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एक राह ईहो बा

एक राह इहो बा

सोना के कटोरी ना देखलीं, ना देखब, फिर इ लोरी मत गावऽ,

गावऽ आरे आवड, पारे आवऽ, झोपड़ी किनारे आवऽ, चोकर के
चाँद भरल, कटोरी जस्ता लेते आवऽ।

होत गदवेर, धेनु लौटहीं के बेर, वस तड़ातड़ी लेत आवऽ,
देरी पर भूलाई रोटी, पुअरा में खोज ना पाइब,
ढ़ीबरी के तेलवा सपनवा भइले हमरो,
पेनीछेद तेल टीन दिल्लीये से चलल, बोल काहाँ जाइब।

नाहक होखस, शरमाइल भी होखस या शंकर सुतनंदन होखला,
सबके सब इ तेलू पीओलन, इनके लाल दूध-भात लिलेलन;
सोना के कटोरी हउवे, उनका घर के लोरी,
सौरीधर के ना, लेबर रूम के उनकर, एही से सोना के चम्मच, जमते दाँत धरेलन।

आंगन में छीपा हम बजायीं, कोठी बंगला उ बजवावे शहनाई,
माड़-भात हम खायीं, ओछवानी के हलवा उहो गटकाई,
हम चमईन से नार कटायी, उनकर मेम से काटल जाई,
हमरा के हल्दी गुड़ पीआवल जाला, उनका फेराडॉल भेंटायी।

सीज के कॉटा दुअरा हमर टंगायी, टेअ-भेक त उनका दिहल जाला; ना यम छुए हमरो अतना पर, उनका के शीशा के घर राखल जाला।

मेहनत मजदूरी अंतिम क्षण तक हम करिला,
एही राह हम चलत रहीं ला।

अब हर बाधा के दूर हटाके, देश के आगे तक ले जाई।

उनका के भारी काम से अलग रखल जाला,
चिना मजदूरी मिले ना दाना हमरो, ना मालूम उनका घर कवन कल्पवृक्ष फरेला।
मत जनीह मात्र कल्पना ह स्वर्णम सुख के लोरी,
मेहनत, मजदूरी आ चोरी के भेद बतावे ई लोरी।

आँचल के झोली में झूलाई लाल के, मारी ठोकर,
सोना के पलना के,
सुधरल रूप यदि चाहीं समाज के, राष्ट् के,
ई लोरी सीखाई ललना के।

रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह यथावत से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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