कोटि-कोटि नमन
जीते-जी जिन्हें पकड़ न सके ,
करते रहे लाखों जतन।
वीर भरत के बलिदान को,
कोटि-कोटि नमन
उसको क्या भय मृत्यु का,
जो था पूर्ण समर्पित।
तन, मन और वचन से
जनहित में अर्पित॥
सैनिकों के लिए पिंडदान,
पीड़ितों हेतु रक्तदान।
पर्यावरण रक्षा में पौधारोपण* ,
जनकल्याण का था अभियान॥
निःशुल्क जांच, दवा, निदान,
स्वास्थ्य सेवा का सम्मान।
विस्थापितों के हक़ की खातिर,
सड़क,बिजली, पानी पर ध्यान॥
बाढ़, सुखाड़ या अकाल हो,
या फिर कोरोना का काल
जब चिकित्सक और सेवक भागें,
तब बने जन-जन की ढाल॥
रग-रग में आस्था थी जिनकी,
जन सेवा से था वास्ता।
अंतिम क्षण तक कहते रहे—
सबसे प्यारा मेरा वतन*
वीर भरत के बलिदान को,
कोटि-कोटि नमन॥
जज़्बा था समाज सेवा का,
भाव था परोपकार का।
गरीबों को न्याय मिले,
यही ध्येय था जीवन का॥
राष्ट्र सेवा और जनपद उत्थान,
संकल्प था सबका कल्याण।
न चोरी हो, न भ्रष्टाचार,
न लूट, न झूठा आश्वासन॥
ईमानदारी से हो हर काम,
यही था उनका अभियान।
निश्चल मन से कहते थे बात,
सत्य था उनकी पहचान॥
गलत कार्य पर उठती आवाज़,
अन्याय से करते थे संघर्ष।
निःस्वार्थी, सदाचारी व्यक्तित्व ,
जिससे प्रभावित था समाज॥
विकास हेतु अडिग रहे,
सत्य पथ पर डटे रहे।
अंतिम सांसों तक जनहित में ,
निडर होकर लड़ते रहे॥
काम पूरा होगा लेकर वचन
शस्त्र फेंक किया समर्पण,
इसी साधना में रहे मगन,
यही था उनका जीवन-धन।
घिरकर भी हंसता रहा
क्रांतिवीर का रक्त गिरा
मिली वीरगति हुए शहीद
क़ातिल न मिटा सके
हिम्मत साहस स्वाभिमान
शहादत और भरत का नाम
राष्ट्रीय मानचित्र पर
बिलौटी बना पुण्य धाम।।
साक्षी बने रवि और गगन
वीर भरत के बलिदान को,
कोटि-कोटि नमन।
वीर भरत के बलिदान को,
शत-शत, कोटि-कोटि नमन॥


