
भोपाल /मध्यप्रदेश ( मनोज कुमार प्रसाद)10 जून।इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल एवं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 30 दिवसीय “प्रोडक्शन ओरिएंटेड चिल्ड्रन्स थिएटर वर्कशॉप” का समापन रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं नाट्य प्रस्तुति के साथ संपन्न हुआ। कार्यशाला के समापन अवसर पर बच्चों द्वारा तैयार नाटक “मोबाइल का जाल, जी का जंजाल” का प्रभावशाली मंचन किया गया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।
कार्यक्रम का शुभारंभ ,मुख्य अतिथि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी, म प्र नाट्य विद्यालय, भोपाल के निदेशक संजय श्रीवास्तव तथा एनएसडी के प्राध्यापक सुमन वैद्य एवं संग्रहालय के निदेशक डॉ अमिताभ पांडे द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। इस अवसर पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के निदेशक प्रो. अमिताभ पांडे ने अतिथियों का पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत एवं सम्मान किया।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक,मुख्य अतिथि चितरंजन त्रिपाठी ने बच्चों की प्रस्तुति की सराहना करते हुए कहा कि रंगमंच बच्चों के व्यक्तित्व विकास, आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति क्षमता तथा सामाजिक समझ को विकसित करने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने बच्चों को कला और संस्कृति से जुड़े रहने के लिए प्रेरित किया। श्री त्रिपाठी ने संग्रहालय के निदेशक डॉ अमिताभ पांडे द्वारा , संग्रहालय में बच्चों के नाटक की इस कार्यशाला के आयोजन के लिए विशेष तारीफ की । म प्र नाट्य विद्यालय के निदेशक संजय श्रीवास्तव ने भी कार्यशाला के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसी गतिविधियाँ बच्चों में सृजनात्मकता, अनुशासन और टीम भावना का विकास करती हैं।
पहली बार अभिनय कर रहे बच्चों की हौसला अफ़ज़ाई की ।
लगभग 30 बाल कलाकारों द्वारा प्रस्तुत 50 मिनट की नाट्य प्रस्तुति “मोबाइल का जाल, जी का जंजाल” वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण सामाजिक समस्या को केंद्र में रखकर तैयार की गई थी। नाटक के माध्यम से बच्चों ने मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होने वाले दुष्प्रभावों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। साथ ही यह संदेश दिया गया कि तकनीक का उपयोग संतुलित और जिम्मेदारीपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए।
नाटक में उस समय की स्मृतियों को जीवंत किया गया जब मोबाइल फोन का प्रचलन नहीं था और बच्चे अपने दादा-दादी तथा नाना-नानी से किस्से-कहानियाँ सुनते हुए बड़े होते थे। पारिवारिक संवाद, लोककथाएँ, सामूहिक खेल, आपसी मेलजोल और सामाजिक सहभागिता जैसे मूल्यों को नाटक के माध्यम से रेखांकित किया गया। प्रस्तुति ने दर्शकों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि आधुनिक तकनीक के बीच मानवीय संबंधों और पारिवारिक संवादों को बनाए रखना कितना आवश्यक है।
समापन समारोह में प्रस्तुत हुए नाटक “मोबाइल का जाल, जी का जंजाल” ने वर्तमान समय में बच्चों और युवाओं पर मोबाइल की बढ़ती निर्भरता तथा उसके सामाजिक और पारिवारिक प्रभावों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया ।इस प्रस्तुति का सह निर्देशन आशीष गड़वाल द्वारा किया गया । संगीत संयोजन कृति विश्वकर्मा, श्रृंगार एवं वेशभूषा गुरुजी साहू, प्रकाश संयोजन आकाश विश्वकर्मा तथा मंच एवं प्रॉपर्टी व्यवस्था आशीष नाखरे द्वारा की गई।
संग्रहालय के जन संपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि, 30 दिवसीय इस कार्यशाला के दौरान बच्चों को अभिनय, संवाद अदायगी, शारीरिक अभिव्यक्ति, मंच संचालन, समूह समन्वय, गीत-संगीत तथा रंगमंच की विभिन्न तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। कार्यशाला का उद्देश्य बच्चों की रचनात्मक प्रतिभा को निखारना तथा उन्हें रंगकर्म की बारीकियों से परिचित कराना था।
कार्यक्रम के संयोजक द्वय डॉ सूर्य कुमार पांडे एवं राजेन्द्र झारिया, सहायक कीपर थे , जिन्होंने लगातार तीस दिनों तक बच्चों के इस वर्क शॉप को सफल बनाने के लिए कार्य किए ।
कार्यक्रम का सफल संचालन डा मोहम्मद रेहान और सुश्री स्वेच्छा ठाकुर, संग्रहालय सहायक द्वारा किया गया ।
समापन अवसर पर अभिभावकों, कला प्रेमियों एवं बड़ी संख्या में उपस्थित दर्शकों ने बच्चों की प्रस्तुति की मुक्त कंठ से प्रशंसा की तथा कार्यशाला के आयोजन को सार्थक और प्रेरणादायक बताया।
