
दिन बीते में देरी ना लागल। देखते-देखते दस बरिस गुजर गइल/तबहुओ लागल कि जलखर घरे छीपा बाजल ढेरका देर ना भइल होई। झबुली के अबहीं पलना छोड़ल सात साल भइल रहे, तबे उनका माई के यमराज अपना हाथ में पकड़ के ना जाने कहँवा लेले चल गइलन। कुछ दिन आउर बीतल। झबुली कूदे-फाने लागल रहन। लइकन संगे गोटी खेले लगलन। ओका बोका तीन तड़ोका, लउवा लाठी चन्दन काठी, त कबहूँ, चूंटा हो चूंटा, मामा के घइलवा काहे फोरलऽ हो चूंटा, गावते खेलहीं में दिन-दिन भर गुजार देत रहन। सांझ के घरे अइला पर माई याद में आवत रही। कइसे माई दही के छाली खिलावत रही, कइसे नादी के खखोरी देत रही। झबुली के छाली से जादे खखोरीए सोन्ह लागत रहे, नीमन लागत रहे। सात साल के उमर हो गइल रहे बाकी अबहीं तक स्कूल में लात तक ना लगइलन। अइसे तड़कपुर से कोसे भर पर स्कूल रहे। इनकर बाप भी कवनो ढेर पढ़ल-लिखल ना रहन, बाकी समय के नब्ज खूब चिन्हत रहन। जलखर के चिन्ता रहे कि बिना पढ़ले बबुआ के वियाह होई त कइसे ? फिर तिलक त मारा पड़बे करी। कसहूँ-कसहुँ झबुली के नाम स्कूल में लिखावल गइल। स्कूल जाये लगलन। अँगूठा छाप में से बेटा के नाम कटवावल ही जलखर के सोच रहे। स्कूल में गइला अइला से का, झबुली के मन पढ़े में लागत ना रहे। रामो गति से आगे बढ़ते ना रहन। इनकर मन त हरदम घसगढ़ी में लागत रहे। जब रोज भोरे-भोरे खुरपा लेके बधारी में घास गढ़े जात रहन तब आर-पगार के घासन पर आफत आ जात रहे। घासों आपन पुनर्जन्म के आसारा बन्हले खुरपा के चोट सह लेत रहिसन। बरसिंधा घास अइसन हरा चारा के फेरा में ई ना रहत रहन। बरसिंघा के मुड़ी काट खेत में पानी पटा दिहीं, फिर बढ़ के तैयार। दूब के पगार प से छिली ऊ बिना पटवले अपने आप बढ़ जाला। झबुली सोचत रहन भगवान के भी बड़हन हाथ होला। जेकरा केहू के बैसाखी ना मिलेला ऊ अपने बल पर उठ खड़ा हो सकेला काहे कि भगवान के छाया में पाटत रहेला। दूब के घास अइसने होला। झबुली इहो सोचत रहन कि बरसिंघा घास पूजा में ना ले आवल जाला लेकिन दूब ओह काम में आवेला। गरीब के भगवान देखत रहेलन। गरीब आउरू लोग से जादे भगवान के नजदीक रहेला। भले बरसिंघा घास अस दोसर लोग हरिआइल रहे बनावटी पटवन के भरोसे। झबुली के स्कूल मे मन लागे त कइसे ? एक दिन महटर जी ना पढ़ला खातिर झबूली के पीठ पर एक मुक्का घोंय से मरलन। झबली रोवलन त ना बाकिर उनका से कहा गइल, हमार नाम त तिलक खातिर लिखावल बा।” महटर के मार ठीक ना लागल उनका। मारला के बल पर केह पढाई घोर के ना पीया सकेला| घरे जेकर माई-बाप रोजे बतिआवत रही कि लइका के नाम स्कूल में लिखववला से तिलक ढेरका मिली त लइका के दिमाग में इ बइठ जाला। ऊ लइका पढ़ ना पायी भले दिन काट लिही। झबुली सोचे लगलन, का एही तरी रोज मार खाये के पड़ी? स्कूली पढ़ाई से उनकर मन दूर भागे लागल। अनौपचारिक शिक्षा बढ़िया बुझाये लागल। उनका मन में एगो बदमाशी खुरचे लागल। महटर जी के कइसे सिखावल जाय कि फिर से कबो दोसर लइका के ना मारस स्कूल में। बरसात के दिन रहे। खेतन में मकई लागल रहे। झबुली एगो बड़ लग्गी में एक छोर पर हँसुआ बान्ह देलन। अब लग्गी लेले खेत के बीचे बइठ गइलन। बस हँसुआ वाला छोर पगार के पास कइले रहन। ओह दिन पढ़े स्कूल ना गइलन। स्कूल बंद होखे के इंतजार खेत में लुका के करत रहन। महटर जी रोज एही राह से आवत जात रहन। छुट्टी भइला पर सब लइका अपना-अपना घरे दौड़त गइलन स। महटर जी सबसे पीछा स्कूल बंद कर के अकेले ओही राह से घरे लवटत रहन। झबुली त टोह लगवले माहटरे खाति खेत में लुका के बइठन रहन। जसहीं इनका लउकल कि महटर जी सोझा आ गइलन, लग्गी के बाहर तरफ निकाल के महटर के गोड़ में हँसुआ फंसा देलन। महटर के गोड़ के का हाल भइल ऊ एह फेरा में बिना पड़ले खेत के भीतरे-भीतरे कहाँ भगलन पता न चलल। एह दिन के बाद से फिर झबुली कबो स्कूल में लात ना लगइलन। अब इनकर काम घास गढ़ल आ भैंस चरावल रह गइल रहे। बाकिर अतने दिन में ई आपन नाम झबुली लिख लेत रहन आ बीस तक गीने के भी सीख गइल रहन। एक गाही, दू गाही, तीन गाही करत-करत सौ के हिसाब बुझ गइल रहन। अब घास गढ़ल आ भैंस चरावे के अलावे फाने-कुदे, लड़े-भीड़े, कुश्ती-पहलवानी में लागल रहत रहन। भैंस पालन, ओकरे गोबर-गोंइठा, दूध-दही त घर के खरच चलावे के मोट धरहर रहे। जब घर के खरची चलावे में तंगी होखे त ओह घरी काम करके मदद देल, उत्पादन बढ़ावल गुनाह ना ह। अइसन हालत में बाल श्रम के भाषण पिआवल कवनो काम ना करी। झबुली सोचलन पढ़ल-लिखल बेकार से त कम पढ़लके आ अनपढ़े ठीक बा। मोट-झोट काम त पढ़ल लोग करवे कहाँ कइल चाहे ला। अइसने लोग परिवार पर बोझा बनल रहेला, ना त अपराधी, गुंडागरदी करे खातिर अगहर हो जाला। सब केहू खाली झुठहुँ के कहेला कि पढ़े के हक सबके बा। खैर अतने दिन में गाँव-जवार में खबर फैल गइल रहे कि झबुली पढ़े लगलन। जलखर सोचलन कि काहे ना अब इनकर विवाह कर देल जाय। दिन बीतला पर कही ना पढ़े के खबर फैलल त काम में आउर खटर-पटर हो जायी। जलखर के सोचल के अब फरे-फूले लायक हो गइल वियाह ठीक कर देलन बेटा के। मनफूलो चिट्ठो लिखे भर सीख गइल रही। सोती श्री सरब उपमा योग रट लेले रही, घोंख लेले रही। झोरन अपना बेटी मनफूला के वियाह झबुली से तय करके घर लवट गइलन। घरे पहुँचला पर अपना मेहरारू से सभ बात बता देलन। सुनते मनफूला के माई झनक-पटक करे लगली। कहली बेटी बिना सास वाला घर में कइसे जइहें? सोनाझरो के मन में कीड़ा काटत रहे कि कइसे भौजाई के तोह दिलवाईं। सोचलीं काहे ना लइका के हम अपने जाँच-परख लिहीं। फुआ के भी त कुछ जिम्मेवारी होला। जवार के बात रहे। झबुली के चेहरा कुछ-कुछ उनका जेहन में देखल लागत रहे। बस खाली पढ़ेवाला बात पर उनका सक-सुबहा होत रहे। फुआ एगो चिट्ठी लेले बस में चढ़ गइली बाजार जाये खातिर। ओने अगिला ठहराव पर झबुली भी ओही बस में चढ़ गइलन। जलखर आ झोरन दुनहु लोगन के गाँव के बाजार एके जगहा पर लागत रहे। फुआ कनखी से देख लेली झबुली के बस में चढ़त। मने मन काम निपटावे में पड़ गइली। घुसुकत-घुसुकत सोनाझरो पहुँच गइली झबुली के पासे। आपन झोला में से चिट्ठी निकलली। चिट्ठी झबुली के हाथ में थम्हा देली। झबुली से कहली बबुआ तनि हई चिट्ठी देख के बता द कि केकरा नामे लिखल बा। हमरा पढ़े ना आवे, तनि नाम पता बतावे में मदद करत त बड़ा नीक होईत। झबुली के लागल खराद पर चढ़ला के केहू जाने मत, ऊ अपना बगल के एगो लइका के हाथे चिट्ठी बढ़ा देलन। ऊ छोटका लइकवा पढ़ के बता देलख। झबुली पढ़े ना जानत रहन एह से ऊ चलाकी खेल देलन। बाकी फुआ भी कम खेलाड़ ना रही। झबुली के पढ़ाई के अतने देर में तौल लेली। सवाल के जवाब लिखला के बाद स्कूल-कालेज में पढ़ावे वाला, जाँच कइला के बाद अंक के अधार पर पास फेल करेलन। बाकिर देहात में अबहिओ लोग ढेर होशियार होलन जे चाल-ढ़ाल देख के फेल चाहे पास कर देलन। अनौपचारिक शिक्षा के महत्त्व कबहुँओ कम ना होला। ‘मसि कागद गहयो नहीं, कलम छुवो नहीं हाथ’। स्कूली पढ़ाई पढ़ के भले ढेर लोग अक्षर के राक्षस बन जाय, जबतक जिनगी में ओकरा के ढ़ारी ना तब तक साक्षर भले कहास शिक्षित ना हो सकेला। सोनाझारो फुआ ओही व्यवहारिक में से एगो रही। घरे लवटते सोनाझरो कहली झोरन से कि ई वियाह ना होई। लइका लिख लोढ़ा पढ़ पथल, करियवा अक्षर भैंस बरोबर बा। वियाह कट गइल। जलखर पर सौ घइला पानी पड़ गइल। झबुली के भी ना पढ़ला खातिर खटके लागल। बुझाईल गुरु के मार खाइल कबो त फर सकत रहे। हँसुआ से गोड़ काटल ठीक बात ना रहे। ईज्जत माटी में मिले ना पावे एहसे जलखर पुरोहित भूलेटन बाबा से मदद खातिर गोहार लगा देलन। भूलेटन बाबा कहलन, जा अबकि कवनो देखनहरु आ जइहन त कहि ह। बात बिगड़े ना पाई।
अगिला साल फिर लगन आ धमकल। भूलात भटकत एक दिन दुपहरिये में हरवंशपुर से वर खोजे देखनहरु जलखर के दुआर पर आ धमकलन। भरोसा के भी आपन बेटी पनपातो के वर खोजत, दौड़त-दौड़त जूता खिआ गइल रहे। भरोसा के भरोसा रहे कि जलखर के लइका से ठीक हो जाई वियाह। जलखर भी मने मन देवता के गोहरइलन। जलखही के बाद जलखर जी से भरोसा जी बोललन, राउर बबुआ जी कहँवा बाड़न तनि बुलवा दिहीं। झबुली बधारी में से बोलवावल गइलन। देवी-देवता के त गोहरावते रहन जलखर जी, भूलेटन बाबा के भी बोलहट गइल। भूलेटन बाबा पीठिये पर धमक अइलन। झबुली के देखते भरोसा जी पूछलन, बबुआ कहँवा गइल रहऽ। झबुली कहलन, बधारी में। काहे खातिर बधारी में गइल रहऽ, अगिला सवाल दगाइल। जबाव भइल कटनी काटे। लगले फिर एगो सवाल उछलल, काथी के कटनी होत रहे। झबुली कहलन मंसूरिया के। भरोसा के त तरवा चटके लागल जबाव सुनते। अब जलखर जी के तरफ मुँह फेरत भरोसा जी पुछलन, का जी रउवा गाँवे चैत में मंसूरिया काटल जाला का? भूलेटन बाबा भरोसा के सवाल से वियाह कटे के भाव ताड़ लेनन। लेकिन भूलेटन बाबा त भूलेटन बाबा रहन। ओने सोनाझरो खेलाड़ रही त मनफूला के साथ झबुली के वियाह कट गइल रहे। लेकिन एने भूलेटन बाबा त अपने उड़त चिरई के टीका लगावे में माहिर रहन। सोचलन जब विद्योत्तमा अइसन विदुषी के शादी महामूर्ख डाल कटवा कालीदास से एक अंगुली के जगहा पर दू अंगुली देखावे के भाव आत्मा आ परमात्मा समझा के कवनो पंडित करा सकत बाड़न तब हमहीं कवनो कम थोड़े बानी। का हम मंसूरिया के कटनी के अरथो ना बता सकीं, मतलवो ना बइठा सकीं। भूलेटन बाबा समझइलन, असल में हेठार में कतहूँ-कतहूँ मसुरी के मंसूरिया भी कहल जाला। मसुरी के कटनी त चैत में होखबे करे ला। बाबा अरथ बैठा देलन। पानपातो के वियाह झबुली से तय हो गइल। झबुली के वियाह कट जात रहे एह से अबकी जलखर जी तिलक के मांग कइबे ना कइलन। कहलन तिलक कवन चीज ह? कवनो माल-मवेशी हवन का हमार झबुली बेटा ? इहे तिलक दहेज त पूरा समाज के डुबावत बा। जे जतने पढ़ईत बा ऊ ओतने घटीहई करत बा। एही बहाने आदर्श वियाह के नींव रोपा जाय त कतना नीक लागी। एकर छाप दोसरो लोग पर पड़े लागी। तिलक ना मांगल त वियाह ठीक होखे के कारण रहले रहे। भूलेटन बाबा पर भी पूरा आसरा रहे कि कवनो वियाह कटवा के पांख बाबा काट सकब। बाबा वियाह के साइत भी निकाल देलन। वियाह के दिन जादे दूर ना फेंकाइल। फिर कवनो सोनाझारो अइसन के हाथ में मौका देल ठीक ना लागल। मान-सान बचा के हप्ते भर में तिलक के दिन रखा गइल, आ तीन दिन बाद तड़ाक वियाह। मुँहा-मुँही केहू जाने तबतक वियाह ओरिया जाय। हरवंशपुर से तिलक चढ़ावे वाला समाज तड़कपुर जलखर जी के दुआर पर आइल। जलखर जी खूब तैयारी कइले रहन। बिहियाँवाला भरुई पुड़ी, बुनिया, कोहड़ा के तरकारी आ इमली के चटनी खाना पर खातिर। पनपीआड़ में मोती चूर, बेलगरामी, भतुआ पाक, नमकीन खजूर आ एक-एक फारा ललमी, ऊपर से गुड़ सौंफ के शरबत। देहात के ई तैयारी चूपे-चाप हो गइल रहे विवाह कटवन के डरे। साटा-बेयाना वाला बजारु चीज ले अइला पर पहिलहीं मुँहा-मुँही हल गुलान हो जाइत। फिर ना जाने का होइत ईहो शंका माथा पर नाँचत रहित, ओह सब से त जान बाँच गइल।
तिलक पार्टी में पंद्रह आदमी आइल रहन, ओह में एगो राकस काका
भी रहन। राकस काका के भाई के वियाह ओही गाँव में भइल रहे। एही से राकस काका के ताकित करके लिया गइल रहे कि कवनो बात बिगड़ी त सम्हरिहें। अइसे बिगड़े के शक-सुबहा नाहिये भर के रहे। काहे कि भरोसा भी कवनो शाहखरची ना रहन। ना जलखरे के लइका के शादी जल्दी होत रहे। भूलेटन बाबा एने अपने चालू रहन। तिलक बिना खटपट के चढ़ गइल। अंगेया-पानी त सांझे घुम गइल रहे। बीजे करा दिहल गइल। तिलकहरु के साथे गाँव घर के कुछ गोतिया भाई भी बइठलन पाँत पर। खाये के इन्तजाम खोरी में रहे। अइसे खोरी में धूल-धाकड़ के कमी ना रहे। अधिका पानी छींटला पर हील-पांकी होखे के डर रहे। फिर त काम आउर बिगड़ जाइत। तिलकहरू लोगन में दू आदमी तनी साफ-सुथरा पहिरले रहन। ऊ लोग खड़ा-खड़ा मुँह ताकत रहन जा। तड़कपुर के लोग कहलन बइठी जा, अब पत्तल चलहीं वाला बा। ऊ लोग कहलन का धूरियें में बइठ जाई जा? तबे एगो आदमी तड़ाके बोल पड़लन, बइठी महाराज कवन कूड़ा-भाँड़ीं ले आइल बानी जा। ई बात जलखर तक पहुँच गइल। लागल ऊनका एके बे बिच्छू मरलख। बुझलन परोसहीं बाला में कवनो वियाह कटवा मत घुसल होखे। आपन बेटा झबुली से कहलन, अब मुँह का देखत बाड़। अबकी बे बात बिगड़ी त सुधरे के मान में ना रही। तू तवाते रह जइब। ‘जल्दी खलिहानी में से दौड़ के पुअरा के आँटी ले आके बइठे वाला जगहा पर छींट द अपने से। झबुली उहे कइलन। खड़े-खड़े कुकुर खाना खाये के आदत वाला, बफर सिस्टम वाला दूनो लोग भी लजाते-लजाते बइठलन। राकस काका आपन जगहा भंडार घर के मोहड़े पर ले लेलन ताकि कवनो चीज परोसाए लागी त पहिलहीं मिली। घटला-बढ़ला के कवनो फिकिर ना पड़ी। पत्तल चले लागल। राकस काका के भी पत्तल मिलल। जसहीं पत्तल चलावे ऊनका से चार आदमी आगे वाला तक पहुँचल होइहें, काका आपन पत्तल से सींक खोल देलन। कहलन हमरा फाटल पत्तल मिलल बा, दोसर दे द। दोसर मिलल, ओहू में छेद बता के तीसरको ले लेलन। अब तीनों के पसार के खूब बड़का बना लेलन। पूड़ी हाथी के कान बरोबर रहे। जसहीं चलावे वाला काका के परोस के थोड़े आगे बढ़ल होइहें, काका बोल पड़लन, हमरा में पूड़ी पड़ल छूट काहे गइल। अइसन ना रहे कि ऊनका में पूड़ी पड़ले ना रहे। ऊ अतने देर में चार खंडा करके पेट में उतार चुकल रहन। फिर से ऊनका के पूड़ी दिहल गइल। तरकारी चटनी भी पड़ चुकल। तरकारी में कवनो ऊनकर रूची ना रहे। एने पलटू एगो बड़हन बाल्टी में बुनिया लेके राकस काका से परोसे के शुरू कइलन। एक पहथ बुनिया काका के पत्तल पर डललन। काका कहलन बुनिया डालत काहे नईख ? फिर एक पहथ बुनिया उनका के दियाइल। काका फिर बोललन, बुनियवा डालत काहे नईख? चलावे आइल बाड़ बुनिया कि अंगुरी से छीरकना छींरके ? फिर तीसरका पहथ बुनिया पत्तल में गिरल। काका फिर बोललन, मुँह का देखत बाड़, बुनियवा देत काहे नईख? तब पलटू फिर एक पहथ दे देलन। अतनो पर काका चुप ना रहलन। फिर कहलन, तू त अजबे बाड़, बुनियवा देत काहे नईख? तोहरा हाथ में दही जामल हव का? अब पलटू खिसिअइले पूरा वाल्टी के बुनिया काका के पत्तल पर पलट देलन आ कहलन साले खा। पत्तल पर छोड़ल त हउ लाठी देखत बाड़ न तोहर…. में कर देल जाई। काका बोललन पलटू के कि तू जइब कि ना। वात बढ़वला से ऊनका खाये में देरी होइत। एह से अतने कह के गपागप डाले लगलन पेट में।
अब पलटू आगे बढ़ के पाँत पर दोसर लोगन के परोसे लगलन। काका के त फिकिर रहे जल्दी-जल्दी खाये के, ताकि सब केहू के साथे-साथ अँचावे खातिर भी उठ जास। पाँत पर दोहरवना चले लागल। घटला-बढ़ला वाला लोगन के दोहरावन देबे खातिर फिर पलटू बुनिया लेके चललन। देखत बाड़न कि काका के पत्तल साफ हो चुकल बा। अबकी बे बिना मंगले उनका के तीन पहथ बुनिया पलटू दे देलन। अबकी काका के कहे पड़ल अब ना चाहीं ना त जीआन होखे लागी। अतना कहलन त काका भले, बाकिर एह पड़ल बुनिया के छोड़लन ना। ईहो साफ कर देलन। सब केहू से पहिलहीं हाथ मुँह भी धो लेलन। पाँत उठ गइल। ओही घरी काका के सोझा पलटू मिललन। अबकी बेर काका के पारी मिलल। कहलन साले परोसे के बेरी बड़ा बढ़-बढ़ के बात बोलत रहस, बोल ना अब पलट के उहे बाँस तोरा…. में कर दीहीं। परोसे के बेरि तोर काहे…. फाटत रहे। साले तेली के तेल जरे मसालची के…. फाटे। काका आ पलटू के बीच अइसन गाली होखल आम बात रहे, स्वाभाविक रहे काहे कि काका के भाई के विवाह एही गाँव में भइल रहे। नाता गोहिंडार रहे। काका के त अतने भोजन रहे, एह से कम ना। कम से कम एक पसेरी बुनिया से कम में उनकर पेट भराव होते ना रहे। ऊ अतने खात रहन। ऊ कबहूँ केहू के छेका-बरेछेया, तिलक-वियाह, छट्ठी-वरही, मरनी-जीअनी छोड़तो ना रहन। गाँव में ना रहला पर जवार में भी अक्सर पता लगाके चल जात रहन। घरे त कमे खाये के ऊनका नौबत आवत रहे। सब केहू उनका खवनही जानत रहे जे ना जानत रहे उहे कबो-कबो चिहात रहे। जइसन नाम राकस, ओइसने राकस माफिक उनकर गवत भी उठत रहे। उनकर देह धाजा भी रहे चपाठ अइसन। ऊनकर विशेषता एगो आउर रहे। खाना खा लेला के बाद ऊ दुअरा दलान पर सुतल त छोड़ीं करवटो ना मोड़त रहन। नदी के कछार पर रहर ऊख के खेत के पासे खरहने घोलटत रहिहें। जब मन करे फर-फराकित होत रहिहें। आ हैं, लठधर भी ओइसने रहन। बाकिर इहँवा त बिगड़ल संभारे खातिर आइल रहन। जब आपन जिम्मेवारी उनका याद पड़ल त राते में जलखर से भेंट कइलन। कहलन देखि ह सबेरे लगन पत्री देबे में उबड़-खाबड़ मत होखे पावे। जलखर उनकर बात के सिफारिश अइसन समझलन। मने-मन गाजे लगलन। चल केहू त मनावन करे आइल। बेटहा के बाप अइसन दंभ झलकल चाहल। मनावन प, लगले ठंढ़ाइयो गइलन। अइसे लगन पत्री में उबड़-खाबड़ के जलखर के मन में भाव नाहिये भर के रहे। लइका के वियाहे कवन आपन ताव पर होत रहे। तबो मने-मने इतरइलन। अतना बात कहके काका कान्ह पर लाठी धइले अपना गाँव खातिर राते में नाध देलन रास्ता नापे के। चैत के महीना रहे, रात कुच-कुच अन्हरिया, बाकिर काका के सोझाहग राह के फिकिरो ना रहे। बीचे-बीचे तिरछे लामी ले लेलन। रात के रात ना बुझलन। रात के अन्हार के कबो कुछ बुझतो ना रहन। बाकिर चोर-डाकून के भी त राते में कुछ कइल नीमन लागेला। ओह लोगन के देवी-दुर्गा, राह बाबा, भैरो बाबा राते में ताकत देलन। ऊ लोग अधरतिया तीन पहरिया के ताक में रहेला कि केहू अकेले में भेंटाइत त छीन छपट लिहतीं। राकस काका रात में रपटले राह धइले रहन, आ कुछ चोर बीच राह में छीप के बइठल रहन। चोर देखलन स, कवनो आदमी अकेलही बीचे-बीचे दुलकी लेले बा। ललकार के टूट पड़लन स। बुझलन स, भल अकेले बा। बड़ बढ़िया मौका देवता भेजले बाड़न। काका घबड़इलन ना। रूक गइलन। होखे लागल लाठी के चलउवल। चार गो चोर लोग रहन, काका अकेले। काका के लाठी से ऊ लोग भद-भद गिरे लागल, जमीन धरे लागल। ओह लोग के लाठी से काका के देह पर कुछ बुझाते ना रहे। समो विषम ना होत रहे काका के। काका त अपने मुसचन्ड भुसन्ड रहन। काका चारों लोग के मार के अधमरु कर देलन बाकिर जान से ना मरलन। कहलन रात में चोरी-राहगीरी कइल बढ़िया काम ना ह। फिर कबो दोसरा बेरि आवे के हिम्मत करब लोग, त समझिह जान गइले घर में बा तोहरा लोग के। जा लोग, माई खर जीउतिया कइले होखबहू जा। छोड़ देत बानी एही से अबकी। काका अब आगे बढ़लन। गाँव के गोंयड़ा पहुँचलन। अन्हमुन्हारे रहे। केहू-केहू टापा टोइंया जब-तब दलान में सुतले-सुतल खोंखत रहे।
गाँव में रहन एगो राम असरे साव। ऊ सालो भर गाँव के लोगन के अनाज के ढ़ेरी भेयारत रहन। ढ़ेरी भेआरे में उनका महारत रहे। ई काम उनका छोड़ के दोसर केहू करतो ना रहे। ढेरी भेआरला के बाद कवनो गिरहस्थ में से जतना मन करे आपन दोहर में अनाज भेअराई बान्ह के चल जात रहन। केहू उनकर हाथ ना रोकत रहे। बाकी एक बे झमन पांडे के ढ़ेरी भेअरलन, आ जब अपने मन से दोहर में बान्हे लगले, त पांडे जी के करेजा फाटे लागल देखते। राम असरे के हाथ पांडे जी रोक देलन। ऊनका लागल कि राम असरे अतना काहे खखुअइले बान्हत बाड़न। बान्हल दोहर में से खोल के गिरा देलन राम असरे। कहलन जा हो पांडे आज तक केहू हाथ ना धइले रहे, केहू ना रोकले रहे। तू आज देखाइये देल। अब पांडे मनावन करे लागलन, बाकी राम असरे काहे के ठहरे वाला रहन। झबुली लइकाई से राम असरे के ढ़ेरी भेआरत देखत रहन आ गिनती गिने, रामे जी रामे, रामे जी दू, रामे जी तीन, रामे जी चार के तरिका सीख गइलें। मेहनत मजदूरी करके साधन बढ़ावे के भी सिख लेलन। आ आपन अपमान ना सहे के चाहीं उहो बुझ लेलन। अइसने व्यवहारिक पढ़ाई ऊ पढ़ लेत रहन। देश भक्त विद्वान कर्नल गुरूबक्श सिंह ढिल्लन के युद्ध कौशल के पढ़ाई कवनो मिलिटरी कालेज, चाहे सैनिक स्कूल में पहिलहीं ना भइल रहे। पहिले उ घुड़सवार सेना में काम करे लागल रहन। ट्रेनिग त बहुत बाद में मिलल रहे उनका, तबो ऊ आजाद हिन्द फौज के नायक रहन। काम काम में पढ़ाई हो जाला। झबुली भी ओइसने पढ़इत रहन। राम असरे बोललन पांडे के, कि तू अपना के का जानत बाड़ऽ कि बड़का ढ़ेरी वाला बनल बाड़। तोहरा जतना दु साल के बटोराइल ढ़ेरी होत होई ओह से जादे त हमरा भेअराई अपने घर में बटोराइल रहेला। कवनो सुबहा मन में तोहरा होखे त चल के देख ल। घटल होखबवऽ त ढोके लेलहू अइहऽ। अतना कहके राम असरे चल देलन। राम असरे मेहनती रहन। जे मेहनत करेला ओकरे भीरी लछमी सटल रहेली। कवनो नसेड़ी, पियक्कड़, कोठा पर पैर रखे वाला भीरी लछमी ना टिकस।
राम असरे मुँह लग्गू भी रहन। खाली लोगन से ना, भूत-प्रेत बैतालो तक से ना डेरात रहन। ओने राकस काका गाँव निअरइले रहन। एने राम असरे सोचलन रात में बगइचा तरफ जाके अन्हमुन्हारे में झाड़ा मैदान हो लिहीं। राम असरे के पहर रात के रहते जाये के आदत पड़ल रहे मैदान जाये के। राकस काका सोचलन ई सहुवा डेरात नइखे। एकरा के डेरवावे के चाहीं। काका बगईचा में पहुँच के बिल्कुल लंगटे हो गइलन। एकरा बाद एगो पेड़ पर चढ़ के डाल पर उल्टे तिर लटक गइलन। साव जी जब बगईचा के बीचे अइलन त काका थेथराह बोली में बोललन। का ले तउवा तलदुई बतखाला लवले वाले। एक वे बोललन, दोहराइयो देलन। साव जी सोचे लगले एह रात में के बोलत बा। ऊपरे नजर डललन त देखत बाड़न एगो करिया भूत डाल पर लटकल बा। साव जी के त होशे उड़ गइल। जे आदमी कबो भूत से डेरात ना रहे ओकरा आज सोझहीं भूत से भेंट हो गइल, पाले पड़ गइल। डरे ऊनकर लोटा अलगे फेंका गइल आ धरती पर गिर गइलन। बेहोश होखे लगलन। भूत डाल पर से जमीन पर धम से कूद गइल। भूत बोले लागल, तउवा डेलो मत। ते आज हमलो धेली भेआल दे, तब तोल जान छोल देब। डरे हिम्मत करके साव जी गछ लेलन।
भूत बोललख खेत में जे ढेला बा नू, ऊहे हमार ढ़ेरी ह। एकरा के हेने से तउल के होने कर दे गिन-गिन के। भूत के डरे साव जी करे लगलन। भूत फिर कहलख अब एकरा के हेने कर दे। साव जी करत रहले, करत-करत भोर होखे लागल। साव जी के पांखुर चढ़े लागल। परेशान होके गिर गइलन। भूत के बुझाइल अब सहुआ बिल्कुल बेहोश हो गइल बा। ऊ आपन कपड़ा पेन्ह के नदी तीरे चल गइलन। भोर होते एका-एकी लोग बगईचा में आवे लागल। लोग देखल, राम असरे बेहोश पड़ल बाड़न। गाँव में हल्ला हो गइल। राम असरे के माई-बाबु भी आ गइलन। टांग-टुंग के लोग घरे ले गइल। घर में रोवा-रोहट पड़ गइल। ओझा-गुनी बोलावल गइलें, बाकी होश काहे के होखे जाय। वैद्य जी अइलन, बोललन इनका कवनो बड़ सदमा लागल वा। घूंटी पीआवत बानी। एक-दू दिन ठीक होखे में लागी। बात राकस काका तक पहुँच गइल। राकस काका त सब जानते रहन। ऊनके त ई करामात रहे। कहलन चल के हमहूँ देख आवत बानी। काका के अवते राम असरे के बाबू सब बात बता देलन। राकस काका कहलन, काहे ना होश होई, होश हो जाई। काका के बात सुन के सब लोग मुस्काये लागल। अचरज करे लगलन लोग कि एह खबोड़ आदमी से का होई। बड़-बड़ भूत पिपर त गइलन….. तब ई आइल बाड़न। बाकिर इनको के अवसर दे के देख लेबे में हरजे का बा, माई कहली। काका रउवो देख-सुन दीहीं, का जाने यश रउवे हाथ में होखे। काका शर्त रखलन, जब हम राम असरे के कोठरी में जाइब तब केहू के पंजरा रहे के ना पड़ी। कोठरी बन्द करके हम आपन अकिल लगाइब। लोग मान गइलें। राकस काका कोठरी के भीतरे ढूकलन। अन्दर से किवाड़ में किल्ली ठोक देलन। फिर अपने लंगटे हो गइलन बगइचवे अइसन। आ बोललन ओही बोली में, का ले तउवा तोला का भइल बा। तनि आँख खोल के देख त, अइसने भूत नू रात में ते देखले रहस। राम असरे आँख खोललन, त काका कहलन हमहीं नू रहीं रतिया बगईचवा में। हमरे माटी के ढ़ेरी नू तू जोखत रहस। राम असरे जब देख के चिन्हलन त उनकर बेहोशी दूर हो गइल। कहलन मालिक रउवा अइसे काहे कइले रहीं। काका बोललन अइसे कइले रहीं कि तू कहत रहस कि भूत से डर ना लागे। हम त तोर इम्तहान लेत रहीं। तू फेल हो गइल स। अब से कतहूँ शान मत बघरिहे। किवाड़ खुलल। राम असरे ठीक से बोले बतिआवे लगलें। बाकिर आज के बाद से रात में बगईचा तरफ गइल बन्द कर देलन। भूत कवनो चीज ना ह। खाली भरम ह, बतास ह, डेराये के ना चाहीं। बाकी झूठा शान बघारल भी ठीक ना ह।
ओने सबेरे हरवंशपुर के तिलकहरु लोग जब राकस काका के ना देखलख तब सभे सोचे लगलन कि गइलन कहँवा। बिगड़ल-बनल सम्हारे खातिर आइल रहन आ अब ऊहे नइखन। बाद में जलखर जी से पता चलल कि भरोसा जी के सब समझा के उहाँ के राते में तड़कपुर के रास्ता नाप लेले बानी। खैर शांति से लगन पत्री मिल गइल। तिलकहरु के विदाई तक राम असरे-राकस काका के कहानी मुँहा-मुँही तड़कपुर तक पहुँच गइल रहे। झबुली तक भी जान गइलन। झबुली पसेरी भर खाये वाला रूप काका के देखले रहन अब उनकर इम्तहान लेबे वाला नया तरीका भी जान गइलन। इम्तहान लेबे वाला तरीका सोनाझारो के अलग रहे, राकस काका के अलग। झबुली सोचे लगले वियाह के बेरि हरवंशपुर में देखीं हमरा कवन इम्तहान देबे के पड़ी। बाकिर हिम्मत बन्हलन अबकी वे फेल ना होखब बल्कि अउवल आइब। वियाह में बस तीन दिन के बीच राख देलन भूलेटन बाबा। विदाई के बाद तिलकहरु लोग दौड़त-हाँफत अपना गाँवे पहुँचलन। सब इंतजाम अतने दिन के भीतरे करे के जे रहे। भरोसा, घरे पहुँचते सब बात रेशमी से बतवलन। रेशमी अपना मरद से झबुली आ उनकर बाप जलखर के बारे में खोद-खोद के सब हाल पूछली। भोजन आ अंगना में के गारी गावल तक पूछली। अब त रेशमी के गोड़ भूइंया ना रोपात रहे। गाँव के गोतिया नइया के मेहरारून के बटोरली आ बेटी के लगन उठावन के गीत गवाये लागल। मानर पूजल गइल। “कवना वने रहलू ए कोइलर, कवना वने जाय” गीत गा-गा के मटकोड़ भइल। भोर में पीतर नेवतावन पूरा हो गइल। दोसरका दिन मड़वान आ हल्दी कलशा हो चुकल। तीसरका दिन सांझ ही बारात आ गइल। दुआर लगावे के बेरा “आपन खोरिआ बहार ए भरोसा बाबू आवत बाड़न दुलहा दमाद हो” “नदिया किनारे से वर एक आवेला धूरी के धूर पर लेटाइल, कान्हे कुदारी हाथे वेंट हो; झबुली के भेष में होइहे महेश, कर भेंट हो।” फिर “हथिया हथिया शोर कइले, गदहो ना ले अइले रे, तोरा मेहरी के लंगटे नचवाओ नाम हँसवइले रे” गा-गा के स्वागत होत रहे। अब द्वार पूजा आ मिलन पूरा हो गइल। भूलेटन बाबा बेटहा के, त संकट हरण बाबा बेटिहा ओर के पुरोहित रहन। दुनहो लोग के नेग मोटहन भेंटाइल। धूआ-बारी आउर अंगेया मंगा गइल। सामयाना के पासे सब केहू के पनपीआड़ करा देल गइल। एने कनेया के नहछुन नेहावन होखला के बाद आंगन में गुरहथी होखे लागल “कंगना ले अइले भेडुआ छोट, कइसे पेन्हीं हे, दुलरइतिन धीया कइसे पेन्हीं हे। तोरा त बडुवे भेडुआ सात पुतर, हमरा एक ही, दुलरइनि धीया कइसे पेन्हीं हे”।
सब औरत मिल के गीत गावत रही जा। अब भइल बीजे के बोलाहट। बीजे के बेरिये आकाश गड़गड़ाये लागल आ शुरू हो गइल बरसा बरसे के। अब त सब इंतजाम गड़बड़ाये लागल। जे पांत पर बइठल रहे उनको जल्दबाजी रहे आ परोसेवाला के भी। दोहरावन चलावे के फेरा छोड़ के पहिलके परोसन में पत्तल पर अतना दिआइल कि सभे पेट भरू हो जाय। जइसे-तइसे बरात खा लेलख। अब वियाह के खाली सिन्दुर दान भर बाकी रह गइल रहे। जसहीं पनपातो पीढ़ा पर बइठली रेशमी के बिछुड़न के गीत फुट पड़ल, आ आँख से लोर छलछलाए लागल। एने बेटी खातिर माई रोवत रही त ओने आकाश भी रोवत जल ढरकावत रहे। “दूधवे नेहवनी हो बेटी मेवावो खिलइनी, अब बेटी भइली पराया। जब हम जनती विरंची अइसन दुख दीहें, जमते माहुर खायी लिहती”। आ पनपातो के झबुली साथे विवाह हो चुकल। कोहवर में तरह-तरह के सवाल साली-सरहज झबुली से पूछे लगली। एगो साली पुछली कि पाहुन जी रउवा सामने कवनो लड़की लंगटे आ जाई तब रउवा का करव। झबुली अइसने खराद पर चढ़े से डेरात रहन। बाकिर अबकी बे हिम्मत कइले । सरहज के गोदी में एगो छोट लइकी रहे ओकरा के लेके झबुली खेलावे लगले। साली के सवाल के जबाव झबुली व्यवहार में उतार के दे देलन। झबुली के अनसुईया त्रिदेवा के परीक्षा के कहानी याद पड़ गइल रहे। ई कहानी गाँव के बैठका में सुनले रहन। कागजीहा पढ़ाई भले मत पढ़ले होखस, मगजीहा पढ़ाई के झबुली जेहन में उतार ले ले रहन। पहिलहू त गुरुकुल में मगजीहे पढ़ाई पढ़ावल जात रहे।
जहिया भरोसा के बेटी के बारात आइल रहे ओही दिन हरवंशपुर में ‘लोरझर घरे लइका के तिलक आइल रहे। ऊ गाँव के सबसे मक्खीचूस रहन। आज तक एकछ दिन के कवनो खुशी-उत्सव के दिन-बार अपना घर में ना राखत रहन। केहू के दिन बार जहिया धराइल होखे पता लगावत रहिहें। अपनो घर के दिन ओही दिन रखवा लेत रहन। अंगेया त ठीके देत रहन बाकिर ताक में रहिहें कि पड़ोसी घरे पहिले बीजे हो जाय, ताकि गोतिया भाई ऊनके घरे अड़च के खा लेस। फिर अपना घर के बीजे के बोलाहट देत रहन। आज जब देख लेलन कि भरोसा घरे सब केहू खा के अचा लेल तव आपन घर के अंगेया वाला लोगन के बीजे खातिर हकार फेर देलन। चूकि भरोसा घरे बीजे के बेरि बरसा वरसे लागल रहे एह से ढेर लोग खाना पवले ना रहे। बकिवट सभे लोग इनके पांत पर बइठ गइलें। एने इनकर लमहर तैयारी त रहले ना रहे। लोरझर सोचलन बड़ संकट में मामला फंस गइल। कइसे सब केहू के खियावल जाय। अइसन संकट से त संकट मोचन भी उबार ना पड़हे। काहे कि जेकर नीयत खोंट रहेला ऊनका के ऊ मदद ना करस। “संकट से हनुमान छुड़ावे” ई पढ़ल छोड़ देलन। अब सोचे लगलन, अकिल दौड़वलन। तरकीब मन में आ गइल। पूड़ी कम रहे एक-एक गो पतल पर दिआइल लेकिन पूरा भांवर घूमें के पहिलहीं शुरू वाला लोग पूड़ी-पूड़ी कह के मांग कर बइठलन। भरपेट देबे में सके के त सवाले ना रहे। लोरझर दूगो लइका के बधारी भेजलन। दूनों लइका एगो मरखाह साढ छेक छाक के ले आके पांत पर बइठल लोगन के बीच में हाँक के पीछे हट गइलन। साढ़ के देखते सब केहू पतल पर के परोसाइल चीज छोड़ के भगलन। तरकीब काम कर गइल। देख के लोरझर के मन धधाये लागल। अब त ना नू केहू कहे पायी, अंगेया देके बीजे गायेब। बिहने से कहे लगलन, साढ़ पर दोष मढ़े लगलन। कहे लगलन सढ़वे के चलते सब लोग भरपेट हूर के ना ढ़केललन। हमार त तैयार ढ़ेरका माल बरबाद हो गइल। बाकिर अतना कहलो पर लोग इनकर चालाकी बुझ गइल। इनकर बेटा के वियाह के दिन नियरा गइल। बारात खातिर लोग के चलवलन बाकी केहू जाये के नाम ना लेलख। बहुत सिफारिश कइला पर झख मार के दस लोग बरात गइल रहे। एह दस लोग में से बाप बेटा अपने दू लोग। आ इनकर आपन हित नाता में से दू लोग जवना में से एगो त लइका के मामा खुदे रहन। लइका के चाचा भी रहन। एकरा अलावे जाने के बात बा कि गाँव के बस पाँच लोग बारात गइल रहे। लोरझर के कतना पानी बा, बेटी वाला भी समझ गइलन। लोग के जे खुद आदर ना दिही ऊ लोगन से पावे के उम्मीदो कइसे कर सकिहन।
वियाह भइला के बाद पनापातो ससुराल तड़कपुर आ गइली। माई के लाड़-प्यार से हटके आ गइली सास के शासन में। भले चचीआ सास बुढ़ी रहली ओह से का प्यार देवे वाला सास त आंगन में मौजूद रही। पनपातो सास-ससुर आ पति के सेवा में लागल रहली। पति झबुली दिन भर बधारी में रहस। घर में त खाली रात के आवस आ रहस। घरे अइलो पर खाली रोपनी डोभनी, कटनी-दौनी, ओसवनी के चरचा पनपातो से करत रहन। एह से आगे ऊ कुछ जानतो ना रहन। समाज अइसने बनल बा। मरद लोग बाहर के काम करस आ मेहरारु लोग अंदर रसोई-पानी, झाडू-बुहारू, साफ-सफाई। घर के आमदनी सीमा से बढ़त ना रहे। परिवार के दिन कसहूँ-कसहूँ अभाव में कटत रहे। पनपातो आगे के दिन के बारे में सोचे लगली। का मेहरारु खाली बच्चा पैदा करे के मशीन भर बिया? का एकरा अलावे ऊ दोसरा कुछ ना कर सके? का ऊ खाली दूख काटत रहो आ पीरा पीअत रहो? का ऊ कबहूँ झाँपी में से बाहर ना हो सके? पनपातो नैहर में मतारी संगे अदौरी, पापड़ बनावे के सिखले रही। अइसे कपड़ा सिये फारे के भी जानत रही। सोचली घर में जवन कच्चा माल बा ओकरे से काहे ना काम लायक समान बना के आमद बढ़ावल जाय। काहे ना आपन बनावल समान के बाजार में खपत करावल जाय। एह कइला से कच्चा सौदा किने के भी ना पड़ी आ आपन मेहनत के फल से आमदनी बढ़े लागी। दोसरा के पैदा कइल माल बेंच के केहू कतना नफा कमा सकेला? मन में बान्ह लेली। विदेशी माल बेंचला के बाजारबाद में फंसल ठीक ना होई। अइसन कइला से भले सकल घरेलू उत्पादन बढ़ला लेखा थोड़ीका देर लागी बाकी सकल राष्ट्रीय उत्पादन ना बढ़ल कहायी। पनपातो के योजना ससुर जी तक पहुँचल। पहिले त ससुर जी ना-नुकुर कइलन। कहलन के तैयार माल पापड़, अदौरी के बेचें बाहर जायी? औरत भला माल बेचें बाहर बाजारे जाई, अइसन कइला पर ईज्जत के उघार का ना होई? अइसन ईज्जत उघरउवल से त दू रोटी कम खाके रहल ठीक होई। पनपातो विनती करके ससुर जी से फिर कहली मेहनत मजदुरी करे में कवनो ईज्जत कइसे जाई? मेहनत कइल कवनो चोरी-छिनारी त ना नू ह। ससुर जी उनका बात पर विचार कइलन आ मान गइलन। अब पनपातो घरे में अदौरी-पापड़ बना के दोकानी पर भेजे लगली, बेचें के शुरू कइली। लोगन के चीज पसंद पड़े लागल। माल के सोहरत बाहर जाये लागल। देखहीं देखहीं में आमदनी बढ़े लागल, पूँजी बढ़े लागल । पति आ ससुर के भी सहयोग मिले लागल। झबुली के हाथ से खुरपा छूट गइल, घास गढ़ी छूट गइल। पनपातो के अइला से घर चमक उठल। अगर कन्या गुनगर रही त तिलक-दहेज कवनो माने ना राखे। गरीबी कवनो सराप भर ना ह। गरीबी जीवन में संघर्ष करे के राह बतावेला। तिलक दहेज त एक बेरि के चीज ह। उ रोज-रोज घटत रहेला। गुण रही त आमदनी, सोहरत, यश घटे के बदले रोज बढ़त जाई। पनपातो अइसने जुझारु नारी के नाम ह।
ओने लोरझर के बेटा जिवराखन के बारात में जे गइल रहे ओह लोगन से गाँव के बइठका में रोज चरचा होत रहे। जिवराखन के जनिह सोना के ढेरी पर कोयला के बढ़ावन बाड़न मैना खातिर।लोरझर के पतोह धप- धप गोर बाड़ी। नयका जमाना के लायक बाड़ी। अब देखीं मैना के कइसे इनकर सास राखत बाड़ी। हरवंशपुर आ तड़कपुर गाँव के बीचे एगो आम के बगईचा रहे। बैसाख तक पेड़ पर बड़े-बड़े आम लागल रहे। कनपट माली मलेटरी से रिटायर रहन। उनकर काम आम के रखवाली कइल रहे। दिन भर बगईचा में डेरा डलले रहत रहन। केहू के अकिल काम ना करत रहे, कि कइसे एको टिकोरा तक मिले। चटनियो खातिर मांगला पर कनपट देबे ना करिहें। झबुली आ दू गो लइका घात में लागल रहन। ऊ सब लइका आम के फिकिर में रहन। ई तीनों नवही रोज बगईचा जाये के शुरू कइलन। कनपट के काका कहके रोज मलेटरी में के बात पूछत रहन। काका से लोग पूछस कि कइसे सीमा पर लड़त रह। कइसे मुक्ति बाहिनी के साथे काम कइले रह। झबुली पूछलन, काका छम्ब जूरियन में कइसे हवाई हमला में बांचल रह। काका खुश होके रोज आपन मर्दानगी बघारत रहन। ईहे बतकही रोज-रोज होत रहे। काका भी खुश आ ईहो लोग खुश रहत रहे। काका से लोग पूछत रहे का तोहरा पेट्रोल पंप ना मिली। का तोहरा आम के रखवारिये करम में बा। काका आपन पेंशन के जोड़ावे लगिहें। ई लोग कनपट काका के विश्वास जीत लेले रहे। एक दिन झबुली अपना यार-दोस्त से एगो योजना बनवलन। झबुली काका के बात में अधुरइले रहन तब तक दू जाना आम के पेड़ पर चढ़ गइलें। आम के पेड़ पर चढ़ के गमछी के घोंघी बनवलें। अब पट-पट आम तूड़ के घोंघी भरे लगलें। एने चोरी-चोरी आम टूटत रहे त ओने काका बात में बेसुध राझल रहन। ठीक दुपहरिया रहे। गाँव से तेतर बनिया लोरझर के लड़का के चौठारी-खातिर आटा-बेसन पिसावे खातिर घोड़ी पर लदले दोसरा गाँव ले जात रहन। रास्ता बगइचे से होके जात रहे। तेतर दूरे से देख लेलन कि दू गो लइका कनपट के आम तोड़ रहल बाड़न स। भीरी अइला पर तेतर कहलन कनपट से कि का मल्लू अइसन बइठ के इहँवा रखवाली करत बाड़? ओने लइका आम तूड़ रहल बाड़न स। काका डंट उठा के गाली देत उठलन। कहलन साला हेकरे काम ह। झबुलीया हमरा के बात में बझवले बा, अभुरवले बा, आ ओने आम तुड़वावत बा। झबुली के लखत का भइल, तड़ाके भाग के बगईचा के किनारे ध लेलन। काका आम के पेड़न के उपर ताके लगलन। थेड़हीं देर में देख लेलन दूनहू लइकवन के आम तूड़त आ ढ़ेरका मानी घोंघी आवल। काका नीचहीं से बोललन, साले आज तोहर लोग के जान ना छोड़ब। उतर ऽ लोग। काका पेड़ पर चढ़ल ना चाहत रहन, उमर भी त ढेर हो गइल रहे। अतने में एगो दस फीट उपरहीं से पेड़ के डाली पर से कूद के भाग गइल। एगोअबहीयों पेड़ पर टंगाइल रहे। काका गाँछ तर डंट पटके लगलन। गरजे लगलन, उतरो साला देखते हैं कइसे भागत बाड़स। आज तोर लाइफ बरबाद नहीं करेंगे त बोलिहें।
उपरे से जम्प करवो करेगा तबो तोर लाइफ ना बचे पइहें। तुम थेफ्ट करने पर हाई चड़ल बाड्स नु। झबुली आ जवन एगो उपर से कुद के भाग गइल रहे मिल के सोचलन कि फंसल साथी के छुड़ावे के चाहीं। अब ऊ दूनो दू तरफ से गुरिल्ला हमलावर अइसन वगईचा पर टूट पड़लन, छापामार हमला कर देलन। काका एगो के खदेरे दौड़स तब तक दोसरका अलगे कोना के डाल खड़खड़ावे लागे। काका दोसरका ओर दौड़स त पहिलका डाल तुड़े लागे। काका के असहीं थका देबे के मन बना के दोनों रचल पलान पर काम करत रहन। जब काका पानी-पानी होखे लगले तब त उपर वाला दोसराको कुद के भाग गइल। काका हल्ला करत गाँव तरफ दउड़लन गोहार लगावत, पकड़ो पकड़ो। एने ऊ तीनों तीन तरफ बाहर भाग गइलन सन। आदमी के आपना काम पर सचेत रहे के चाहीं। आपन बड़ाई सुने के फेरा में ना पड़े के चाहीं। कपटी लोग त कपट करबे करेला। काम-धाम छोड़के बात बझउवल में गिल-पिल हो के आपन सूध-भुला देबे के ना चाहीं। काका बात में बाझल ना रहतन आत्म प्रशंसा सुने में मसगुल ना रहतन त आम के अगोरीया ठीक से होइत । चोरी-चोरी आम उनकर ना टूटल रहित। अपना काम पर सजग रहे के चाहीं। काम पर सजग रहल त ठीक ह, बाकिर कबहूँ-कबहूँ अइसन संयोग जूट जाला कि काम उलट-पुलट जाला। आदमी के उदार भी होखे के चाहीं। काका अगर एक-आध आम गिरलको बिनलको में से चटनी खातिर बाँटत रहतन कबो काल त ठीक रहे। लोभ लालच जादे बटोरले रहे से खजाना लूटाये के जादे डर रहबे करेला। वेद के लबेद नइखे जाने के। उहो त कहते बा, ढेर संग्रह जीव के जंलाल होला। इहे बात गाँधी जी के ट्रष्टी-सीप भी कहता, काम भर राउर बाकी समाज के। लछुमन त सीता के रक्षा में पहरेदारी पर पुरा सजग रहन बाकीर सोना के मिरगा के लालच सीता के का से का ना करवा देलस। मायावी मारीच के पुकार के फेरा में सीता से उलाहना भी सुनलन, तबो सीता हरण ना रूक पावल। ओसहीं पूरा मलेटरी के अनुभव रहते, पूरा अगोरिया में समय देला के वादो काका से बगईचा ना सम्हरल। कुबैत के तेल भीतरे-भीतरे पाइप से चोरावे के छोट घटना इराक के कतना महँगा पड़ल। इराक के तेल पर गीद्ध दृष्टि पश्चिमी राष्ट्र के अब कइसन बुझात बा? सामुहिक नरसंहार के हथीयार के भंडार रखे के झूठ कथा गढ़े के पड़ल। एह कथा के सच साबित करे भी ना पावत बाड़न, जग हँसाई भी होत बा। अबो गिरेब जेल में युद्ध बन्दीयन के साथे अमानुसीक अत्याचार के दोष माथ पर ढोबे के पड़त बा। अन्तराष्ट्रीय मानवाधिकार हनन के आरोप सहे के पड़त बा। गलत गुप्तचर सूचना खातिर टेम्स-आमेजन वाला के अपना घरे आ संसार के सोझा माफी माँगे पड़त बा। बाकी गलत सूचना पर आधारित कारवाई खातिर लाज धोवे पर तैयार नइखन। बरिआरी अबहुवो मुँह छछलोल अइसन कइलही बाड़न। संयुक्त राष्ट्र संघ के अंगूठा देखावते बाड़न। एह सब के पीछा में कहीं न कहीं लालच छिपल बा। लालच बड़ा बुरा चीज बाऽ। झबुली के गोरिल्ला हमला के योजना, आ ओह के अमल में लावे के ट्रेनिंग कवनो फौज के स्कूल से ना मिलल रहे। एकलव्य के शिक्षा कवनो द्रोण हुलसत आ धधाइल ना देले रहन। तबो एकलव्य के नाम धनुधारी में गिनल जाला।
लोरझर के बेटा जिवराखन के बारात में भले कम आदमी गइल रहे ओह से का। वियाह हो गइल पतोह घरे अइली। सास-ननद बड़की गोतिन मिल के परिछावन के बाद बहू के घरे अंगना में ले अइली। सास के खुशी भइल। नइकी दुलहीन लइका से जादे मोट-झोंट रही बाकिर सास एकरो के खराब ना मनली। एकरो के पचा लेली। सोचली चल मोट बाड़ी ओह से का, ढ़ेका पर पैर रखिहन त अकेले कतना धान-चूड़ा कूट दीहन। पहिले त वड़की पतोह के साथे बेटी के भी ढ़ेका पर साथे चढ़े परत रहे। चउठारी हो गोइल, बहू के हाड़ी छुआवल गोइल। ओह दिन खीर पूड़ी बनल। सभे नइकी बहू के सराहत खाना खाइल। दिन बितत गइल, पतोह के भेद खुले लागल। बड़की पतोह झनके-पटके लगली। कहे लगली सब केहू तीन पहरिया तक सूतल रहो, बेनीया डुलावत रहो, गोड़ में महावर लगइले रहो आ हमहीं अकेले काम में सउनाइल रहीं। बजर पड़ो एह घर में अइला के। लागत बा हमरा करम में कवो चैन मिलहीं के नइखे। बेटी भी आपन माई से फुसुर-फुसुर कहली “छोटकी भौजी त पट्टी कटववले बाड़ी। आँख में काजल त लइबे करे ली, गाल पर करीया एगो बुन्दा लगावेली। भउजी के लाम-लाम केश नइखे। बेटी माई से कहली। कहली का एक तरह से लहरा लगवली। सुने में आवेला कि आजकल कवनो-कवनो मेहरारू अइसने बाल कटवावे लीजा आ एकरा के बब-कट कहल जाला। जाड़ा के दिन में भेड़ीहार जब भेड़ी के बाल काटेलनसन त कइसन सभ भेड़ छेहर लागे लागेली सन। भउजी ओइसने लागत बाड़ी। भउजी आपन अँचरा भी माथ पर नइखी डालत। कान्हीं पर फेंकले रहत बाड़ी। ठोर लाल रंगले रहत बाड़ी। एगो पेन्सील अइसन कवनो चीज ठोर पर रगड़ेली, कहेली कि लकमे के लिपिसटीक ह। भउजी एगो दबावे वाला पिचपिचवा रखले बाड़ी, ओह में से लयन अइसन कवनो चीज निकले ला ओकरा के मुँह पर रोज घंसेली, कहेली की क्रिम ह। ओह के उपर से रूई के फाहा से पाउडर लगावे ली। देह त उनकर गमगमात रहेला। एकबेर नेहा धो के लगावेली फिर किरिन डुबला प। बेटी माई से कहली की भउजी एगो अजबे चीज पेन्हेली। जब उ नेहा के आपन कपड़ा घामा पसारेली त एगो देह सटउल नन्हीं गो पैट अइसन चीज भी सुखावेली। बड़की भउजी अइसन कबो ना पेन्हत रही ना त जानत ना रहती? भउजी कहेली की ई फ्रेंची ह। बड़की पतोह के ठानल आ बेटी के कान भरला से सास के पारा आसमान पर चढ़ गइल। सास छोटकी बहू से कहली, ई सब ना चली एह घर में। अइसन जानत रहतीं त एह घर से तोहरा खातिर डोली ना सजावल गोइल रहित। सास के करेजा में तितकी उठल। ऊ अपना मरद से बोलली, का तोहार आँख फूटल रहे जब देखे गइल रह। लोरझर कहलन कि लइकी देखे के बेरी त हमार नजर उपर गइले ना रहे। लोरकर आपन मेहरारु से कहलन, चूपे-चाप वहू के समझा द। जादे तू पें-पा मत कर। ईज्जत तोपले के मोल ह। बहु बाले नु कटइले बाड़ी, समझ जइहन त महीने भर में बढ़ल अस बुझाये लागी। दिन में बहू के बहरी मत निकले दीह। बरमदा के ढेका पर भी मत चढ़े दीह। टोला-मुहल्ला के लोग देखी त हल्ला उठ जाई। सास कहली, बड़की त अपने रूसल-फूलल बीया। ढेका का तू कुट ब? जबाव में लोरझर कहलन संसद के ओखरी में अइन के ढेकी कुटेवाला भी त गजरा गाथ के सड़क पर घूम रहल बा। पोटा त रात भर कुटला प आइल रहे लेकिन उहो किनकिनाह लागत बा। आ तुहूत ढेका कुटे के बेरी कबो कबो आनाकानी करते रहू। छोड़ ढ़ेका में ना कुटाई, मील में धान कुटवा देब। ऊ कहली चुप ना रहबऽ, खाली मिल कारखाना के बात कइले बाड़। मिल कारखाना में सब कुछ होखे लागी तब त देशीला चीज के खोबाड़ी में फेंक देबे के होई। ऊ कहलन, तू का जनलू, जमाना बदल रहल बा। उदारीकरण, मशीनीकरण, भूमंडलीकरण हो रहल बा। अब ईहे सब के चलती हो जाई। बाजारबाद पर एहीतरी कब्जा हो सकेला। अबतक त तोहार सुनत रहलीं, ऊ आउर झनकते बोलली। अबकी बे ऊ तेवरे में बोलली, कवनो देश बेचवन के कहल बात सुनले बाड़ का हो। ऊ कहली, तनि बताव त तब गाँधी बाबा चरखा काते के, नमक बनावे के काहे बतावत रहन। देश बेचवन के कहल सुनत रहब त फेरा में पड़बे करब। आवे वाला दिन में उधारी-कर्जदारी में फंस जाये के पड़ी। रोजी रोजगार त छीनइबे करी, देह-धाजा में भी देंवका लाग जाई। अजब अजब के बिमारी होखे लागी। रोजगार चल जाई टेम्स-आमेजन में नेहाये। फिर ओहू जगहा से आउट सोरसींग कह के हटावल जाइब। तोहार छछलोल मुँह चिहराये लागी। मेहनत कइला से देह निरोग रहेला। घर में लछमी के बढ़ती होला। आपन मन ऊँच रहेला। सम्मान के बिक्री ना होला। हउ झबुलिया के मेहरारु पनपतिओ के त देख के लाज लागे के चाहीं। काम करके, पापड़ वना बेंच के कइसन घर के चमका देलख। का ई बालकटी ओइसन बन सकिहें। अब लोरझर से ना रहल गोइल। ऊ कहलन अब का सोचले बाडू। अब औरतन के बराबरी के हक मिले के बा, हिस्सेदारी मिले के बा। इहनिओ के अइन बनावे वाला में सीट रिजरभ होखे के बा। ओह तेतीसवा भाग में ईहे वालकटी मैदान मार लिहन आ झबुलीया बो पापड़े बेलत रह जइहें।लोरझर बो से अब ना रहल गोइल, ऊ खखुअइले बोलली। जे काम करी, मेहनत मजदूरी करी, जे दुख-सुख में रमल-भींजल होई, जेकरा भीरी वेवहारिक लूर-लछन होई, अइन बनावे के चाभी ओकरा हाथ में होखे के चाहीं। खाली टंगरा पसार के सूतल रहे वाला के, दिन-दिन भर ऐनक में मुँह निरखत रहे वाला के, ठोर रंगवन औरत के हाथ में ई अधिकार ना जाये के चाहीं। अइसन दिन देखला से त चुरूआ भर पानी में डूब मरल बढ़िया रही। लोरकर कहलन तू बकवकाते रहबू, के तोहार दुखरोवन सुने वाला बा। बड़का-बड़का लोगन के औरत त जादे झाड़े-फेनुस वाला होली, बाल कटी भी ओही लोग के घरे होली। ऊ सब लोग त गरीबन, मध्यम वर्ग के धकियावे में लागले रहिहें। आम लोग गरीब मजदूर त मर रहल बा आ धनीकाहा लोग कम्पूटर, मोबाइल, एयर पोर्ट, राजधानी मेल, शताब्दी एक्सप्रेस के गुन गा के अघाइल रहत बा। मरस किसान, मरस पढ़ल लिखल बेरोजगार ओह लोग के कवन चिन्ता बा। दस लाख, पचीस लाख जेकरा भीरी रोपेआ होखी ऊ नू विधान सभा, संसद खातिर वोट में खाड़ होइहें, आ सब सिट हथिआ लिहन, गपाका मार लिहन, आ गरीब टुकुर-टुकुर ताकत रहिहें। लोरझर आगे कहलन सीता हरजोतवा जनक-सुनैना के बेटी रही। वने वने रामजी के साथे चित्रकुट में रहली, साथे-साथे बइर चबावत रहली। बाकी राजगद्दी पर बइठे के बेरी अग्नि परीक्षा में पास भइलो के बाद घर से निकाल देल गोइल रही कि ना? हरजोतवा झबुलीयो के मेहरारु के देखिह का होला।
समय खराब अइला पर एकरा कवनो बालमिकी भी मिलिहें? अब समय बालकटीन के आवे वाला बा। तू आपन पतोह पर ईतरा, दिन फिरे वाला बुझात बा। जिवराखन के माई बोलली, सीता हर जोतवा के बेटी रही ओह से का, संस्कार में पलल रही, गद्दी पर साथे बइठे लायक रही, उनकर हक मारल ठीक ना रहे। राज-काज में सबकेहू के फेंट-फाट के ले चले के चाहीं। सरोजनी, सुचेता रही त इंदिरा भी रही आउर पद्मजा भी रही। अबहुओ त केहू ठकुरानी जाठानी बा, त केहू पिछड़ल सन्यासिन भी बा, कतहूँ बुढ़िया काकी बाड़ी त कतहूँ गोबर बिन्नी भी, कतहूँ चित्रपटानी त कतहूँ मेहतरानी भी राज चला के देखवली, देखावत बाड़ी। औरतन के विकास में गैर बराबरी बा। उनका हिस्सा के बायन मिले के चाही। महिला में भी जेकरा विकास के अंजोर पहुँचते नइखे उनकर हिस्सा के बायन बालकटीए मत गपच जास। एह से उनका खातिर अलगे छीनगा के देबे के चाहीं। सब लोग के मिला-जुला के देबे के चाहीं ताकि केहू के अखरे मत।
पनपातो आ झबुली के परिवार ठीक से चले लागल रहे। लेकिन झबुली के मन में बाहर जाके नौकरी करे के कीड़ा काटत रहे। सोचलन काहे ना एक दिन चूपे कउड़ी कामाख्या भाग जायीं। फिर सोचलन भागल ठीक ना होई। फिर मन में उनका आइल काहे ठीक ना होई। का गौतम बुद्ध यशोधरा-राहुल के सुतले छोड़ के भागल ना रहन? ना, ई ठीक ना होई। ऊ कवनो नौकरी खोजे थोड़े भागल रहन। के पीपल के गाँछी त बइठे जाई। सोचलन भागला प पनपातो के धंधा के का होई? आमदनी बढ़ी की घटे लागी अइसन कइला से। एक रात सहमते-सहमते पनपातो से सलाह कइलन बाकिर ऊ सलाह ना में देली। कुछ दिन उधेड़ बुन में इनकर कटल। मन में जवन सोचत रहन ऊ उनका के कचोटत रहे। काम-धाम में पहिले जइसन झबुली के मन लागत ना रहे। एक दिन कवनो बात लेके बाबुजी के डांट इनका पर पड़ल। बस बिहने बधारी में गइलन त सांझ तक घरे लौटवे ना कइलन। दोसरको दिन ना लवटलन। अब त ममहर, फुफहर, ससुरारी, दिदिअउरा सभे जगह टोह लिहल गइल। कतहूँ पता ना चलल। पता भी कइसे चले, ऊ त कतहूँ दूर के डेग नापे के मन में ठनले रहन। बस एक वोझा कचरी कबार के बधारी में से चल देलन दूर के राह। कचरी बिहिया बाजार में बेच के पइसा कर लेलन आ टिकट कटा के दादर-गौहाटी रेलगाड़ी में चढ़ के चल गइलन कामरुप प्रदेश में। देहात में ई एगो कहानी सुनले रहन कि जे कामरूप जाले ऊनका के सुग्गा बना के उहवाँ के जादूगरनी जादू मंत्र से राख लेलीसन। मने-मने डेरात त रहन बाकिर साहस बटोरले रहन कि देखल जाई जवन आगे आई। अइसन होखे के संदेह बुझाई त दोसर जगहा कुच करे में देरी ना करब। अबहीं त झबुली पाँव रोपहीं के रहन कामाख्या के धरती पर, कि बिहनही हलगुलान हो गइल। ढ़ेरका बिहारी लोग रेल के खलासी में भर्ती खातिर इम्तहान देबे गोइल रहे ओही आसाम में, गौहाटी में। आसाम के लोग बुझलन, ई सब त हमरे हिस्सा घपेले खातिर आइल बाड़न। उहँवा के लोग एह सब लोग के मारे लगलन, आ कागज पत्तर छीन-छान के फाड़ देलन। मार खात सब लोग भागत-छीपत लौटे लगले। ई सब देखते झबुली के होश गुम हो गइल। सोचलन बड़ आफत के घड़ी-बेरा में पहुँच गइल बानी। डरो लागत रहे झबुली के कि एह धरम धक्का में हमहूँ मत गोलहरा जाई। बस ऊहो एह जगहा के छोड़ के भगलन। भागले में ठीक समझलन। चूपे-चाप नजर बचावत गाड़ी धर लेलन उलट राह के। एक जगहा पर लोग टेसन पर खखुआइल रहे। आसामिया लोगन के गलत कारगुजारी से लोग खफा रहन। गाड़ी आगे बढ़ल त जमालपुर आइल। गाड़ी के रूकत का भइल कि ढ़ेरका लोग खमखमा के डिब्बा में घूसे लगलन। सब लोगन के हाथ में सोटा-डंडा रहे। प्लेटफार्म पर के लोगन में से भी ढेर लोग गाड़ी के तरफ ढेला मारे लगलन। पूरा अफरा-तफरी मचे लागल। झबुली गते-गते भितरे से वहरी निकले के फेरा में अइले, बाकी दुआरी पर के ठेला-ठेली में पार ना पा सकले। जे लोग खमखमाइले भितर घूसल रहे ऊ सब बीना पूछले उछले गाड़ी के लोगन के चेहरा चिह्न-चिह्न के मारे लगलन। झबुली बुझलन कि कवनो चोर-डाकू कादो घुसलन सन। अइसे इनका पासे टिकट छोड़ के बस थोड़हीं पइसा बाचल रहे। झबुली सोचलें ई का केहू छीनी। भले अतना कम खातिर एक-आध हाथ लगा दिहन जा, मलपट दिहन जा, लोला धूर दिहन जा। लेकिन एकरा आगे कुछ ना करिहन जा, काहे कि कवनो चोर-डाकू त रहन जा ना। झबुली देखलन एगो सुनर-सुभेख पढ़ल लइकी ऊपर के सीट पर सूतल रहे। हल्ला-गुल्ला सुन के पहिले त ऊ लइकिया चिहाइल बाकी अतने देरी में जवन लोगवा बहरी से गाड़ी में खमखमाइले चढ़ल रहे, ओकर झोंटा पकड़ के धड़ाम से नीचे गिरा देलन स। अब त ओह लइकिया के हाका बाका बन्द हो गइल रहे। अबहीं ऊ सम्हरित तबे कवनो बदमाश ओकर सलवार के जबरन खींच देलख। ऊ आपन हाथ ईज्जत के दुआर पर रखलख। अब गुन्डा सब ओकरा के ढ़केलत पखाना के दुआरी तरफ ठेलले आगे बढ़लन। अब पखाना के भितर ढ़केले लगलन स।
ना जाने उहनीन के ईरादा कइसन रहे। डिब्बा में के सब सवारी के डरे ठमका मरले रहे। केहु के रोकल त दूर रहे विरोध में बोलहू के हूब ना रहे। सब के सब सकपकाईल रहे।
अइसन घटना झबुली कबहुँ गाँव देहात में ना देखले रहन। इनका ना बुझाईल कि ई कवन दुशासन द्रोपदी के चीर हरण करे आ गइल? कवन दुर्योधन के जाँच पनिआइल बा? झबुली से ई अन्याय देखल ना गोइल। ई कवनो भीष्म, द्रोण, अर्जुन-धर्मराज ना रहस, ना कवनो मारे वाला लोगन के नमक खइले रहन, ना कवनो जुआड़ी ही रहन। हिम्मत बान्ह के दू जना के गरदन पकड़ के धसोर देलन। ऊ लोग धड़ाम से दोसरा लोगन पर गिरलन। जवन लोग गिरलन ऊ उठ के फिर कुछ करे के दुसाहस ना कइलन जा। लड़किया के जान बांच गइल। लोगन के बीच में ओकर ईज्जत ना लुटाये पावल। झबुली आपन गमछा ओकरा ओरे फेकलें देह में लपेटे खातिर। लोग अब झबुली के प्रशंसा करे लागल। नीचे के भीड़ से झबुली के डर भी लागत रहे कि कहीं इनको के चिह्न के गोहरांव करके गोलहरे लागसन तब का करिहें। एही डरे ई गते सरक के दोसरा डिब्बा में घुस गइलें। अब हरामीपन भी थम्हल आ इनको जान बाचल रहल। ई ओह बहिनिया से नाम-गाँव हुलिया पुछहुँ ना पवले। गाड़ी बहुत देर तक रुकल रहल। पुलिस दारोगा धमक अइलन। कसहूँ-कसहूँ गाड़ी खुलल। गाड़ी में बस एके बतकही होत रहे कि दू दिन पहिले एतवार के बिहारी लोग खलासी के नौकरी के इम्तहान देबे कामाख्या के प्रदेश में गइल रहन जा। ओह जगहा के लोग इम्तहान त देबहीं ना देलन जा उल्टे लइकवन सब के मार-पीट के भगा देलन जा। एही के बदला में एही जो के लोग पईंचा फेरलन ह जा। सुनते झबुली पूछलन, बाकिर हऊ लड़किया का बिगड़ले रहे कि औरत पर हतना बाघ बनल रहन जा। ऊ लोग के आपन मतारी-बहिन के साथे अइसन गुजरल रहित तब का ऊ लोग के ठीक लागित।
अगर कामाख्या-कामरूप के लोग घटीहई कइलन, तब ई लोगन के नीचतई का ठीक बा। लोग कहे लगलन कि अब जमाना बदल गइल बा। नौकरी मिलते कहँवा बा? सरकार ना जाने कहँवा सब नौकरी खा गइल। लाल किला से कहल गइल रहे कि साले-साल एक करोड़ नौकरी मिली बाकिर होखे लागल छटनी। नौकरी के जगहा वढ़े के बदले घटे लागल। थोड़े बहुत बहाली होखहूँ लागत बा त मारा-मारी होत वा। बी०ए०/एम०ए० पास लइका खलासी बने प जान देत बाड़न जा। आपस में सातू-लिट्टी खाये वाला चाय पियवहन से लड़त बाड़न। नौकरिया के जगहवा जे चाट गइल ओकरा से त पुछाते नइखे। कहँवा चल गइल सब खाली जगहवा। का कवनो आमेजन नदी में ले जाके फेंक दिहल गइल। गंगा-सोन-ब्रह्मपुत्र-कावेरी-व्यास- गोमती-यमुना में डालल रहित तब त छान भी लिहल जाइत। बीस हजार के जगहा खातिर पचहत्तर लाख लड़का टूट पड़त बाड़न नौकरी खोजे। ईकइसन देश के विकास हो रहल बा। कइसन चमक भारत के आ रहल बा। तनिके पीछला दिन से बतलावल जाता भारत उदय, पर कब तक अस्त रहे केहू बतावत नइखे। साले भर के बेटी दस रु० में गरीब बेंच देता, आउर लइकवन के खिलावे खातिर। आ रत्न जड़ित सिंहासन पर केहु बइठल बा, अनाज के छल्ली लगावल ढेरी पर टांग पसरले बा। झबुली सोंचे लगले हमहूँ त नौकरिये खोजे निकलल बानी। अगर अइसन क्षेत्रियता के झगड़ा उभरे लागी तब त हमरा फेर से खुरपा पर लवट जाये के पड़ी। कतहूँ ‘मु मुम्बईकर’ त कतहूँ धरती पुत्र कह के लड़त बाड़न, त कतहूँ सन बत्तीस में परदादा के नाम खोज-खोज के अलगा करे के उपाय कइल जात बा। मालूम. ना वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण के राह असहीं आवेला का? रोम के बेटी आ पशुपतिनाथ के प्रसादी खाइल बेटी में भेद भाव कइल जात बा। खाली लइकन के जन्मकुंडली से ना बाप-मतारी दुनहुन के जन्मकुंडली खोजल जात बा तिजोरी के चाभी थम्हावे खातिर। खाली तिजारत के छुटा मोहानी खोलला से, बाजारवाद बढ़इला से भूमंडलीकरण ना अइहन। जब देश के भीतरहीं जाति, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र के नाम लेके अलगाव बढ़त रही, तब अखंड के चिथड़ा ना निकली का? ईहे सोचत-सोचत आगे बढ़ला प गाड़ी मोकामा पहुँचल। तब तक भोर हो गइल। प्लेटफार्म पर एगो आदमी अखबार के बंडल लेले बोलत रहे पेपर-पेपर, आज के ताजा खबर। पेपर वाला त आधा खबर बेंचहीं में बतावत जात रहे। ऊ बोलत रहे ‘सताइस हिन्दी बोले वालन के आसाम में कत्ल, पाँच सौ झोपड़ी स्वाहा, उड़िसा में चर्च पर हमला, महाराष्ट्र में नमाज पढ़ही के बेरि बम धमाका, मंत्री रुपया घूस में लेत सी०डी० में, टर्की में गोला दगाइल, बुश बकिंघम पैलेस में मेहमान, बिहार के एगो सचिव पर गिरफ्तारी के वारंट, शांति बनावे खातिर प्रधानमंत्री के अपील, लालू स्थिति के मौका पर जायजा लेबे गौहाटी में।’ ढेरका लोग पेपर खरीद के पढ़ के चरचा करत रहन रहन जा। लोग कहत रहे प्रांतियता, क्षेत्रियता बढ़ल जात बा। देश के एकता अखंडता पर खतरा मंडरात बा। सब केहूँ के मिल के एकवट के एह आवे वाला खतरा के रोके के चाहीं। आर्थिक लाभनीचे के लोगन तक जाये के चाहीं। गाड़ी आगे बढ़त गोइल। बखतीयारपुर फतुहा सभे जगहा रेल में चढ़े वाला लोगन के ठेला-ठेली होखे लागल। ओह ठेला-ठेली में झबुली ढ़केलात, फेंकात खड़ा होखे भर जगहा दरवाजा भीरी पवलन। खड़ा-खड़ा जब पाँव थथमाये लागल त भीतरे दूक के बइठे के कोशिश कइले। त पहिले से बइठलका लोग कहलन तनि आउर बढ़ेके। आगे बढ़ के फिर एक जगहा चूतर रोपे के कोशिश कइले तबे एगो आदमी अनसइले झाड़े लगलन। देखत नइख, जगह। कहँवा बा कि घूसल आवत बाड़। एक जना पूछलन तोहार कहँवा घर ह। झबुली कहलन तड़कपुर। ऊ फिर पुछलन ई कहँवा बा। झबुली कहलन भोजपुर में बा। तब ऊ कहलन कि रेल के टके सेर भाजी, टके सेर खाजा का समझ बइठल बाड़, कि तसलवा तोर की मोर कइल चाहत बाड़। ऊ झबुली से कहलन कि रेल में जे ढेर पइसा देके टिकट लेला ऊ बइठ के जाला, कम पइसा वाला के असही खड़े-खड़े रगड़ाते जाये के परे ला। झबुली उनकर बात सुन के भकुआइल रहन। झबुली के बुझइबे ना कईल ई कइसन सरकार बराबरी के अधिकार दे रहल बा। सभडिब्बा त वातानुकूलित, फस्ट क्लास, शयनयान करके रख देले बीया। शताब्दी, जन शताब्दी, राजधानी गाड़ी चला रहल बीया। गरीबन खातिर एगो दू गो बोगी साधारण रखले बीया। गरीब डिब्बा में कोंचा के मरत रहस, आ पइसा वाला लोगन खातिर शताब्दी, राजधानी खाली दउड़त रहे। नफा गरीबन के टिकट से होखे आ फायदा पइसावाला उठावस। त ई सरकार खाली पइसा वालन के भल ताके वाला बीया का? गाड़ी पटना पहुँचत-पहुँचत लोग हरहरा के उतरे लागल। तब तक निकहा दिन चढ़ गोइल रहे, दुपहरिया से तनिके कम रहे। लोगन के उतरला से तनिका फफराह भइल। झबुली के बइठे के जगहा मिल गइल। झबुली पूछलन हतना लोग एके बे काहे इहँवा उतरत बाड़न। एगो आदमी बतवलख कि ई सब नौकरिहा हवन जा। पटना में इहाँ सभे काम करीलीजा। झबुली कहलनबड़ा कुटेम हो गइल बा। इहाँ सभे काम पर कबसे लागब। ऊ आदमी बोललन, जानत नइख, ई सब सरकारी नोकरिहा हवन जा। कवनो खेत-खलिहान के मजदूर हरजोतवा थोड़े हवन जा, जेकरा पे गृहस्थ के चाप चढ़ल रहेला। ई लोग जबे पहुँची तबे ठीक। एह लोग के हाजिरी ना कटे ला, नागा ना गिनल जाला। जइलो पर चाय-पानी पिअत, सर समाचार बतिआवत बारह से ऊपर चढ़ जाला। हाकिम त डरे बोलबे ना करिहें ना त मुर्दाबाद करे लगिहें। दोसर केकर सामत चढ़ल बा कि जनता बोलो। अगर केहू बोललख त ओकरकाम ईहाँ सभे अइसन अधुराइव कि सभुरावे में पसीना छूटे लागी आ जेब झराये लागी। लौटे में भी सबेरहीं तीन बजे से हाथ धो-धा के प्लेटफार्म पर गाड़ी अगोरे लागेलन जा। केहु बोलनिहार ना होला। तनखाहो मोट आ पूरा मिलेला। तबे न चीकन चाकन बाड़न जा।
समय पालन त खाली अनपढ़ देहाती मजदूर खातिर होला। झबुली सोचे लगलन वाह रे पढ़ल-लिखल लोग। तोहरा से अनपढ़वे काम के जादे महत्व जानत बा। झबुली भी दानापुर जात-जात गाड़ी से उतर गइले। इनका बुझइबे ना करे अब का करी। घरे लवट चलीं कि चाय बगान के असमिया नौकरी खोजे के बदले कलकतिहा जूट मिल में नौकरी खोजे दोसर राह पकड़ ली। घरे लौटे में लाज लागत रहे उनका। अबकी बे गया चल गइलें। सोचलें, पत्नी लइका के छोड़ के भागे वाला के त ईहे जगहा ज्ञान देला। अगर हमरो कुछ भेंटाइत त तर जइतीं। बाकिर इनका उहवो शांति ना मिलल। मिलबो कइसे करित, ऊ कहँवा गौतम बुद्ध रहन राजा सुयोधन के बेटा ‘न्याय दया के दानी’ के उपदेशक। ई कहाँ गरीब, लिख लोढ़ा पढ़ पथल। एगो दोसरो बात रहे, ई फिर ओह राह से जमालपुर ना जाइल चाहत रहन। ओह जगहा के घटना के सोचते मन घबड़ाये लागत रहे। धर लेलन कलकत्ता के राह के रेल जे भोरे-भोर धनबाद पहुँचल। अखबार में निकलल रहे कि तिनसुकिया में कर्पयू लागल बा। तीन गो लइका आ मेहरारुन के हाथ गोड़ बान्ह के ब्रह्मपुत्र नदी में डाल दिहलन ओहीजा के लोग। झबुली सोचलन भले आसाम छोड़ के बंगाल जात बानी। सांझ तक गाड़ी हावड़ा पहुँच गइल। टेसन पर उतरते झबुली सोचे लगलन अब का करी, कहँवा जाई। सोचते याद पड़ल जवार के ढेर लोग जूट मिल में काम करे ला। चल के मिल के गेट पर खाड़ रहब। केहू पर नजर पड़ी तब चिन्ह लेब। रात भर ओही लोग के पास ठहर के गोड़-हाथ मोड़ लेब फिर आगे सोचल जाई। झबुली गेट पर टक लगइले रहन निकले वाला लोगन प। तबे जवार के एगो आदमी मिल गइलन। ऊ पूछलन, झबुली तू एहीजा कइसे, आ कब से आइल बाड़? ऊनका के सब बात झबुली बता देलन। ऊनके साथे रात भर रहलन। सबेरे ऊ इनका के एगो व्यापारी सेठ से परिचय करा के काम खातिर सिफारिश कर देलन। जहीर चाचा के सिफारिश कइल काम कर गइल। झबुली के काम भद्राचल घोष दादा के खाना बनावे में लाग गइल। घोष दादा के कोलकाता में बड़हन रोजगार रहे। दस कट्ठा में त खाली रहे वाला मकान आ फुलवारी रहे। फुलवारी में फौब्वारा लागल रहे। नीचे से पानी फेंकत रहे त ऊपरे से बरसा के बूँद अइसन फैल के नीचे गिरत रहे। सब सुविधा रहे बाकी घोष दादा के घर वाली ना रही। ऊ पहिलहीं राम के प्यारा हो गइल रही। अब झबुली के खाये आ रहे के बन्दोवस्त हो गइल रहे। घोष दादा के खाना बनावे के साथे-सार्थ एगो पहरेदार भी झबुली मिल गइल रहन। मालिक के रोज खाना बना खिया देत रहन। जब खाना-पीना कइला के बाद घोष साहेब आपन दुकान पर चल जात रहन, झबुली भी खा-पी लेत रहन। ऊनका चल गइला के बाद इहो घूमे निकल जात रहन। मालिक के लवट आवे के पहिलहीं हाजिर भी हो जात रहन। ई सिलसिला छव महीना तक चलत रहल। झबुली सोचत रहले कि एह नौकरी से का होखे के बा। मने मन दोसर बढ़िया काम ढूढ़त रहले। झबुली अपना घरे अबहीं तक एको चिट्ठी ना देले रहन। का दिहते कि ई एगो सेठ के खाना बनावत बाड़न। तब बाबुजी का सोचिहें? पनपातो का सोचिहें। पनपातो याद त आवत रही बाकी मन में दबले रहत रहन। कोलकतही मेहरारून सब माथा के वाल अइठ के एगो बड़ लोटा अइसन बना के महके वाला फूल के गजरा बन्हले रहेली सन। वाकी झबुली के अबहियो पनपातो के कमर तक लटकल बाल आ ओह में झूमत लटगेना ही याद आवत रहे। पनपातो वाला लटगेना के आगे कलकतिहा गजरा नीक ना लागत रहे। पनपातो त याद में आवते रही बाकी चिट्ठी लिख देला प घरे लवट आवे के दबाव बढ़ जाइत एही से ना लिखत रहस। झबुली एक दिन सुबह में खाना बनावत रहन। तीन लोग आइल आ मालिक से रुपया मांगे लगले। मालिक ना-नुकुर कइलन। ऊ लोग ऊनका के घसीटे लागल। ऊ लोग मालिक से कवनो आपन बाकी बकिअवर मजदूरी ना मांगत रहन जा। झबुली से ई देखल ना गोइल। झबुली के ई देख के फिर खीस उभरल। खना बनावल छोड़ के एक जाना के खींच के कसकं चाटा मरलन। मार खाते ऊ तिल मिला के गिर गइलन। जबतक ऊ सम्हरस दू लोग मालिक के छोड़ के इनके पर टूट पड़लन। ई एगो आदमी के एक फैट मरलें। दूसरको टूटलन त ऊनको के एक लात हुरवेठ देले। बारी-बारी से एही तरी गिरावत गइले। हार-थाक के ऊ लोग भाग गइले आ मालिक के जान बाच गइल। मालिक इनका पर बड़ा खुश भइलन। मालिक कहलन अगर आज तू ना रहत त हमार ऊ सब हजामत बना देले रहतन स। इनका के इहँवा के लोग झबुली के नाम से ना जानत रहे। सब केहू लल्लू-लल्लू कहत रहे।
मालिक खाना खाके काम पर चल गइलें। झचुली के अब डर लागे लागल कि जवना लोगन के मरले बानी ऊ लोग हमरा के छोड़ी का? कहीं ऊ लोग आउर गोहार बटोर के ढूढ़े लागी तब का होई? मन में बाकी अबहुवो हिम्मत बन्हले रहस। लेकिन सोचले अब ईहँवा ठहरल ठीक ना होई। खा-पी के चूपे घर के घूंडी अटका के सेना भर्ती दफ्तर में पहुँच गइलें। राह में सोचत रहलें कि कम से कम जहीर चाचा के आपन बात बता देबे के चाहत रहे। ऊनके सिफारिश से हमरा अइसन बड़ नगर में पाँव रोपे के जगह मिलल रहे। फिर सोचले एह मार-पीट के भंझट में जहीर चाचा पर भी दबाव बढ़ जायी। बतलावल उनका के ठीक ना होई। बस भर्ती वाला लाइन में खड़ा हो गोइलें। दौड़ में, वजन में, फाने में, ऊपर-नीचे करके लटके में, छाती के नाप में तेज आ अव्वल रहले रहन। सेना में चुनाव हो गइल। बिना पर पैरवी, बिना दलाली के चुनाव हो गइल। एके दिन बाद से सेना के ट्रेनिंग खातिर अहमदनगर के वारंट कट कइल। भर्ती करे वाला हाकिम कहलन कि काल्ह दू बजे गाड़ी खुली तबतक जेकरा घरे जाके कुछ कहे सूने के होखे जा सकेला। झबुली के त उहँवा आपन घर रहले ना रहे कहँवा जइते। रात भर भर्ती दफ्तर के आसे-पास रह जाये के ठान लेलन। काहे कि ठहरलका जगहा पर जाये में डरो लागत रहे। मलपटलका लोग कहीं थाना में मर-मोकदमा कर देले होइहें त फिर दोसरे आफत हो जाई। लागल नौकरी में देर हो जाई। नौकरियो छूटे के डर बनल रही। कसहूँ रात भर गुजार देलन। अहमदनगर के बदला में हाजत में गोड़ धराये के भय दूर हो गइल। दोसरका दिन आउर लोगन के साथे ई अहमदनगर चल गइलें। ट्रेनिंग भी छ महीना पूरा हो गइल। रंगरुट ट्रेनिंग पास कर लेलन, तबहूँ अबही तक घरे चिट्ठी ना लिखले रहन, नौकरी लगला के खबर ना देले रहन। छावनी में सब केहू के चिट्ठी आवत-जात रहे, बस इनके ना आवत रहे। जब रंगरुट लोग चिट्ठी अइला पर आपन-आपन मेहरारुन के बात बतावे लागे ओह घरी इनको पनपातो के याद सतावे लागे। आपन कसक दबले रहत रहस। जब फौज के दफ्तर से इनका घर के थाना पर चाल चलन के जाँच के कागज गइल रहे, तब गाँव के चौकिदार बाबुजी के बतवलन कि झबुली के नौकरी सेना में हो गइल बा। घर के सब केहू जान गइल, खुश भइल लोग। घरे सत्यनारायण भगवान के कथा भी भइल। एही तरी साल भर बीत गइल तब कहीं छुट्टी में घरे आवे के मौका मिलल। एक महीना छुट्टी बीतत देर ना लागल। फिर लगले लवट के डियुटी पर जाये के परल। अबकी बे काम मिलल काश्मिर के सीमा रेखा पर।
अइसे भारत-पाक में आपसी युद्ध विराम के समझौता चालू रहे। विराम रहलो पर सीमा रेखा पर सजग रहल, चौकन्ना रहल जरूरी होला। एहसे बराबर चौकस रहे के पड़त रहे। कवन ठीक कब केने से आतंकवादी घुसपैठ करके केहू पर वार कर दीहें। हिजबुल के आतंकवादी त कवनो समझौता के अंग ना रहन। असहीं एक दिन गश्ती के गाड़ी जात रहे तब तक बाजार में बम धमाका हो गइल। दू आदमी मारल गइले, एगो छोट बच्ची भी जान से हाथ धो देलस। एगो सेना के जवान भी बुरा तरह से ओह कार बम के चपेट में आ गइलन। जवान के तुरंते बेस अस्पताल में पहुँचावल गइल। फेर पूरा एरिया के घेराबन्दी करके छान-बीन होखे लागल। अतन में कारनामा करे वाला एगो धार्मिक स्थल में शरण ले लेलन सन। जिम्मेवारी आउर बढ़ गइल। धार्मिक स्थल के पवित्रता बचावत आतंकवादियन के पकड़ल, मार गिरावल भा खोज निकालल कवनो साधारण बात ना रहे। चारों ओर से ओह जगहा के घेर के छीपल लोग के रसद-पानी के सप्लाई लाइन के काट दिहल गइल। दुइये चार दिन में ओह लोग के आत्मसमर्पण के नौबत आ गइल। बाकिर छिपलका आतंकवादी भी कम ना रहन, ऊ सब भीतरे से गोली बारुद बहरी फेंके लगले ताकि दहशत फैला के भागे में सफल हो जास। लेकिन बाहर में त अतहत संगीन पहरा रहे कि चूहा तक के बाहर जाये के साउंज ना रहे। एही गोला बारी में ओह लोग के बारुद घट गइल आ सरेन्डर बोले के पड़ल। ओहन लोग से जवन हथियार पकड़ में आइल ओह पर पाक के निशाना लागल रहे आ पासपोर्ट भी पाके के रहे। एक बे अइसने घटना एक महीना बाद घट गइल। अबकी एगो छनछनात गोली झबुली के बाँह में आके लागल। ओह घड़ी इनकर गाड़ी चौकसी में बाहर सड़क पर जात रहे। तबे एगो झाड़ी में से छिपल आतंकवादी भागल। रखेदा-रखेदउल भइल आ तीन गो आतंकवादी ठावे पर ढेर हो गइलन। झबुली के बाँह में गोली लागल रहे बाकि तबहूओ देशहित, राष्ट्रहित, उभर के ऊपर आ गइल रहे। बाद में सैनिक अस्पताल में भर्ती करावल गइल। ओह घड़ी समाचार मिलला प बाबुजी के साथे पनपातो भी देखे गइल रही। देखली बाकिर पनपातो कवनो घबड़इली ना। कहली जल्दी ठीक हो जाइब। ऊ कहली, देश खातिर अतना का एहू से बड़ आहुति देबे के पड़े त करे के चाहीं। अइसने बलिदान कुर्बानी त लोग के अमर वनावेला। कहली घरे के हाल-चाल ठीक बा। बड़की माई रउवा खातिर महाबीर जी के भंडा बदलवावे के भारा भाख देले बाड़ी। आ छोटकी ननद पाँच क्लास पास कर गइली। अपना स्कूल में ऊ पहिलका जगहा लेले बाड़ी। रउवा खातिर, आवे के समय मौलाना चिश्ती के दरगाह पर बाबुजी चादर भी चढ़वली हाँ। रउवा ठीक होके लौटब तब भंडा बदलाई। अस्पताल से छूटते-छूटते इनकर प्रमोशन सुबेदार में हो गइल रहे आ पोस्टींग भी शांत एरिया में हो गईंल।
अब ई इलाहाबाद आ गोइलें। अवकी ऊ एही जगहा से छुट्टी मिलला पर घरे अइलें। घरे अइला पर महावीर जी के भंडा बदलावल गइल, भारा उतारल गइल।
झबुली छुट्टी में आइल रहन तब कैन्टीन में हप्ता में जाये के शुरू कइलन। अइसे कैन्टीन से महीना भर के घरेलू सब समान कुछ सस्ते दाम पर ले आवस। अइसन सुविधा सेना के लोग के मिलेला। कुछ लोग त उनका से रम के बोतल लावे के भी कहत रहे बाकी ऊ पनपातो के डरे घर में ना ले आवत रहन। अइसन ना रहे कि ऊ पीअत ना रहन, बाकी गाँव घर के लोग केहूँ जानत तक ना रहे। रात में दू पेग जबतक ना लेत रहन उनका नीमन नींद ना आवत रहे। जब छुट्टी में एक दिन गाँवे रहन तबहीं एगो मदारी वाला आइल। डमरू पीटे लागल। लइका सेयान सभे लोग ओह जगहा बटोराइल। अब मदारी वाला खोललख आपन झोला। झोला खोल के एगो तेलिया मसान के हड्डी लेके घूमावे लागल। ओकरा साथे एगो छोट लइका रहे। ओह लइकवा के जमीन पर सूता के खून के रंगाइल ओढ़नी ओढ़ा देलख। आ बोललख सब केहू जोर से ताली बजावे। सभे ताली बजा देलख। फिर मदारी वाला पूछलख, तमूरा बोल कवन-कवन चीज देखत बाड़स। तमूरा बोलल, ओस्ताज हमरा सब चीज लउकत बा। ओस्ताज पुछलन तब बताव कि झबुली के पाकेट में का बा। तमूरा बोलल इनका पाकेट में एगो दू रुपया के सिक्का आ एगो अमरुद बा। झबुली आपन पाकेट देखलन ठीके ऊहे सब रहे। अब ओस्ताज पूछलन खाली एहिजे के चीज तू देख बता सकब कि दूर बाहर के भी। तमूरा बोलल सभे जगहा के। ओस्ताज कहलन झबुली के घरे जाके देख के बताव इनकर मेहरी का करत बाड़ी। थोड़ीका देर में तमूरा बोलल कि इनकर मेहरारु पापड़ बनावे के खातिर फूलल दाल पिसत बाड़ी। मदारीवाला पूछलख तमूरा ई बताव आदमी ईमानदार कबतक रहेला। तमूरा के जबाव भईल-जबतक कुर्सी साथ रहेला। अगिला सवाल भइल, का कुर्सी वाला बेइमान ना होला? तमूरा बोलल-जबतक पकड़ा ना जाई केहू कइसे कह पाई। मदारीवाला फेन पूछलख का पकड़े वाला सभे ईमानदार होला? तमूरा के जबाव आइल-ऊ कुर्सी वाला के पीछा पीछा डोलत रहेला। मदारी वाला लोगन से कहे लागल कि तमूरा भी चलाक लागत बा ईहो राज-धर्म के पालन के सीख लेले बा। सभे लोग हँसे लागल। मदारी वाला खोल के बतावे के कहलख तमूरा से। तमूरा कहलख कि ओस्ताद् ढ़ेर मत खोलवाव। कुर्सी से हटते पटियाला के पगड़ी वाला,
तमिल बोले वाला काला आ चश्मा चढ़ावे वाला जेल में। गोमती के हाथी के जान आफत में कुर्सी से हटते, त अधिकारी से नेता बनल छतीसगढ़ीया नेता चिट्ठी दे के खुदे अधुराइल बाड़े कुर्सी के छोड़ते, त केहू नगदे लेला से कुर्सी से हटा देल गोइल। कुर्सी वाला के प्रमाण-पत्र पर त ताबुत-तहलका वाला भी ईमानदारी के फंडा लहरावत रहले, कोर्ट के कागज त बाद में निकलल। ओस्ताज, भैंस के सिंग तरफ से चढ़े वाला के बारे में जब पूछलन त तमुरा कहलख की बेल के किस्त बढ़ल जात बा। अगिलका सवाल भइल सबसे बड़ जाँच अधिकारी के होला? तमूरा के जबाव भइल सी०बी०आई० आ कबहूँ-कबहूँ न्यायिक जाँच समिति, ना, ना, ना संसदीय समिति। तमूरा से पुछाइल-हउ छोटका लइका काहे रोवत वा? ओस्ताद ऊ अपना ‘बाबुजी से ओनिडा टी०भी० किनवावे खातिर रोवत बा। तमूरा तब बतलाव, ओकर बाबूजी काहे नइखन खरीद देत? काहे कि उनका पासे खरीदे के पइसा नइखे। तमूरा सोच के बताव, घर दुआर बेंच के पइसा के जुगाड़ जुटा के बच्चा के काहे नाहिं खुश कइल जात बा? का इनका बाबुजी के समय सुहावन नइखे लागत। का मौका खुश-गवार नइखे बुझात, का समय प्रसन्न प्रतित नइखे होत? तमूरा ओस्ताद से-तोहार बुद्धि चरखा आ हाथ करघा वाला नइखे लागत? तोहर त रेमण्ड वाला लागत बा ओस्ताद। एक बार सब ओर से ठहाका। घर दुआर बेंचल ठीक ना होई, नाही त तोहरे अइसन मदारी बन के घूमे पड़ी। तमूरा तू हमरा के गाली देवे लगल की सरापे? सारा देश के एही तरीका से उदय हो रहल बा आ तू वेंचला के खराब मानत बाड़। स्वर्णीम चतुर्भुज योजना आइल, नौकरी स्थायी ना भइल त का? अस्थायी त मिले लागल। दुनिया मुट्टी में आइल, मुँह से मुँह नइखे मिलत त का? मुँह से कान के मिलन होत बा कि ना? तमूरा बोललख ओस्ताद तू ढ़ेर सवाल मत दागे लागऽ। हमरा भूख से छटपटी लागल बा। ओस्ताद कहलन तोहरा छटपटी काहे लागल बा, का अनाज के भरल गोदाम बा तबो तोहरा धीरज नइखे? धीरज त ढ़ेर बन्हलही बानी, बरसात में आम के आठी खाते बानी, छोटकी बहिनिया के तू 10 रु० में बेंचिए दे ल। देख हमरा के मत बेंचीह। जा कम्प्यूटर के बिआ डाल के मोबाइल काट के कोठी भर ल। बाकी खइब का, मोबाइल के अनाज। ओस्ताद से ना रहाइल कहलन कि लागत वा तमूरा प्रेमचन्द के दु बैलन के कथा पढ़त वा। तमूरा से कहलन तू गोदान भी पढ़ऽ। अच्छा-अच्छा, कोर्स में से ना निकलल होई, त पूस के रात भी पढ़ लेब। तमूरा बोलल ओस्ताद अब खाये-पीये के भी इतजाम होखे के चाहीं। मदारो काला लोग से बोलल।अब दउड़ के सब केहू घर से रुपया, दू रुपया मुट्ठी-डाली अनाज ले आवे। जे ना ले आई ओकरा ई मसान के हड्डी रात में परेशान करी। सूते ना दीही। रात में सपना में मुँह से खून फेंके लगिहें। अतना कहत-कहत- मदारी वाला के चादर पर ढेर अनाज आ रुपया पड़ गइल। मदारी वाला बान्ह के चल गइल। तमूरा कहलख, ओस्ताज चलऽ चलऽ सपना में सिनेमा देखे। ओस्ताज कहलन कुछ दिन रुक जा। पद्म श्री लालू प्रसाद यादव देख लिहऽ। तमूरा बोलल, प्रकाश झा के जे०पी० फिल्म अइस्खन काटल-छाँटल देखावे के मन त नइख बनवले।
एक रात झबुली, पनपातो के पास गइलें। पनपातो पहिलही से विस्तर लगवले रही। झबुली सुतले त गोड़ दबावे लगली। पनपातो के साथे सूते के कहलें, त ऊ कहे लगली हम एगो रउरे तस्वीर बनइले बानी। पनपातो के कबहूँ तस्वीर बनावत झबुली देखले ना रहन। झबुली के अब तस्वीर देखे के लालसा जाग उठल।
कहलन तू देखाव त तनि। पनपातो कहली हम अइसे ना देखाइब, तनी रउरा हमरा आँख में झांक के देखीं। झबुली कहलन तस्वीर त कवनो कागज चाहे कपड़ा पर रंग के बनावल जाला, तू जल्दी निकाल के देखावत काहे नइखू? पनपातो कहली कागज पर के तस्वीर त पानी पड़ला पर गल जाला। हम जवन तस्वीर बनावत बानी ऊ पानी में गले ना पाई। रउवा तनि हमरा आँख में झांक के देखी त। झबुली अब ओसहीं कइलन। पनपातो के आँख में झकलें। आँख में देखलन कि इनके फोटो आवत रहे। आ जब आपन आँख झबुली एने-ओने हटावत रहन त ऊ तस्वीर लउकते ना रहे। पनपातो ढेर देर ले इनका के बुझाउवल अस तस्वीरवे के बात बोलत रही। ऊ कहली मलेटरी के लोग के कुछ बुझाला कि ना जी? ई कहले तस्वीर त ओइसन होला जेकरा के आदमी बाहर में देखल चाहे त देखते रह जाय। ऊ कहली हैं हम ओइसने तस्वीर बनावत बानी। फिर ई पूछले कि ऊ कहँवा रखले बाडू? ऊ कब देखलइबू ? ऊ कहली ओकर हाथ-गोड़ गढ़ा गोइल बा, खाली अबहीं आँख खोलल नइखे गोइल। फिर पूछला प बोलली कि ऊ तस्वीर अपना पेट में बनावत बानी। अतना कहला प ईनका बुझाइल कि पनपातो के पाँव भारी बा। ई कहलन कि देखिह उल्टी तू सबेरे-सबेरे जादे करत बाडू, कहीं उल्टी के साथे तस्वीर वो मत बाहर में आ जाय। नारंगी के रस पीअल कर। अतना जानला प बिना खुर-खार कइले एके खटिया प दूनो लोग रात भर बोलते बतिआवत सुतलें। झबुली के छुट्टी अभी बाँचल रहे। पनप्रातो के खाये-पीये के बढ़िया इंतजाम कर दिहले। पनपातो के नइहर से उनकर भाई अइलन घरे लिया जाये के। कहलन कि पहिल-पहिलवठ के लड़का नैहर में होखल ठीक रहेला। बाकी झबुली कहलें कि ईहुँवे ठीक रही, एहिजा सब सुविधा बा। ईहँवा रहिहन त फौजी अस्पताल में प्रसव होई। एक दिन पनपातो के दरद पीड़ा बुझाये लागल। ई अस्पताल में ले जाके भर्ती कर देलन। सबेरे नर्स कहली कि सुबेदार साहेब आज त मिठाई बाँटे के परी, रउरा बेटा भइल बा। रूप रंग रउरे अइसन, खूब तंदुस्त, पाँच किलो वजन में, लइका त अबहिये कर्नल लेखा लागत बा। नर्स गोदी में ले आके दिखला भी देली। झबुली एह लइका में आपन तस्वीर चिन्हलन। अब त कैन्टीन से मिठाई किन के सबकेहू के झबुली बाँटे लगले। दोसरका दिन झबुली-पनपातो गोदी में लइका लेले तड़कपुर आ गइलन जा। घर में बधावा बाजे लागल। लोगो देखते कहे लगलन कि ई लइका कर्नल होई। देश के रक्षा के भार एकरे कान्ह पर रही। थोड़े दिन बाद छुट्टी खत्म भइला पर झबुली डियूटी प लवट गइले आ फिर छव महीना बाद रिटायर होके गाँव पर आके रहे लगलें। व्यस्त जिंदगी के बाद रिटायर के दिन बितावल इनका ठीक ना लागत रहे। मन लागे खातिर झबुली यशपाल भट्टी के फिल गुड पार्टी के मेम्बर बने के सोचे लगले। एह पार्टी के कुछ लोग इनकर दुआर के रोज फेरा मारे लगले। एही बीच एगो बुढ़िया जवना के कमर 75 डिग्री तक झुकल रहे लाठी टेकत आ गइल। ओकरा देह पर वस्त्र के नाम पर बस लाज कसहू-कसहू बाचे भर फाटल-चिठल अटकल रहल। झबुली ओकरा के गुड़ पानी ले आके देलन आ दूगो रोटी आ एक फारा आम के अचार। बुढ़िया उनका के दुआ देबे लागल बाकी एगो फटही लूगरी भी माँगे लागल। आउर लोग जे बइठल रहल ऊ लोग भी कहे लागल कि होखे त दे दिहीं एगो नया ना त पुरानो-धुरान निफट एकरा के। रउवा त लइका के जन्म भी भइल बा, खुशी में नया भी दे सकत बानी। झबुली के मन भी भीतरे से इहे कहत रहे लेकिन सकफकात भी रहन। झबुली के पासे गोमती ब्रांड के साड़ी त रहले रहे बाकी सोचलन कहीं जे एकरा के देनी आ बुढ़िया के अरदवाय पूरा भइल मत होखे। तब अपसकुन हो जाई। एकर दुआ से पार्टी के नाम का रोशन होई, चमक घटे लागी। पार्टी के शेयर के भाव घटे लागी। खुशी ना बुझाये लागी। यशपाल भट्टी जी के खबर लागी त ऊहाँ के भी आपन ईज्जत बचावे खातिर कतना रैली में एह वात के हादसा कह के तोपे ढाके के पड़ी। बुढ़िया के आश्वासन चटा के पिंड छुड़ा लेलन। बुढ़िया के लुगा ना देला के टिस इनका मन में अइसन घुसल कि ओकरे हुके महीने भर के भितरही झबुली के वजन 20 किलो कम हो गइल। राह चले में अन्हार होखे लागल, झव आवे लागल। क्रिया करम करे के बेरी लाठी के सहारा लेके खेत बधार तरफ जाये के पड़त रहे। एक बे फर-फराकित होके लवटत रहन कि थाक के एगो झोपड़ी के पासे बइठ गइलन, सुस्ताये लगलन। थोड़िका देर में देखत बाड़न ऊहे बुढ़िया भूइया खरहने पड़ल बीया। फिर ओकरा पासे चल गइलन। बुढ़िया के पाँव छुवलन आ देखे लगलन। पाँव छुवला पर बुढ़िया के बुझाइल केहू आइल बा। ऊहो हाथ बढ़ा के इनकर देह पर फेरे लागल। हाथ फेर के बुढ़िया पहचान लेलख। कहलख झबुली अतना कइसे दुबरा गइल बाड़। तोहरा पर कवन ग्रहण लाग गइल बा। हमार त बेटा के लोग गोली मार के मुआ देलन, आ बेटी के भगा के, केने ले भागल मालूम ना। ओही लोग के खोजे में बेसहारा बनल बानी। तोहरा त बचवा आ मेहरीआ नीक बाड़ी नू। बुढ़िया कहलख जा तू रोज शंखपुष्पी के काढ़ा पीअत रहिह, ठीक हो जइब। केहू के बेटा-बेटी आ मेहर पर नेह रखी ह। झबुली रोज काढ़ा पीये लगलन। गते-गते इनकर तबियत ठीक होखे लागल। बाद में पता लागल बुढ़िया केहू दोसर ना रजिया रहे। झबुली भी सोच-सोच के रोवत बाड़े। रजिया के बेटा के कत्ल आ बेटी के अपहरण के पता लगावला के बाद का ओकर खुशी के लौटावल जा सकेला, भा बीतल से बीतल कहके इतमिनान हो जाये के चाहीं। आज कल भगवान पथरा गइल बाड़न,अल्लाह-तल्लाह निरदयी बनल बाड़न। बस नीक काम करे के चाही। भगवान त निराकारी हवन ऊ काहे के पक्ष-विपक्ष के तरफ झुकस-हटस, पचड़ा में पड़स। बस नीक काम करत रहे के काम बा। भाग्यवाद, पाखंडवाद से अलग रहे के काम बा। पनपातो के बेटा आ रजिया के बेटा के एक जइसन जाने के काम बा। कवनो बात लेके अपनन में रूसा-फूली ना होखे के चाहीं, ना कीचड़ उछलउवल होखे के चाहीं, ना अपनने में धसोरा-धसोरी होखे के चाहीं।
वंदेमातरम आ जयहिंद गुंजायमान होत रहे।

