जनता के जज्बात
चार बजे भोर में,
निकल गया हवा खोरी को,
सेहत बनाने को ।
पहुँच गया पोरबन्दर,
खोजा बापू के तीन बन्दरों को,
नहीं मिले बापू तक
एक नेता मिले,
अलशेसियन कुत्ता,
उनके आगे,
सिकड़ थामे वे पीछे ।
मैंने पूछा,
आप तो डाक्टर थे,
नेता बन गये हैं,
नेता का चेहरा बदलने का,
नुस्खा जानते होंगे।
बोलने लगे,
मानव मनोविज्ञान के सहारे,
समझने लगा हूँ,
कुत्ते का मनोविज्ञान ।
उत्सुकता बढ़ी,
पूछा, तो क्या,
अब आपको,
मानव भी कुत्ता लगने लगे।
फिर पुछा,
क्या मनु का,
मत्सय से मानव तक का
सिद्धांत धोख लिए है ।
बोले, मनु को छोड़ दिया हूँ,
कुटिया और लंगोटी छोड़ दिया हूँ, पतलून और कमीज पहन लिया हूँ, डारविन का विकासवादी हूँ ।
पुछा, तो क्या आप,
सिद्धांतों के संघर्ष से डरते भी हैं,
बोले, किसी से नहीं डरता
केवल इटालियन छोड़कर
चाहे घर की बहु भी हो तौभी ।
अब मैंने धन्यवाद दे,
पिंड छुड़ाया, बोला,
आप तगड़े हैं, पर डरपोक
व्यक्ति से स्वभाव पर आ जाते हैं, और सेहत बनावें,
कुत्ता का सिंकड़ थामना छोड़िये, जनता की जज्बात थामिये।


