
RKTV NEWS/नालंदा (बिहार)27 मई।विश्व पर्यावरण दिवस के प्री-कैम्पेन के अंतर्गत नव नालंदा महाविहार के शैक्षिक परिसर में आयोजित एक विचारोत्तेजक व्याख्यान ने खाद्य संस्कृति, मनुष्य की जीवन-शैली और पर्यावरण के बीच के गहरे संबंधों पर गंभीर चिंतन का अवसर उपस्थित किया। इस अवसर पर प्रख्यात लेखक एवं प्रोफेसर, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग तथा डीन, पालि एवं अन्य भाषा संकाय, प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” ने अपने विशिष्ट और ललित चिंतन से उपस्थित जनों को संबोधित किया। व्याख्यान का विषय था— “आधुनिक युग में परिवर्तित होती खाद्य संस्कृति एवं उसके पर्यावरणीय निहितार्थ”।
अपने विस्तृत वक्तव्य में प्रो. श्रीवास्तव ने कहा कि भोजन मनुष्य के जीवन का केवल जैविक आधार नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक स्मृति और सामूहिक चेतना का संवाहक भी है। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि आधुनिक उपभोगवादी समय में भोजन अपनी आत्मीयता खोकर मात्र एक वस्तु में परिवर्तित होता जा रहा है। स्वाद की तात्कालिकता ने उस दीर्घ संवेदना को विस्थापित कर दिया है, जो कभी रसोई की आग में धीरे-धीरे पकती थी और परिवार के साझा अनुभव में रूपांतरित होती थी।
उन्होंने खाद्य संस्कृति को स्मृति, परंपरा और पर्यावरण के त्रिकोण में स्थापित करते हुए कहा कि अतीत की रसोई केवल भोजन बनाने का स्थान नहीं थी, बल्कि वह एक जीवित सांस्कृतिक केंद्र थी, जहाँ ऋतु का लय, मिट्टी की गंध और श्रम की गरिमा एक साथ उपस्थित रहते थे। आज वही भोजन बाजार की चकाचौंध में अपनी मूल प्रकृति से कटता जा रहा है। पैकेजिंग, प्रसंस्करण और कृत्रिमता ने उसे सुविधाजनक अवश्य बनाया है, परंतु इस सुविधा के पीछे पर्यावरण पर पड़ने वाला अदृश्य दबाव निरंतर बढ़ रहा है।
प्रो. परिचय दास ने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ यह रेखांकित किया कि जल, भूमि और वायु—ये तीनों तत्व इस परिवर्तन के मौन साक्षी हैं। उन्होंने कहा कि जब हम दूर-दराज़ से आए पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का उपभोग करते हैं, तब हम अनजाने में ही प्रकृति के संतुलन पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं। इस प्रकार, भोजन की हमारी छोटी-सी पसंद भी एक व्यापक पर्यावरणीय परिणाम उत्पन्न करती है।
समाधान की दिशा में उन्होंने पारंपरिक खाद्य प्रणालियों की ओर लौटने का आह्वान करते हुए कहा कि मोटे अनाज, स्थानीय उत्पाद और मौसमी आहार केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने इसे “संतुलित जीवन-शैली” का आधार बताते हुए कहा कि आधुनिकता को नकारना नहीं, बल्कि उसे परंपरा के साथ संवाद में लाना ही आज की आवश्यकता है।
उनके वक्तव्य में आलोचना की तीक्ष्णता के साथ-साथ समाधान की एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टि भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई। इस क्रम में उन्होंने कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह को इस प्रकार के अभियानों की आधारशिला बनने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
कार्यक्रम की प्रस्तावना डॉ. प्रियंका कुमारी, नोडल ऑफिसर (विश्व पर्यावरण दिवस प्री कैम्पेन) द्वारा प्रस्तुत की गई, जिन्होंने विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए इसे समकालीन समय की अनिवार्य बहस बताया। इस अवसर पर तापस सरकार एवं शिवांगी जायसवाल की काव्य प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को एक सृजनात्मक आयाम प्रदान किया, जिससे विचार और संवेदना का सुंदर समन्वय स्थापित हुआ। अंत में डॉ. दिव्य ज्योति कुंडू द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी, शिक्षक एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। यह आयोजन अपने गंभीर विमर्श और व्यापक सहभागिता के कारण एक सार्थक शैक्षणिक संवाद के रूप में उभरा, जिसने उपस्थित जनों को भोजन, संस्कृति और पर्यावरण के अंतर्संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया।
