सोरा रोग बीज (होमियोपैथी)
घुसल देहिया में रोगवा के बीज कहसे,
रखले प्रभु रखले रहन निर्मल, भइल तीत कंइसे।
नियम करे लगल भंग, होखे लगल तुहु तंग,
लागल मन में पहिले जंग,
देह बाद में अपंग।
चाह रहल तू आजाद, छीन के दोसरा के आजादी,
मन में आयी जब भाव, रोक ना पइब वरबादी।
खुजली पहिले मन में समायी, पाछे तन पर भरजाई,
सुखवा जइहन छीनायी,
मन तन दोनों खजुलाई।
डाह चितवा से छोड़, स्नेह के धागवा से जोड़,
सत चिन्तन मनन कर, असत से नाता तुहु तोड़।
सोरा खाज से चिन्हाला, खुजली देह पर बुझाला, कलुषित मनवा के सेज, सुतल सोरा कबहुँ ना भूलाला।
मनवा रहे ककुलात, तनवा रहे ककुलात,
भागे लागी ककुलहट, जब पड़ी सल्फर के जहर;
सोरा जइहें जब भाग, रोग के रहि ना असर, नाहीं त रोगवा जइहें सगरो लतर अस पसर।
गड़बड़ चिन्तन, गड़बड़ काम, गड़बड़ काम के गड़बड़ अन्जाम।
गर्मी-सूजाक दई साथिन के नाम तरह-तरह के लगीहे रोग, देव-पीतर हो जइहें वाम।
छोड़ अबहुँ गड़बड़ काम, नाहीं त कुछ ना करीहें जै श्रीराम, चिन्तन-मनन के ठीके राख, साथ छवले रहीहें सीताराम।


