
भोपाल /मध्यप्रदेश ( मनोज कुमार प्रसाद) 29 जून। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती. वह हमारी पहचान, हमारी स्मृतियों और हमारी आत्मा का विस्तार होती है।
लेखक श्री निगम ने कहाँ कि जब तक हम अपने परिवेश में रहते हैं, उसकी उपस्थिति सहज लगती है, लेकिन अपनी मिट्टी से दूर जाने पर उसकी वास्तविक कीमत का एहसास होता है।
भोपाल के हिंदी भवन में “हिंदी मेरी नहीं, हमारी भाषा” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए मुझे अपने जीवन की एक ऐसी यात्रा साझा करने का अवसर मिला, जिसने हिंदी के प्रति मेरी पूरी दृष्टि बदल दी।
भारत में रहते हुए मैंने कभी अलग से महसूस नहीं किया कि हिंदी मेरे जीवन का कितना अभिन्न हिस्सा है।
मैं हिंदी बोलता था, हिंदी में सोचता था और सपने भी हिंदी में ही देखता था।
यह सब इतना स्वाभाविक था कि उसकी महत्ता पर कभी विशेष विचार ही नहीं किया।
उन्होंने कहाँ कि लेकिन जैसे प्यास लगने पर पानी का मूल्य समझ आता है, वैसे ही हिंदी का महत्व मुझे तब समझ आया, जब मैं इंग्लैंड पहुँचा।
श्री निगम ने विदेश में जीवन की तमाम सुविधाओं के बीच सबसे बड़ी कमी अपनी भाषा की महसूस हुई। वहाँ यह एहसास हुआ कि भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, बल्कि अपनेपन का सबसे सशक्त आधार होती है। अंग्रेज़ी कामकाज की भाषा हो सकती है, लेकिन दिल की भाषा नहीं।
मेरे जीवन का सबसे यादगार अनुभव पेरिस में हुआ। मैं एफ़िल टॉवर के नीचे खड़ा था कि पीछे से किसी ने पूछा, “आप एमपी से हैं?”
मैंने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “हाँ।”
बातचीत आगे बढ़ी तो भोपाल का ज़िक्र आया, फिर सुभाष नगर का। उस क्षण लगा मानो मैं हजारों किलोमीटर दूर किसी विदेशी शहर में नहीं, बल्कि अपने ही मोहल्ले में किसी पुराने परिचित से मिल रहा हूँ। पूरी बातचीत हिंदी में हुई और उसी पल मुझे महसूस हुआ कि हिंदी केवल “मेरी” भाषा नहीं रही, बल्कि “हमारी” भाषा बन गई है। उसने दो अजनबियों को कुछ ही मिनटों में अपना बना दिया।
विदेश में रहते हुए यह देखकर भी गर्व हुआ कि लंदन में हिंदी यूके, पुरवाई मैगज़ीन और भारतीय उच्चायोग जैसे संस्थान हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।
यह इस बात का प्रमाण है कि हिंदी अब केवल भारत की भाषा नहीं, बल्कि दुनिया भर में बसे भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।
ईश्वर की कृपा से हिंदी ने मुझे लेखक, कवि और वक्ता के रूप में जो पहचान दी, वह मेरे जीवन का अमूल्य उपहार है।
किंतु इस यात्रा का सबसे भावुक क्षण तब आया, जब हिंदी भवन के मंच पर मेरे माता-पिता का सम्मान हुआ।
उस पल लगा कि वर्षों की साधना, लेखन और भाषा के प्रति समर्पण का सबसे बड़ा पुरस्कार यही है। माता-पिता की आँखों में झलकता गर्व किसी भी सम्मान से कहीं अधिक मूल्यवान होता है।
मैं मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की पूरी टीम, विशेष रूप से अनीता सक्सेना जी और नीता खरे जी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने इस आयोजन को इतना गरिमामय, आत्मीय और अविस्मरणीय बनाया। कार्यक्रम की प्रत्येक प्रस्तुति संवेदनाओं से परिपूर्ण थी और लंबे समय तक स्मृतियों में जीवित रहेगी।
कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा जी का उल्लेख हुआ। जिस आत्मीयता और सम्मान के साथ सभी ने उनसे जुड़े होने का गौरव व्यक्त किया, उसने यह सिद्ध कर दिया कि हिंदी साहित्य केवल पुस्तकों में ही नहीं, बल्कि लोगों के हृदयों में भी जीवित है।
हिंदी भवन में बिताया गया वह दिन मेरे लिए केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी जड़ों तक लौटने का उत्सव था। सच कहूँ तो यह मेरी नहीं, “हमारी हिंदी” के माध्यम से हुई मेरी घर वापसी थी।
आज पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि हिंदी किसी एक व्यक्ति की भाषा नहीं है। यह करोड़ों लोगों की साझा धड़कन है। जहाँ भी दो भारतीय मिलते हैं, वहाँ हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं बनती, बल्कि दिलों के बीच अपनत्व का सेतु भी रचती है।
यही हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति है, और यही उसकी सबसे सुंदर पहचान।
