उच्च शिक्षा का अनुभव बताता है कि किसी संस्था को विश्वविद्यालय का दर्जा देना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उसकी गुणवत्ता बनाए रखना कठिन। इसलिए दिल्ली में नए निजी विश्वविद्यालयों के लिए ऐसी स्वतंत्र और पारदर्शी निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए जो सरकार और संस्थान दोनों से पर्याप्त दूरी रखते हुए काम करे।
प्रत्येक निजी विश्वविद्यालय की नियमित अकादमिक ऑडिट हो। फीस, शिक्षक संख्या, शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात, शोध प्रकाशन, प्लेसमेंट, छात्रवृत्ति और वित्तीय स्थिति जैसी सूचनाएं सार्वजनिक की जाएं। केवल वेबसाइट पर उपलब्ध आकर्षक दावों के आधार पर संस्थानों की गुणवत्ता निर्धारित न हो।
*और सबसे जरूरी—अकादमिक स्वतंत्रता।*
निजी विश्वविद्यालयों में भी शिक्षक केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि ज्ञान-सृजन की प्रक्रिया के स्वतंत्र सहभागी हैं। यदि प्रबंधन का हस्तक्षेप अकादमिक निर्णयों पर हावी हो गया तो विश्वविद्यालय की आत्मा ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए नियुक्ति, पदोन्नति, शोध और पाठ्यक्रम निर्माण में स्पष्ट अकादमिक मानदंड आवश्यक हैं।
दिल्ली सरकार के सामने असली चुनौती अब विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि *विश्वविद्यालय संस्कृति को मजबूत करने की है।*
निजी विश्वविद्यालयों के प्रवेश से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तो सार्वजनिक विश्वविद्यालयों पर भी अपने पाठ्यक्रम, प्रशासन, शोध और छात्र सेवाओं में सुधार का दबाव आएगा। यह सकारात्मक परिणाम होगा। लेकिन प्रतिस्पर्धा तभी स्वस्थ होगी जब सभी के लिए समान और पारदर्शी नियम हों।
इसलिए सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि नए निजी विश्वविद्यालय केवल आर्थिक रूप से सक्षम विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित द्वीप न बन जाएं। सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त छात्रवृत्ति, फीस सहायता और अवसर सुनिश्चित किए बिना निजीकरण सामाजिक न्याय के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।
अंततः बहस निजी बनाम सरकारी विश्वविद्यालय की नहीं होनी चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि *दिल्ली को कैसी उच्च शिक्षा चाहिए?*
हमें ऐसे विश्वविद्यालय चाहिए जो केवल रोजगार देने वाले संस्थान न हों, बल्कि रोजगार पैदा करने वाले नवाचार केंद्र बनें। ऐसे विश्वविद्यालय चाहिए जो केवल डिग्रियां न दें, बल्कि ज्ञान पैदा करें। ऐसे विश्वविद्यालय चाहिए जहां प्रयोगशालाएं हों तो उनमें शोध भी हो; शिक्षक हों तो उन्हें अकादमिक स्वतंत्रता भी मिले; विद्यार्थी हों तो उन्हें समान अवसर भी मिले; और निवेश हो तो उसका लाभ समाज तक भी पहुंचे।
दिल्ली सरकार का निर्णय इसलिए एक बड़ा अवसर है—लेकिन यह अवसर तभी उपलब्धि में बदलेगा जब सरकार निजी निवेश को *सार्वजनिक उत्तरदायित्व* से जोड़े।
अन्यथा खतरा यह है कि दिल्ली में विश्वविद्यालयों की संख्या तो बढ़ जाएगी, लेकिन उच्च शिक्षा की गुणवत्ता वहीं की वहीं रह जाएगी।
*दिल्ली को विश्वविद्यालयों की बाढ़ नहीं चाहिए। उसे ऐसे विश्वविद्यालय चाहिए जो ज्ञान, शोध, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व के वास्तविक केंद्र बन सकें।*
यही इस निर्णय की सबसे कठिन, लेकिन सबसे जरूरी कसौटी है।

