कृष्ण-कर्ण सोपान
बनवास के दिन अब बीत गइल;
छुप रहला के दिन बीत गइल;
मुस्कान मुँह पर लौट पड़ल,
लौटते पांडव के दिन नीक भइल ।।
वन के तप अगराइल बा;
साधना से बल बटोराइल बा,
चमक तेजी में अब आइल बा
वीरता कुछ जादे ही आइल बा।
सोना से गरदा झड़ जाला,
जब भट्ठी में ऊ तप जाला;
सोना असली बन चमकेला,
ओसहीं पांडव निखरलन।
नस के कगार बल से तोडले,
नयका जोश भीतर में भरले;
पांडव के पाँव अब धमकल बा,
अइसन जइसे हहास बन्हले।
साँच बात बा दुख अइला पर,
डरपोक बइठ के रोवेलन;
वीर ना तनिको डीगेलन,
चुपेचाप सब कुछ सहेलन।
बाधा के यार बना लेलन,
कँटवे में राह बना लेलन
आह-ओह ना दुख में करस,
संकट से तनिको ना डरस;
दुख में कान्ह ना छटकावस,
अपना लायक ऊ राह बनावस।
भोथर बरछा के नोक तेज करे के,
दुख के अब बस रौंद के छोड़े ;
नइखे दुनिया में अइसन काँटा,
जवना के वीर रौंद ना छोड़े;
बान्ह लंगवटा जब धकियावे,
मैदान छोड़ पर्वत खुद भागे।
मानव के जोर लगवला पर,
पत्थर के पसीना आवेला;
विकट काल अपने से आप,
अपना लायक हो जाला।
गुणन के कमी ना मानव में,
ढेरका ऊहो छिपा के राखे;
लाली मेंहदी में छीपल रहे,
रोशनी बाती में छीपल रहे।
दिअरी बाती जे ना जारी,
घर में पायी का ऊ उजियारी;
बदरी के पेट पानी से भरल रहे,
पर्वत से टकराई त खुदे बरसी।
जड़ी-बूटी में रहे छिपल दवाई,
खल-मूसल में जतने रगड़ाई;
तबहीं लाभ भेंटाई, दुख भगाई।
जब ऊख पेराई केल्हू में,
तबे रस अपने हहराई;
जब सिलवट पर मेंहदी रगड़ाई,
गोरिया रूप तघे छमकाई।
के भइल धरती के अगुआ,
के धरती के दाब में रखलख;
यश बटोराइल केकरा पासे,
के नयका धरम चलवलख।
जे सूतल कबहुँ ना रहेला,
दुख झेलते आपन नाम करे ला;
दुख जब भीड़ के आयी,
झटके नींद ऊहो खोल दीही।
फुलवारी ना वन होवेला,
विस्तर ना कबहुँ रण होला;
आन्हीं पानी तेज का घाम,
ईहे औजार बीरन के होला।
विहंसत फूल बस वन में होला,
सेमल फूल ना बाग में होला;
सरकस के बाघ भले हंसावे,
काट खाय के ताकत घटल रहेला।
रोड़ा जेकर विछावन होखे
होखे आसमान जेकर खुलल चादर;
जे दूध दुख के पिअले होखे
गीत बुझाइल होखे, अन्धड़।
जे होखो जरल लाह के घर में,
ऊ हे बड़ का योद्धा होलन;
जे काल के कवर बनहूँ में ना घबड़ाई,
ऊहे काल के गाल फाड़ सकेलन।
दुखख रौंद रौंद के छोड़ऽ बबुआ,
बल-वीर्य, बनावऽ, पत्थर अस देह बनाव बबुआ;
आग के लुतकारी का करिहें,
तोहरा डरे के ना कंपिहें।
जे बारह वरस जंगल में घुमते,
रोक रोकावट सब दुख के पीअल;
का ओला, का बरसा, घाम
सब सहते आउर ही निखरल।
कबहुँ किस्मत त जागेला,
देखीं कइसन दिन आवेला;
कइसे यार बनावल जाला,
बढ़िया राह धरावल जाला।
समझस दुर्योधन कि कइसे,
नाश भयानक छोड़ल जाला।
हस्तिनापुर अइले भगवान,
पांडवन के हिस्सा के बात बतलवन भगवान।
फरियावल चाह त आधा दे द,
ओकरो में यदि हिचकत होख
त वस पाँच गाँव ही दे द
बाकी धरती तू रखले राख्।
अतनो पर पांडव मजे में खाइ हे’,
ना कुटुम्ब पर हाथ उठइहें
अतनो ना दुर्योधन दिहलन,
लोगन के आशिष ना लिहलन,
उल्टे भगवान के बान्हल चहलन,
कठिन काम के करे चललन।
जब काल माथ मंडराला
भलाबुरा सोचल झकोराला,
कड़कडात भगवान गरजले;
आपन चेहरा के बहुत बढ़वलें;
खिसी भगवान के बोलते ही,
धरती तक भी डोले लगले।
लेके जंजीर मन पूरा त करऽ,
बल होखे दुर्योधन बान्ह के देखऽ।
ल देखऽ अम्बर आउर बवंडर हमरे में,
सारा झंकार छीपल हमरे में;
जीये के बा गमक हमरे में,
सब के अन्त बा हमरे में।
पर्वत लिलार हउवे हमरे;
धरती चौड़ी छाती ह हमरे
संउसे दुनिया अंकवारी में हमरे,
पँउवा दू पर्वत अस हमरे।
तरइन के झुंडन के पात,
बा हमरे मुहँवा में चमचमात;
आन्हर ना होखऽत लड़ी पिरोवल,
चौदहों भुवन लउकी हठात।
मरल, जीयत, देव, मानुष, जीव, जगत,
ल चर, अचर, अमर के देखऽ,
अरबों अरब चन्द्र सूरज के देखऽ।
नदी, तलाब, सागर, पर्वत सब
हमरे मुँहवे में देख।
मरणशील मानव के देखऽ
अमर सभी देवन के देखाऽ
मंगल से राहु केतु तक,
हमरे मुँहवा में देखऽ।
हमरे मुँहवा में कतना कुबेर,
कतना वरुण, विष्णु, ब्रहमा, महेश के देखऽ;
एही में काल, एही में लोक पाल,
एही में कोटि-कोटि रूद्रन के देखऽ।
छोटका जंजीर का,
बड़का हो खो त लावऽ;
सकबऽ दुर्योधन त तनिका,
बान्हियो के देखलावऽ।
धरती, धरा, आकाश, पताल,
भूत, भविष्य मुँह में हमरा देखऽ;
कइसे जगत के गढ़ल जाता,
कइसे महाभारत लड़ल जाता देखऽ।
लाश बिछल बा रण में जहँवा;
चीन्हऽ एह में बाड़ऽ तू कहँवा।
घटाटोप बदरी के देखाऽ,
देखऽनीचे पताल बा कहँवा।
तीनो काल मुट्ठी में बान्हल,
देख रूप भयंकर हमरो उहँवा;
सब हमरे से पैदा होवेलें,
मरते हमरा में मिले लें जहँवा।
हमरे जिह्वा आग उगलेला,
उनचास पवन संसवे में हमरा होला;
जे नहीं हमहूँ नजर दौड़ायी,
लोट-पोट ओनहीं में होला।
बन्हबऽत कतहत बड़का
जंजीर ले आइल , बाड़ ऽ,
खुलल आसमान के पहिले बान्हऽ
यदि हमरा के बान्हे के बाड़।
जेकर ओर छोर ना होला,
बान्ह ना केहू सकलखा;
तूहीं का हमरा के बान्हे सकबऽ?
जेकरा के केहू ना बान्हे सकलख।
आपन हित के बात ना बुझलऽ,
ना दोस्ती के मोल पहचनल,
जाते जात हम कहत बानी,
दृढ़ निश्चय के त सुनलऽ ।
भीखमंगी के बदले,
अब भिडन्त ही होई;
जिनगी में जय होई;
नाहिं त रंथी ढोवल जाई।
नक्षत्रन के झुंड नभ में टकरइहें,
धरती पर भभकत आग बरसइहें;
धरती डोल के फाटे लगिहें,
काल गाल फैलवले रहिहें।
कसके भिड़न्त ई अइसन होइहें,
दुर्योधन फिर ना कबहुँ वो होइहें;
भाई के भाई धर लसरइहे,
खून लभेरल जहरे बाण चलइहें।
लाशन के खा काक सियार अघइहें,
फूटल करम पर मानुष रोइहें;
तोहरो देह माटी में मिलिहे,
कष्ट के कुल्हाड़ी पर दोष मढ़इहें।
डर से अबतक सभेलोग,
मुँह सिअले बेहोशी में रहलें;
धृतराष्ट्र, विदुर दु लोग,
सुख से अफराइल रहलें।
डर-भय छोड़ के दुनो लोग,
बस हाथन के जोड़ले रहन;
दो सर कुछुवो नाहिं,
जय जयकार ही करत रहन।
लड़ हीं के ललकारत गरजत,
भगवान सभा से रहिआ नपलन;
अचरज में पड़ल लजाइल कर्ण,
मिलले केशव से राही में बहकल।
प्रेम से केशव पकड़ कर्ण के बँहिआ,
अपना रथ पर लेलन चढ़ाय;
रथ चलते बीचहीं बतिअवले,
शान्ति आ राज के दाव चलाय।
लाचारी में धेनुहा धरहीं के पड़ी,
क्षत्रिय के गोल चाहे जतना मरी,
कतना ना हमहूँ समझइली,
कतना उपहास ना फिर-फिर सहलीं।
बाकिर बाड़न दुर्योधन मद में चूर,
उनका समझावल त बडुवे दूर;
उनका चाहीं अब खाली लड़ाई,
चाहे लोग जतना मर जाई।
बोलऽकर्ण पाँच गाँव का बड़का रहे,
भारी लागल ऊहो,
कौरव के मति भरमाइल रहे।
कइसे दुर्योधन के हम समझाई ?
कइसे भिड़न्त के अब रोकवाई ?
तनिका सोचऽ कइसन विकराल ई लीला होई,
जब खुदे काल रण में खड़ा होई।
रही गरम खून जब बाहर में बहत,
आउर भीतर में विघवा रहिहें रोवत,
बिन पलवइया बच्चा चिल्लइहे,
भूख-दुख से अपने बिल्लइहें।
बड़ा सोच में पड़ल बानी कर्ण,
कि अब हम का करीं कर्ण;
अब शान्ति के केने छिपा के धरी,
उपाय होखे बतलावऽ ओह के गढ़ी।
कवनो राह ना लउकत बा,
का एगो बात के तुहूँ मनबऽ;
तब अबहूँ शान्ति बन सकत बा
चहबऽत भिड़न्त रूक सकत बा।
दुर्योधन तोहरे पर इतराइल बाड़े,
उनकर जीवन के ज्योति तोहरा में बाड़े;
तोहरे पर आसरा बा उनकर,
भरोसा जय के तोहरा बा उनकर।
जबतक तू उनकर साथ ना छोड़बऽ,
ऊ काहे के युद्ध के छोड़िहे।
साथे जबतक तू उनका रहब,
युद्ध छोड़ ना दोसर बोलिहें।
गजब भयानक घटना के चलते,
तू हव कुन्ती के पहिला लाल;
पर सूत पूत बन सहल उपहास,
फिर कौरव दल रखलन पाल।
सोलहों घड़ी तू धेनुहा तनले,
रहऽ पांडव से लड़े के मन बन्हले
, पइलऽ ना प्यार माई से कवहूँ,
नाहिं सँचका बात बतावल गइल।
भाग्य भरोसे चक्कर में पड़लऽ;
दुलार दुश्मन के घर में तू पइलऽ
दोसरे के आपन भाई तू जनलऽ,
एक पेटवा भाई के बैरी जनलऽ।
कवनो बेजाय ना बडुवे तोहरो,
तबहूँ मानऽ एक कहना हमरो;
चलऽ-चलऽ अब साथे हमरो;
जहँवा बाड़न पाँच भाई तोहरो।
छूटल भाई से भाई मिल जइहें,
सबमिल बइठ के मउज मनइहें,
तूही कुन्ती के बड़ बेटा हवऽ,
वल बुद्वि भल चलन में बड़का हवऽ ।
तोहरे माथ पर मुकुट धरब जा,
तोहरे के मंत्रन से पूजब जाः
तोहरे पाँव पखारब जा,
तोहरे आरती उतारब जा।
जूता पहिनइहें तोहरा के भीम,
युधिष्ठिर चॅवर डोलइहें तोहरो;
खड़ा चौकिदारी पर रहिहें अर्जुन,
सहदेव, नकुल पिछलग्गू रहिहें तोहरो।
भोजन के थाली उत्तरा ले अइहें,
हँसते पंचाली जूठन थाल हटइहें।
देखे में कइसन बढ़िया लागी;
दुनिया के अद्भुत आनन्दे लागी,
भूलल आपन रतन के पवते ही,
कुन्ती के मन गद्-गद् होखे लागी।
तब अचके में युद्ध ठहर जाई,
बिन मरले दुर्योधन मर जाई,
संसार सुख से भर जाई,
दुख ना केहू के हो पाई ।
सगरो गीत गवायी तोहरो,
बड़ भागी मनिहन सब तोहरो;
सउसे राज के तुहूँ लेल,
छोट-बड़ सब देश के लेल;
मान-सम्मान मुकुट के साथे,
ऊँच सिंहासन तू ले ल।
सब कुछ अब तू लेल,
बाकी एके भीख तू दे द।
हे यार, छोड कौरव के,
एह रण के रोकऽ;
झाँक रहल बा दुख आवे के,
अबहूँ त तू ओह के रोकऽ।
भइलन व्याकुल बात सुनते कर्ण,
तनिका में भइलन गंभीर;
कहलन ई सब ह माया के जाल,
जवन बात के रउवा मरलीं तीर ।
ईहे कथा सूर्य देव से सुनले रहीं,
सुनला पर दुखे उवकाई पावत रहीं।
सोचते आपन जनम के बात,
तौले अपना के लागी ला;
माई कइसन भयंकर होइहें,
उनका कइसन जन्मावल लागेला।
जमते नदी दहवबली जे,
जियते में दफनवली जे;
जेकरा के अपना ढीढ़ में रखली,
अपना पेट में राख के पलली।
हाड़ मांस आपन जे दिहली,
आपन खून से भ्रूण के पलली;
ओकरा के कतहूँ ऊहे फेंकली,
अपना से कुछ बाकी ना रखली।
अइसन माई ना बस नागीन होली,
हे केशव मुँहवा के सटले राखीं;
सुनतो ना नीमन लागत बा,
एह पर तनिको मत कुछुवो भाखीं।
सुनला पर कान फटत बडुवे,
जवना माई से हमरो जन्म बडुवे ।
ऊ नारी ना कुल बोरन होइहें,
ऊ नागिन बड़ा भयावन होइहें;
पत्थर अस दिल उनकर होइहें,
बेटा से बढ़कर लाजे होइहें।
आपन अँचरा में आग लगाके,
उपजावे के बात छिपा के;
हमरा से बैर ऊ कइसन सधली,
हर माता के मुँह कालिख पोतली।
माई छाती ना पीये देली,
उल्टे कलंक माथा पर देली ।
अपने प्रशंसा पावत रहली,
सबके खीस हम अकेले सहलीं;
अपने कुंआरी कन्या ऊ रहली,
जतना कहर सब हमहीं सहलीं।
कुल-गोत्र हमार छोटहन मिलल,
राजा के बीच मुँह धुमिलाइल मिलल।
रोजे रार कहाते हम रहीं,
सुत पुत हमी कहाते रहीं;
पत्थर दिल उनकर पसीजल नाहि,
धीक्कार काहे कुन्ती अबतक कटली नाहिं।
तिरस्कार के आग हम जलत रहीं,
पृथा नंगा नाच सब देखत रही,
सूत कुल में हम पलत रहलीं,
माँ सनेह के तब का अरथे रहल।
चुपके चोरी यादो ना कइली,
अँचरा के ओढनी दे ना पइली;
पाँच बेटवन पर इतराल रहली,
सुख में दिन-रात भुलाइल रहली
कुन्ती घमंड में मातल रहली।
सूत पुत मान हमरा से हटले रहलीं,
अब का भइल व्याकुल भइली,
का मतलब अपना पास बुलववली।
का नइखी बनल पाँच बेटन के माई?
भा बेटा दिहलन धन-धाम गंवाई ?
कि जब नाश माथ मंडराये लागल,
कि अब उनकर मन घबड़ाये लागल।
का सब औरत असहीं कबहूँ दयगर हो जाली,
का दूर फेंकल लइका के असहीं गला लगावेली।
डर से कुन्ती जब लाज में रहली,
गुम सुम लगवले मुँह फेरले रहली।
हमरा में सब दोष अबहुँवो, बड़ले बा,
पाँच से घटला पर पाँच रहे के वरदान उनका बड़ले बा।
कि पाप, कि बरदान अब डरे भागे लागी,
काट-काट का कुन्ती के खाये ना लागी ?।
अचके में हाल गजब का भइल,
हमरा चरित्र पर कइसे गंगाजल छिड़काइल,
कुन्ती के हिरदा अब का चाहत बा ?
सुख में हम रहीं कि पांडव के जीत चाहत बा
ई नया-नया प्रशंसा का ह?
केशव बतलाई बदलाहट का ह,
जब धनुषबाज नमगर भइलीं,
हमरे भल सब काहे ताके लागल ?
पर याद समय ऊ आवत बा,
जब निष्ठुर निरदयी समाज रहे लागल,
सुतलो में सनेह ना केहू देखलावत रहे,
हरदम जहरे के ताना मारत रहे।
ओह घड़ी ना ऊ अंकवारी में भरली,
ना आँचरा से लोर हमरो पोछली ।
हमरा के कवनो का चूमत रहली ?
दुख के आग का कबहूँ हरली ?
अब राधा के छोड़ केकर गीत गायी ?
ईहे हई मातारी, बोली केकरा के छोड़ल जायी ?
तनिका सा केशव ईहो सुनलीं,
का ह झूठ, का साँच ईहो सुनली।
जब काँच कींच में पड़ल रहीं,
के कर सनेह से बढ़ल रहीं?
के के हमरा आदर देलस ?
के मुकुट दे ऊपर कर देलस ?
दुनिया त खिसिअइले रहे
हमरे टंगरी के खींचत रहे;
सुसकत रहे जब दरकल मन,
अचके मिलले तब दुर्योधन।
छल कपट हटा निरमल प्यार ले अइलें;
लागल संउसे किस्मत एके बे दिहलें
कुन्ती त कोख से खाली बाहर कइली,
माई के काम त सब राधा कइली।
का होला नीके से जीअल,
ई त ह दुर्याधन के दीहल।
रंक से राजा ऊहे बनवले;
दुनिया के सोझा ऊहे रखखले,
आपन कान्ह पर ऊहे उठवलें ।
कतना उतयोग ना कइले बाड़े,
हमरा के नयका जिनगी देले वाड़े।
हमरा रोवाँ-रोवाँ पर उनके करजा बा,
ई बात चाँद-सूरज तक जानत बा।
ई तन-मन-धन दुर्याधन के हउवे,
सारा जिनगी अब दुर्याधन के हउवे।
इन्द्रलोक मिलिहें तबहूँ ना ताकब,
केशव, ना दुर्योधन के कबहूँ छोड़ब ।
हमरे पर उनकर आसरा वा,
उनकर विश्वास हमरे में बा;
नइखे तनिको एह में झूठ,
हमरे बल अतहत संग्राम ठनल बा।
जब दुर्याधन से छल करब,
का पापी ना हमहूँ बनव ?
खेलत-खात साथे हम रहलीं;
टाश, किस्मत उनका से पवलीं।
अब जब काल गाल फैलवले बा,
प्रलय के बादल जब छवले बा;
एह घड़ी साथ छोड़ जब भागब,
का कायर डरपोंक, निरदयी ना बनब?
जब लोगन के नजर में आइब,
जब कुन्ती के बेटा हमहूँ कहलाइब;
थूकी दुनिया सब हमरा ऊपर,
मन में गरियाई सब हमरा ऊपर।
खाली विष डंक ना हमहीं सहब,
कुछ कलंक अर्जुनो के लागी;
हारला के भय से अर्जुन के,
कवनो गजब चाल ई लागी।
का कवनो चल दाँव कर्ण के फोड़लन,
डरे कइसन इनका संग नाता जोड़लन।
ना केहू कहहीं में चूकी, सब हमरे मुँहवा पर थूकी ।
तप, त्याग, शील, जप, योग, दान
हो जइहें सब मिट्टी के मान;
लोभी लालची कहलावे लागब,
फिर केकरा के मुँह दिखलाइब।
जतना बात हम कहलीं केशव,
कुन्ती ही कहती कृपाचार्य से ऊहो,
सुनियो के मुँह लजाइल रहित,
ना समर रचाइल रहित ईहो।
तब ना दुर्याधन के कर्ण मिलल रहतन,
ना पांडव कबहूँ वन गइल रहतन।
लेकिन अब नाव घाट छोड़ले बा,
ना जाने कवन डगर धइले बा;
बीच नदी के धारा पर बडुवे नाव,
मालूम ना कहाँ किनारा बा ठॉव
भले अब धार के बीचे मरव,
पर पींछा कबहुँ पाव ना धरब।
का धर्मराज के बड़ भाई बनी ?
की भारत में सबसे बड़ वीर कहायी।
की कुल के चादर देह पर ओढले,
की अकड़त माथ उठाके चलीं तनले।
का झूठ लवादा नीरस नइखो ?
केशव, अइसन सुयश में सुयश नइखे।
बड़का खानदान के टीका फाना,
बडुवे भीतर से फीका-फीका;
जब नाम ना आपन लेबे पाइब,
ना तेजई आपन देखलावे पाइब।
अइसन भी होलें बहुते लोग,
कुल बोरन होले बहुते लोग।
जेकरा पास पुरूषारथ होला,
कुल के छतरी ना माथ खोजेला।
आपन बल बूत्ता अपने बढ़ावेला,
दुनिया में सहजे आदर पावेला।
केकर जीभ ना देखते पनिआला,
कवनो उपाय कर अपनावल जाला।
कुल गोत्र ना हउवे हमरो हथियार,
पुरुषारथ बा एके हथियार।
कुल हमरा के जब फेंकले रहे,
तबो कुछ कर दिखलावे के हिम्मत रहे।
अब कुल काहे चकराइल बा,
अपने खोजे हमरा के आइल बा;
तब हमहूँ लौट के जाइब का?
अपना निश्चय से डिगब का?
समर में कौरव के होके कर दिखलाइब,
नाहिं त भले अर्जुन के हाथे मारल जाइब ।
ईहे बा हमरो निश्चय हे केशव,
ई छोड़ ना मुक्ति बा हमरो हे केशव।
दोस्ती के छाँह सुखदायी होला,
ऊ लहकत देह के उद्वेग हरेला।
जवन गाँछ छाँह के देला,
ओकरा के चाहे जे काटेला;
पर पहिले जे खुद जान ना देला,
ओकरा बस धिक्कार ही होला।
जेकर बाँह के धइली हमहूँ,
जवन गाँछ के छाँह हम पवलीं;
ना हाथ उठावे देब उनका पर,
रोकब कुठार चाहे जेने से चले।
दे के जान बचाइब उनका,
चाहे साथ कट जाइब उनका।
दोस्ती ह बेसकिमती हीरा,
धन से ना कबहुँ ऊ तौलाला।
धरती के त बाते छोड़ी,
सरगो पराया अस होला।
मिलिहे सरग त सेतिहे दे देब,
दुर्योधन पाँव ओह के रख देब।
बानी, माथ कान्ह पर ढोवत
दिन गिन-गिन के ढोवत बानी।
कवनो कुठार दुर्योधन पर आयी,
हमरे माथ ऊ ढोवल जायी।
गरदन कटवाइब उनके खातिर,
ना रही एह से अच्छा कवनो फिर।
चाहे धर्मराज बनिह महाराज,
नाहिं त कुरुपति पेन्हिहें ऊ ताज।
हम त सैनिक जइसन रहब,
दुर्योधन के तरफ से लड़ब।
राज-ताज से का बा मतलब,
करज चुकावल बा एक मतलब ।
कौरव पति से राज कबो का चहली?
कबहूँ का साम्राज्य हमहुवो चहलीं?
का एह बात के जानत नइखीं केशव?
अबहू का पहचानत नइखीं केशव ?
जीवन के मतलब अतने समझींला,
धन-धूर बरोबर बस समझीला,
धन पर आँख गड्वले नइखीं
गद्दी हथिआई चाहत नइखीं।
गट्टा के बल पर जीतब दुनिया,
धन बटोरब जे होइहें दुनिया।
सब दे देब सखा दुर्योधन के,
लालच ना डिगा पाई मन के।
ना धन चाहीं ना धन झमकावल चाहीं,
ना जिनगी के परवाहे बड्वे
दान के नदी बहायीं गंगा अस निरमल
मन में एक बात त भरल बडुवे।
‘रहे हाथ से दान हरदम टपकत,
जवना से गरीब के झोली रहे भरत।
का बडुवे ई राज्य ? बहुत ओछा बा केशव,
मिललो पर का केहू कुछ भी पावल केशव।
ढेर का फिकिर आ निन्दा कुछ-कुछ,
चकचोन्हीं अस झमकेला कुछ-कुछ।
धन सम्राज्य साथ ना कबहू जइहें,
अइला पर एहिजे छितरइहें।
हमरा अस जवन लोग भी होइहें,
नाहिं माथ पर सोना ढोइहें।
मिलेला बाँटे खातिर, धन
मिलेला हीरा लुटावे खातिर
ऊ दुनिया से कुछुवो ना ले ला
हिरदा भी चहला पर देला।
छत के कंगूरा पर सोंची के बइठेला?
घर मालिक नीचे, ऊपर कबूतर के डेरा होला।
कबहुँ गरूड़ का घर भीतर सूतेला ?
की सोना के पलंग पर कभी सूतेला ?
पर्वत्त के उपर ऊ वास करे ला,
ओकरे दरार में ओकर डेरा होला।
धन-सुख के जे वश में होला,
ओकर तप रोजे दुबर होला।
ई जोम, ई मुकुट, कुर्सी मोती के गाथल,
प्रभुताई मानुस के झारत रहे पल-पल।
धन खातिर लोग ललचाइल रहे;
ऊहे धन उनका रोज चबावत रहे।
चाहे बग-बग उगल अंजोरिया में,
जे बइठल रहे बीच फुलवरिया में,
देखखे में चीकन चाकन होखस,
मिसरी अस चाहे ऊ बोलस।
जे दुख के हरदम झेलले होई,
अन्धड़, पानी, तलफत, भुंभरी में रहले होई;
ऊहे नाग के फाँस छुड़ावे पइहें,
धरती के हिरदा ऊहे जुड़ावे पइहें।
हम पंछी के राजा अस अपने गरूड़,
चाहीं ना सिंहासन पर होवल आरूढ़
घोर विपद् में दुर्योधन बाड़न,
कवनो हालत में हम ना उनका छोड़ब।
एह समर के हमरा काटे के बा,
लपेटाइल साँप के काटे के बा;
समर के सागर अब हलकोरले बा,
लउकत बा प्रलय अब घेरले बा।
भुजा अबके बस अंइठत बा,
बिजली अस नस-नस झनकत बा
लागत बा युद्ध में अबहीं कूद जाई,
रण जीती चाहे लड़ बीच मर जाई।
मत करी देर तनिको हे केशव,
हमरा के मत अझुराई हे केशव
तन जाये दीं धेनुहा पर डोरी,
ठन जाये दी रण भीषण घोरी।
पुरुषारथ के साथे किस्मत लहराई,
ओकरे तेज दुनिया में छाई।
पर हथजोरी बा एके केशव,
पैदाइश के बात छिपा राखब हे केशव;
धर्मराज से कबहूँ मत कहब,
अपने मन में सब दबले रहब।
जब ऊहो एह बात के जनिहे,
सिंहासन के लात ऊ मरिहें,
अपने ना कबहुँ गद्दी लीहे,
सउसे दौलत हमरा के दीहें।
अपना पासे ना हमहूँ राखब,
मिललो पर सखा दुर्योधन के दे देब
फिर पांडव के कुछुवो ना मिली,
लागल दुख से ना छुट्टी मिली।
नमन कर चलत बानी हे श्रेष्ठ,
तुरंते रण के सब काम फरिआवे श्रेष्ठ;
सभर भूमि में अब दर्शन होइहें,
वाण ही करी राउर चरण स्पर्शन।
जय जय सूर्य देव नभ में विहरत रहीं,
धरती पर आपन तेज चमकावत रहीं;
राधेय, कृष्ण-रथ छोड़ देलन,
उतरते केशव मन अचरज देलस।
धन्य-धन्य सौ बार धन्य हे वीर,
ना होइहें तोहरा अस केहू यार धीर गंभीर;
खाली नइखऽकुरुपति के ही परम शक्ति,
सँउसे मानवता के चमकत एक शक्ति।


