
RKTV NEWS/आरा (भोजपुर) 01 जून।डॉ कृष्ण दयाल सिंह की चौथी प्रकाशित पुस्तक है “तपल करमजरु” जो वर्ष 2004 में प्रकाशित हुई थी ।इसमें संग्रहित सभी रचनाओं के प्रकाशन से पूर्व इस पुस्तक पर विभिन्न साहित्यकारों द्वारा दी गई टिप्पणी को प्रकाशित किया जा रहा है।
‘तपल करमजरू’ डा. के. डी. सिंह के अथक परिश्रम के परिणाम बा। प्रसिद्ध काव्यसंग्रह ‘रश्मिरथी’ के भोजपुरी अनुवाद ह। अइसे भी भोजपुरी साहित्य के भंडार के एगो कोना एकदम खाली बाटे। ऊ कोना ह अनुवाद वाला। दूसरा भाषा के अनुवाद अपना भाषा में कइल एगो सृजनशील काम ह। डा. के. डी. सिंह के ई सृजनशीलता सराहनीय बा। अइसे अनुवाद एक बड़ा कठिन कर्म ह। हमरा देखे में साहित्य के हर विधा से कठिन। काहे कि मौलिक सृजनशीलता में हाथ-पाँव मारे के पूरा अवकाश होला, बाकिर अनुवाद में हाथ-पाँव बंधल रहेला। मूल कृति में आइल कृतिकार के भाव के रक्षा करते दूसरा भाषा में अनुवाद त तलवार के धार पर चलला के बराबर होला। जरूर कहीं ना कहीं पॉव कटे के खतरा रहेला। कभी-कभी हल्का-फुल्का चीरा लागिर जाला। बाबू के. डी. सिंह जी ई खतरा उठवले बानी एह खातिर साधुवाद। अइसे महाकवि ‘दिनकर’ के भाव रक्षा करे में कवि के पूरा सफलता मिलल बा। कहीं-कहीं इहाँ के मौलिकता भी जोर मारि गइल बिया। बाकिर संतोष बा कि एह मौलिकता से मूल कृति के भाव के ऊपकर्ष ना होके उत्कर्ष भइल बा। जइसे मूल काव्य के अंत में दिनकर जी कर्ण के विषय में युधिष्ठर से कह तारन
“मानवता का नया नेता उठा है जगत के ज्योति का जेता उठा है।”
एहिजा के डी. बाबू के भाव छलांग लगा देता। ईहा के कर्ण के मानवता के नेता के रूप में ना देखिके खुद मानवता के रूप में देखऽ तानी। “समझिह मानवता आज उठल बा;
चमक दुनिया के देबे वाला नेता आज उठल बा” ज्योति के जेता ना कहि के खुद ज्योति बाटे वाला कहऽ तानी। खैर ! के. डी. सिंह जी अनुवाद कर्म में बिछिलाइलों बानी त पीछे ना घसकि के आगहीं घसकल बानी। भले ही रश्मिरथी के छंद के निर्वाह करे में कवि के सफलता नइखे मिलल बाकिर लय बरकरार बा। कहीं-कहीं तुकभंग भी खटका मारि जाता बाकिर अतना त ध्यान में रखही के परी कि भाव के रक्षा में इ छोट-मोट भूल बाधक नइखे भइल।
सिंह जी के ई प्रयास सराहनीय बा। भोजपुरी में अइसन करम ईहाऽ के अउर करीं, एही शुभकामना के साथ।
डॉ. दिवाकर पाण्डेय व्याख्याता हिन्दी-विभाग जैन महाविद्यालय, आरा 30/11/03 अभिमत
सरल सहज व्यक्तित्व से सम्पन्न, अक्खड़ स्वाभाव के मालिक, हिन्दी आ भोजपुरी दूनो में समान रूप से कलम चलावे वाला डा० के० डी० सिंह जी के ‘तपल करमजरू’ देख के बड़ा खुशी भइल।
आदमी के रूचि आ प्रवृति के रचना पर बड़ा प्रभाव पड़ेला। रचनाकर के भीतर जवन रहेला, ऊहे शब्द के साथ पाके रचना के रूप में बहरिआला। दूध रहेला त दूध फफाला आ पानी रहेला त पानी। डा० के० डी० सिंह जी के भीतर दुनिया भर के लोगन के कलेश-कष्ट, दुख-दर्द, आ अउलाह पीरा के सागर बा, जवना के ज्वार कबो कबो फूट के बाहर निकल आवेला आ रचना के रूप ग्रहण कर लेला। कवि के कोमल मन कल्पना के भुलावा में ना भटक के सदा यथार्थ के करीब पावेला अपना के। एही से डा० के० डी० सिंह के रचना यथार्थ आ उद्देश्य परक होली सँ। गरीब-गुरवा, दलित-बंचित, दबल कुचलल आ उपेक्षित लोगन के दबल स्वर के मजबूती प्रदान कइल, ओकरा दुख-दर्द के समाज से रूबरू करावल आ निदान के उपाय सुझावल इहाँ के रचना के मुख्य स्वर रहल बा।
आज अइसनके रचना आवे के चाहीं जवना से सौहाद्र आ भाईचारा पनपो। विश्वास आ सहयोग के वातावरण बनो। घृणा विभेद घटो। समाज में खुलापन आओ आ राष्ट्र विकास के पथ पर बढ़ सको।
अनुवाद बड़ा कठिन काम ह। ओह में बाढ़ के पानी नियर पसरे के स्वच्छन्दता नइखे। दो पाटन के बीच दरिया के माफिक बहे के पढ़ेला। मर्यादा के माने के पड़ेला। भाव आ
शब्दन में ताल मेल बिठावे के पड़ेला। एह क्रम में कहीं कहीं तुक भंग हो गइल भी स्वाभाविके बा। हमरा समझ से ‘तपल करमजरू’ में ‘रश्मि रथी के मूल भाव के पूर्णतः निर्वाह कइल गइल बा। भोजपुरी के प्रकृति आ प्रवृति के अनुसार शब्दन के प्रयोग भइल बा। भाव साफ बा। शब्दन में उलझाव नइखे। पुस्तक के प्रारंभ मे ‘पितर गोहरात्रन’ के रूप में परम्परा से चल आवत मंगला चरण के भी पूर्ति भइल बा। ई घीव के लड्डू बड़ा गोल बन्हाइल बा। एही से सुघर आ सवदगर बा।
‘तपल करमजरू’ शीर्षको बडा ठीक बइठत बा। कर्ण के का कहल जा सकेला ? प्रवल पुरूषार्थ के बादो जात पांत के जांता में पिसाये के पड़त बा। रूढ़िवादिता आ नियति के हाथे अपमान झेले के पड़त बा। समाज के शीर्ष पर आसन, जमवले लोगन के षडयंत्र के शिकार होखे के पड़त बा। ई ‘तपल करमजरू’ नामे से हृदय के दर्द पीरा कुफुत सब उभर के एकबरगी मानस पटल पर छा जाता। सच कहल जाव त कर्ण के समूचा जीवन चरित ई एके पदबंध में बंधा गइल बा।
समाज में फैलल बैर विषमता, जात पांत, ऊँच नीच घृणा भेद, अन्याय अत्याचार, दबाव बलबस्ती, घात पक्षपात आ अन्धविश्वास अनरीत से आहत रचना कार के सहज सरल मन के कसक ‘अनायस’ ‘यत्रतत्र’ आ ‘यथावत’ जइसन रचनन के माध्यम से बराबर उजागर होत आइल बा। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के कालजयी कृति ‘रश्मि रथी’ के भोजपुरी अनुवाद ई ‘तपल करमजरू’ के मूल भाव भी एह से बिलग नइखे। एकर भोजपुरी अनुवाद करे के भी शायद ईहे कारण रहल होखे।
एह काव्यनुवाद में कहीं कहीं मौलिकता के भी दर्शन होत बा। कर्ण खातिर भगवान श्रीकृष्ण के कथन ‘पंचाली हंसके पान खिलायेगी’ के जगहा ‘हंसते पंचाली जूठल थाल हटइहे’ भारतीय संस्कृति के ज्यादा करीब बुझाता। मूलभाव से बिन भटकले एह तरह के प्रयोग रचनाकार के सोच के गहराई के दरसावत बा।
‘तपल करमजरू’ शब्द जाल से बिलग एक सच्चाई बा जवना के प्रासंगिकता आजुवो ओइसहीं बा। एही रूप में एकरा के निरखे परखे के चाहीं। आम जन के पक्षधर ‘तपल करमजरू’ के रचना कार के एह सफल प्रयास खातिर हम साधुवाद देत बानीं।
रामायण सिंह
महाराणा प्रताप नगर,आरा
अध्यक्ष,भोजपुरी साहित्य विकास मंच भोजपुर (आरा)
08/12/03
भूमिका के बहाने
हिन्दी में पौराणिक और ऐतिहासिक प्रख्यात पात्रों को लेकर शताधिक महाकाव्य और खंड काव्य लिखे गये। इन रचनाओं की प्रामाणिकताओं की रक्षा करते हुए कवियों ने पात्रों के जीवनवृत्त की प्रस्तुति में साहित्यिक रंग और ढंग डाला है, परन्तु कुछेक रचनाएँ ही कालजयी हो सकी हैं। आधुनिक हिन्दी साहित्य में ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के विशिष्ट पात्रों को लेकर समकालीन चेतना को कायम रखा गया है। ऐसा करते हुए कवियों ने प्राचीन कथाओं का पुनर्कथन न करके नवीकरण अवश्य कर दिया है। ऐसे ही पात्रों में महाभारत के एक यशस्वी पात्र महारथी कर्ण का उदाहरण अनेक कृतियों में नायक के रूप में चरितार्थ हुआ है। यह सर्वथा विदित है कि किन कारणों से माता कुन्ती ने नवजात कर्ण को मंजूषा में बंदकर को नदी में प्रवाहित कर दिया था और सुतपुत के रूप में पालित-पोषित होकर महावीर कर्ण अपने दिव्य व्यक्तित्व से छिपा नहीं रह सका। वह उपेक्षित, धिकृत, लांछित अवश्य रहा परंतु अपनी अजेय वीरता के कारण कौरव श्रेष्ठ दुर्योधन का मित्र बन गया। जन्मजात स्वर्ण निर्मित कवच कुंडल से सर्वथा सुरक्षित कर्ण ने किस तरह कृष्ण, अर्जुन जैसे अतुलनीय व्यक्तित्व को परेशान कर दिया था। सबकुछ होते हुए भी वह एक तरह से भाग्य का मारा ही रहा। उस ओजस्वितापूर्ण कर्ण का जीवन संघर्ष दुखान्त ही कहा जायेगा। वह छला गया माँ कुन्ती से, गुरू द्रोण और कृपाचार्य से, पितामह भीष्म से, भगवान कृष्ण से, इन्द्र से और स्वयं अपने भाग्य से। निश्चय ही कर्ण जैसाविलक्ष्ण वीर, उदार, दानी और बलिदानी अन्य दूसरा पात्र महाभारत में नही है। वह मित्रों का मित्र और दुश्मनों का दुश्मन है। न उसे कंचन का लोभ है न कामिनी का। कर्ण जैसे उदात्त और प्रेरक पात्र को लेकर महाकवि केदारनाथ मिश्र प्रभात ने ‘कर्ण’ शीर्षक से एक लघु प्रबंध काव्य लिखा और तदन्तर सर्वाधिक ओजस्वी कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने कर्ण को रश्मिरथी कहकर खंड-काव्य की रचना की। दिनकर की ‘हिमालय’ कविता से जो ओज और पौरूष की वाणी निःसृत हुई वह ‘हुंकार’ करती हुई ‘कुरूक्षेत्र’ तक पहुँच गयी, परंतु दिनकर की ऐसी कृतियों के आत्मीय पाठक जानते हैं कि ओज और प्रेरणा की दृष्टि से ‘रश्मिरथी ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ से भी अधिक सशक्त, तल्ख, प्रखर, आक्रामक और विस्फोटक काव्य है। इसकी सर्वाधिक लोकप्रियता असंदिग्ध है। इस शताब्दी और बीती शताब्दी राजनीतिक और सामाजिक चेतना ने सामन्तवाद, पूंजीवाद, अधिनायकवाद और पारम्परिक आर्यता से गर्वित मूल्यों के विरोध में जो उपेक्षितों, शोषितों, पिछड़ों और दलितों में विद्रोह हुआ, उसका नायकत्व दिनकर ने कर्ण को दिया।
राष्ट्रकवि दिनकर के खंड काव्य ‘रश्मिरथी’ को उप जिव्य बनाकर कवि डॉ० के०डी० सिंह ने पुनः एक बार भोजपुरी भाषा में वैसे ही कर्ण को नेतृत्व दिया है। कवि प्रभात के कर्ण ‘और राष्ट्रकवि दिनकर के ‘रश्मिरथी के लिए इन्होंने काव्य का नामकरण ‘तपल करमजरु’ रखा है। यह तपल करमजरु रवि तनय कर्ण ही है। सामान्यतः उदात्त कथानक और उदात्त पात्र के लिए उदात्त नाम करण कियाजाता है जो गुणवाचक हुआ करता है। हिन्दी के प्रख्यात समीक्षक डॉ० नगेन्द्र ने प्रसाद कृत ‘कामायनी’ के नाम के संबंध में ऐसा ही विचार प्रकट किया है। परंतु आलोच्य कृति का पात्र जितना प्रख्यात है शीर्षक उतना ही सामान्य है। ऐसा लगता है कि कवि ने कर्ण के व्यक्तित्व के उज्ज्वल पक्ष को वर्णित अवश्य किया है किन्तु समय-समय पर अकारण उसकी पराजय से द्रवित होकर। फलस्वरूप इस शीर्षक में कवि की नायक के प्रति करूणा छलक पड़ी है और इसीलिए कर्ण के जीवन में दयनीयता बोधित हुआ है।
निर्विवादतः यह काव्य दिनकर कृत ‘रश्मिरथी की कथा की प्रतिकृति है परंतु हू-ब-हू अनुवाद नहीं। कवि ने कथानक की रेखायें दिनकर की कृति से अवश्य ली हैं किन्तु यत्र-तत्र, सर्वत्र भोजपुरी का भाषिक रंग अपना दिया है। अतः यह न तो ‘रश्मिरथी’ का प्रत्यख्यान है और न शाब्दिक अनुवाद अपितु इसमें पुनसृजन की विशिष्टता निहित है। यूनान के दार्शनिक प्लेटो ने कहा था कि कला प्रकृति की हू-ब-हू अनुकृति है, किन्तु उनके शिष्य अरस्तू ने विरोध करते हुए कहा है कि कला प्रकृति की अनुकृति नहीं वरन पुनसृष्टि है। यही बात इस पुस्तक के संबंध में कही जा सकती है। डॉ० सिंह ने पात्रोचित भाषा का प्रयोग किया है और यह पढ़कर ही जाना जा सकता है कि भोजपुरी सिर्फ श्रृंगारिक गीतों की भाषा नहीं बल्कि ललकार, और हुंकार, की भाषा है। दिनकर ने जिस तरह ‘रश्मिरथी’ में प्रसंगानुसार भाषा का प्रयोग किया है, यह सर्गव कहा जा सकता है कि इस कृति के कवि ने भी दिनकर के उस गुणको अक्षुण्ण रखा है।
भाषा से भिन्न बोलियों में भी कृतिया रचित होकर कालजयी हो जाती है। वाल्मिकी कृत ‘रामयण’ को वह लोकप्रियता नहीं मिली जो अवधी बोली में तुलसी रचित ‘रामचरितमानस’ को मिली। इसे हम हिन्दी की कृति कहते हैं। मैथिल कोकिल विद्यापति को हम हिन्दी की कवि कहते हैं, सधुक्कड़ी बोली में वाणी व्यक्त करने वाले कबीर को हम अपना कहते हैं, ब्रज बोली के सूरदास को हिन्दी का कवि कहते हैं, राजस्थानी कवयित्री मीरा को हम हिन्दी की कवयित्री कहते हैं। पर खेद है कि भोजपुरी के शीर्षस्थ नाटककार और कवि भिखारी ठाकुर को हम हिन्दी का रचनाकार क्यों नहीं मानते हैं। भोजपुरी से कमतर विकसित देश की अन्य कई बोलियाँ संविधान की भाषागत आठवीं अनुसूचि में स्वीकृत हो गयी हैं लेकिन बहुत दुख के साथ कहना पड़ता है कि अभी तक भोजपुरी को यह स्थान नहीं मिला हैं। कवि डॉ०के०डी० सिंह के काव्य का यह महानयक जिस तरह से भाग्य का मारा है तो क्या भोजपुरी भी।
आरा
17 मार्च 04
तथास्तु
(डॉ० दीनानाथ सिंह)
पूर्व अध्यक्ष एवं आचार्य
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय
भोजपुर (आरा) बिहार
त्याग और तपस्या का सजीव चित्र ‘तपल करमजरु’
बिहार राज्य के भोजपुर जनपद के भाषा एवं साहित्य से जुड़े आधुनिक चेतना के भाव एवं विचार से सुसज्जित यर्थाथवादी एवं जनवादी कवि के रुप में आज डा. ‘के. डी. सिंह जी लोक चर्चित हैं। आपकी तीन प्रमुख रचनाओं यथा ‘यत्र-तत्र’ ‘अनायास’ ‘यथावत’ के आद्योपान्त अध्ययन करने के तदोपरान्त ‘तपल करमजरु’ नामक खण्ड काव्य जो कि महाभारत के युद्धभूमि एवं जीवन की तपोभूमि में संघर्षशील व्यक्तित्व की जीवनगाथा, भोजपुरी भाषा में रचित मेरे द्वारा पढ़ी गयी प्रमुख रचना है।
‘तपल करमजरु’ सात सोपानों में सुसज्जित रचना है। यह विचारों के उतार-चढ़ाव एवं भान् की विविधता तथा नवीन दृष्टियों की खोज को बनाकर चलने वाली रचना है। इसमें कवि ने अपने ऐतिहासिक ज्ञान, भारतीय पौराणिक कथाओं के मोह को साथ-साथ उपस्थित किया है। इस पुस्तक के प्रथम सोपान बाल सोपान में सामाजिक रीति-रिवाजों की विषमता आदि को कवि ने ध्यान में रखकर व्यग्यात्मक प्रतिक्रिया को दर्शाया है यथा-
“वीर करेला गरब साहस पर, जाति गोत्र से मत पहचनिह”
यहाँ जातिवाद को कोत्सना की प्रवृति कवि ने उपस्थित किया है। इस पुस्तक के दूसरे सोपान ‘गुरुकुल सोपान में आत्म चेतना, बल और शक्ति की मर्यादा, पवित्रता, परम्परा आदि पर कवि ने व्यापक रुप से काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुत्तकिया है।
गुरुचरण के धूली ले के आपन हिरदा के भक्ति देलन”।
कवि के द्वारा दर्शाया गया तीसरे सोपान ‘कृष्ण-कर्ण’ में सामाजिक एवं व्यवहारिक यर्थाथवादी विचारों के संधर्ष से आज के युवकों में ज्ञान दीप और आत्म चेतना को समझाने का प्रयास किया गया है। यह दिनकर की ‘रश्मिरथी’ की कड़ी सी जान पड़ रही है :-
“खाली नइख कुरुपति के ही परमशक्ति संउसे मानवता के चमकत एक शक्ति”।
इस कृति के चौथे सोपान में ‘इन्द्र और कर्ण’ में दान की तुलनात्मक महत्ता को कवि ने दर्शाया है-
“दान के बल पर जीवन दौड़त चली, तेल जतने देरा तक रही ज्याति देर तक जली”।
इस मूल एक सौ अस्सी पृष्ठों की पाँचवी सोपान की कृति में बेटे के स्वाभाविक हक की न्यायिक मांग द्वारा कुन्ती के हृदय में कवि ने हलचल पैदा कर कर्ण के चरित-प्रधान कथात्मक विषय वस्तु से कवि ने पैदा की है-
“भौचक डूबल चिन्ता में कोठी में व्याकुल कुन्ती मन सोचे लगले”
कर्ण के अलावा अन्य के युद्ध कला-कौशल को दर्शाने के लिए कवि ने ‘समर सोपान’ जैसी छठे अध्याय में विशेष प्रतिमा के साथ प्रस्तुत किया है-
“पानी फेरत कौरव सेना के बल पर
भीष्म पितामह आज गिरलन धरती पर”।
कवि ने मानवीय संवेदनाओं की प्रतिक्रियात्मक रुप काँ मनोवैज्ञानिक रुप बड़े सूक्ष्म स्तर पर अन्तिम अवसान सोपान में विचार किया है। यह इस पुस्तक का सातवाँ सोपान है-
“पंचभूत के नइखे फिकिर तनिको, सगरो सोजहग राह बनल बा। जे डर भय छोड़ गगन में घूमिहें, ऊहे कीर्ति के झूला झूलिहें।”
इस तरह भोजपुरी भाषा के शब्द और वाक्य से सजी हुई रचना ‘तपल करमजरु” कर्ण के जीवन के रुपों को दर्शानेवाली काफी सक्षम एवं योग्य है। यह रचना काफी इतिहास के व्यवहारिक रुप की स्वाभाविकता पर आधारित धरातल से जुड़ी उपयोगी भी है। अन्ततः कवि के जीवन में सफलता की हार्दिक कामना करता हूँ। बस इतना ही। धन्यवाद।
आपका
डा. ओमप्रकाश सिन्हा
हर प्रसाद दास जैन स्कूल, आरा
15 मार्च 04
सहमति
डॉ०के०डी० सिंह जी के लिखल ‘तपल करमजरु’ के पांडुलिपि से गुजरे के मौका मिलल। ई रामधारी सिंह दिनकर के ‘रश्मिरथी’ के भोजपुरी में पहिला भावानुवाद बाटे। हमरा विचार से डॉ० सिंह बड़ा सटीक शीर्षक रखले बानी आ एह शीर्षक से बढ़िके शीर्षक अउर कवनो ना हो सकेला। भोजपुरिया सुगंध से सुवासित शीर्षक अइसन सटीक बा कि कर्ण के महानता आ हतभागिता दूनों के परगट कर देत बा। अइसन नीमन शीर्षक चुनि के डाक्टर साहब ढेर धन्यवाद आ बधाई के पात्र बानी।
सांचो के कर्ण घूर में लपटाइल हीरा बा, गुदड़ी में छिपल लाल बा, जेकरा के भाग्य हमेशा दगा देलस, समाज हमेशा उपेक्षित समझलस आ गुरु से भी वरदान ना, शापे मिलल।
‘रश्मिरथी’ के भाव भोजपुरी में अनुवाद कइके डॉ० सिंह एह पंक्ति क पहिला व्यक्ति बनि गइल बानी।
सबसे बड़ बात ई बा कि एह अनुवाद में ‘रश्मिरथी’ के समुचा भाव जीवंत हो उठल बा, कहीं कमी नइखे खटकत। दुनिया के गढे वाला गढलख वाकी केह से केहु के रूप पूरा के पूरा ना मिलल। रचना के इहे धरम ह। कारीगर जब भी एक ही चीज के मूर्ति गढी तबो हर में कुछ ना कुछ नयापन रहेला। ‘तपल् करमजरु’ भी ओइसने बा।
डाक्टर साहेब सगरे ध्यान रखले बानी कि कर्ण के तपल व्यक्तित्व कह मद्धिम मत होखे आ एह दिशा में इहां का सोजहग सफल बानी।
डॉ० के०डी० सिंह जी अखिल भारतीय भाषा-साहित्य सम्मेलन के राष्ट्री स्तर पर स्थायी सदस्य बानी। एह सफल, सार्थक आ सराहनीय प्रयास खातिर ह सम्मेलन के ओर से इहाँ के कोटिशः बधाई देत बानी आ भगवान से प्रार्थना कर बानी कि आगे भी अपना कृतियन से भोजपुरी के भंडार भरत रहीं।
जय भोजपुरी, जय भोजपुर,
जय भारत।
प्रो०डॉ० शम्भू नाथ सिंह
(सचिव, अ० भा० भा०सा०सम्मेलन, भोजपुर महाराणा प्रताप नगर, आरा
2 मई 04
हमार बात
जेकर-जेकर स्नेह आ आशीर्वाद प्राप्त वा आ आभार से जताइल बानी।
जवना के प्रकट करे खातिर शब्दो छोट पड़त बा।
प्रेरक आ जोगाड़ भरे वाला
1. वासुदेव पांडे, अवकाश प्राप्त, संस्कृत शिक्षक यादव विद्यापीठ आरा आ पड़ोसी
उत्साह बढावे वाला
रघुवर तिवारी, आध्यात्म विश्लेषक, अनुरागी आ अनन्य सहयोगी
भाषागत गल्ती सुधारे वाला
1. रामायण सिंह, अध्यक्ष भोजपुरी साहित्य विकास मंच, आरा
2. डा० दिवाकर पाण्डेय, व्याख्याता, जैन महाविद्यालय, आरा
गहन विवेचन करे वाला
डा० परशुराम सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष ‘हिन्दी’ महाराजा कॉलेज, आरा
डा० दीनानाथ सिंह, पूर्व अध्यक्ष एवं आचार्य स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा
सहमति प्रदान करे वाला
डॉ० ओम प्रकाश सिन्हा, पूर्व व्याख्याता, जय प्रकाश कॉलेज, आरा
डा० शम्भूनाथ सिंह, सचिव, अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन, आरा
मंच प्रदान करे वाला
भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, भोजपुर, आरा
भोजपुरी साहित्य विकास मंच, आरा
जनहित साहित्य मंडल, आरा
जैन कॉलेज, आरा
डाक विभाग, आरा
बाल हिन्दी पुस्तकालय, आरा
आगे के राह बतावे वाला
डा० रण विजय सिंह वरीय व्याख्याता
हीरा प्रसाद ठाकुर, प्रख्यात रचनाकार
रामदास राही जी सर्वमान्य संयोजक
जीतेन्द्र कुमार जी समालोचक
हम ओह व्यक्ति आ संस्था सब के जेकरा सहयोग से कोढ़िया के, फूलेके मौका मिलल नमन करत बानी। जे भी प्रतिभा से सम्पन्न होखे बाकी उपेक्षित भी होखे उ अपना के कर्ण के संबल मान के, आदर्श मान के आगे पाँव धरत रहो। इहे कह के पाठकगण के समर्पण कर रहल बानी। मझधार में, चकोह में अगर ई रचना पड़ल बुझात होखे त आग्रह बा ठेल ठाल के किनारे घाट पर लगा देव जा।
स्नेह पावे खातिर अधीर, राउर
आरा
4-5-04
डा० के०डी०सिंह, रचनाकार

