
जलेबी..!
दुनिया की सारी चीजे बदल गई साहिब।
गर नहीं बदली तो ससुरी जलेबी।
अभी भी ससुरी टेढ़ी की टेढ़ी है।😉
कुछ गोल मटोल अस्तव्यस्त।
कुछ जलनखोरो ने,
इसकी काली चमड़ी को।
कुछ गोरी-गोरी नयी नवेली कर दी।
कुछ तो मलाई के साथ लोटा कर,
इसे ईमीरती बना दी।
ससुरी ईमीरती हो कर ऐसे इतराने लगी।
ऐसे ठसक दिखाने लगी,
मानो शहर से आई,
कोई बिंदास छोड़ी हो।😋
ऐसी जलवा दिखाती,
कि सबके सब इसी के पीछे लट्टू।
बेचारी काली कलुटी तेलही जलेबी।
कभी गुड़ में डूब कर ऐसी इतराती थी।
मानो गंगा नहा कर आ रही हो।
आ नदी तीरे लगे मेले की शान हो।
आ समझे भी क्यों नहीं।
वो गवही छोड़े छोड़ी हो।
आ दादा दादी स्त्री पुरूष।
भाय ठाकुरो के हवेली में भी।
बहुत शिद्दत से परोसी जाती थी।
किसी को उसके गुड़ही तेलही होने से,
रति भर शिकायत जो न थी।
सबके सब उसे हाथों हाथ ले लिया करते थे।
भाई वो जमाना अब लद गया।
लोग बदल गये समाज बदल गया।
मगर जलेबी समय के साथ न बदल सकी।
तो लोग उसे ही छोड़ गए।🫢
अब चाऊमिन, बरगर, पीजा,मोमो के सामने,
बेचारी कलुटी जलेबी को पुछे कौन?
कभी कभार 15 अगस्त 26 जनवरी पर,
बच्चो के बीच,
वो गोरकी जलेबी तो बट भी जाती है।
बाकीर गुड़ही तेलही जलेबी,
अपने भाग्य पर रोती रहती है।😢
आ कोसती है अपनी अच्छाई की।
चली थी लोगो को भला करने मन पेट सुधारने।
उसी को लोगो ने सीधार दिए।😇
हाय री मेरी किस्मत क्या से क्या बना दिया।
मेरी अच्छाई का क्या शीला दिया।
मन पेट बिगाड़ने वाले सरताज बने।
निर्मोही मुझे ही भुला दिया।
मुझे ही भुला—————।


