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झारखंड की कोयला खदानों ने की लंबे समय से खोई हुई दुनिया को फिर से खोजने में मदद।

अशोक कोयला खदान खंड से प्राप्त पादप जीवाश्म (लगभग 290 मिलियन वर्ष पुराने): क) ग्लॉसॉप्टेरिस सीयरसोलेन्सिस, बीएसआईपी- 48382, ख) जी. गिरिडीहेन्सिस, बीएसआईपी- 48383, ग) जी. सबटिलिस, बीएसआईपी- 48384, घ) जी. स्टेनोन्यूरा, बीएसआईपी- 48385, ङ) अज्ञात अंडाणुयुक्त फल संरचना, बीएसआईपी- 48390, च) अज्ञात फल संरचना का पुनर्निर्माण, छ) ग्लॉसॉप्टेरिस नौटियाली, बीएसआईपी- 48394, ज) जी. ज़ीलेरी, बीएसआईपी- 48395।

RKTV NEWS/नई दिल्ली 20 फरवरी।झारखंड की खुली कोयला खदानों से एक लुप्त इकोसिस्‍टम के प्रमाण मिले हैं जो मनुष्यों या डायनासोरों के अस्तित्व से भी बहुत पहले विद्यमान था। खदानों में दबे साक्ष्यों से घने दलदली जंगलों और नदियों के जाल का पता लगाने में मदद मिली है जो लगभग 30 करोड़ वर्ष पहले दक्षिणी महाद्वीप गोंडवानालैंड के हिस्से के रूप में भारत में व्याप्त थे।
यह अध्ययन गोंडवाना के उस वातावरण का पुनर्निर्माण करता है जो कभी-कभार समुद्र के स्पर्श से प्रभावित होता था और जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के स्तर में वृद्धि महाद्वीपीय वातावरण को कैसे नया रूप दे सकती है, इस बारे में जानकारी प्रदान कर सकता है।
पूर्व के अध्ययनों में अनेक सिद्धांत प्रस्‍तुत किए गए थे, जिनमें भारत भर के विभिन्न चट्टानी क्षेत्रों और कोयला क्षेत्रों से एकत्रित जीव-जंतुओं और तलछटों में पाए गए साक्ष्यों के आधार पर समुद्री जल के अतिक्रमण के मार्गों को समझाने का प्रयास किया गया था। हालांकि, यह अध्ययन क्षेत्र अभी भी अत्‍यंत विवादास्पद बना हुआ है, क्योंकि प्रागैतिहासिक समुद्री बाढ़ या पर्मियन काल में समुद्र के अतिक्रमण की घटनाएं छिटपुट हैं और केवल कुछ ही स्थानों पर इनका प्रलेखन किया गया है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एक स्वायत्त संस्थान, बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के नेतृत्व में किए गए एक नए बहुविषयक अध्ययन में झारखंड के उत्तरी करणपुरा बेसिन में स्थित अशोक कोयला खदान से पुरावनस्पति विज्ञान और भू-रासायनिक साक्ष्य एकत्र किए गए हैं। इस अध्ययन में प्राचीन पौधों के असाधारण जीवाश्म रिकॉर्ड और सूक्ष्म रासायनिक संकेतों का पता चला है, जो मिलकर उस समय के इस लुप्त हो चुके इकोसिस्‍टम का एक जीवंत चित्र प्रस्तुत करते हैं, जब भारत, अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया मिलकर गोंडवानालैंड का हिस्सा थे।
गोंडवाना पर्यावरण और उससे जुड़ी पुरावनस्पति के पुनर्निर्माण से ग्लॉसॉप्टेरिस की प्रचुरता का पता चला, जो बीज वाले पौधों का एक विलुप्त समूह है जिनका कभी दक्षिणी महाद्वीपों पर प्रभुत्‍व था।
ग्लॉसॉप्टेरिस और उसकी निकटस्‍थ प्रजातियों की कम से कम 14 अलग-अलग प्रजातियों के जीवाश्म कोयला खदान में शेल की परतों में नाजुक पत्ती के निशान, जड़ों, बीजाणुओं और पराग कणों के रूप में संरक्षित पाए गए।
दामोदर बेसिन में ग्लॉसॉप्टेरिस के पहले किशोर नर शंकु की खोज एक वैश्विक महत्व की खोज है। यह वनस्पति विज्ञान का एक ऐसा ‘अधूरा हिस्सा’ है जो वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद कर सकता है कि ये प्राचीन वृक्ष कैसे उत्‍पन्‍न हुए।

कोयले के नमूनों के विभिन्न पेट्रोग्राफिक घटकों के फोटोमाइक्रोग्राफ – ab) कोलोटलिनाइट; c) कॉर्पोजेलिनाइट (तीर); d) तेल धब्बा (तीर); efg) स्पोरिनाइट; h) एक्ससुडाटिनाइट (d का प्रतिदीप्ति दृश्य); i) सेमीफ्यूसिनाइट (तीर); j) फ्यूसिनाइट; k) इनर्टोडेट्रिनाइट (तीर; g का सामान्य दृश्य); lm) फंगिनाइट; np) पाइराइट – क्रमशः विशाल, फ्रैम्बोइडल और कोशिका-भरने वाले रूप में। फोटोमाइक्रोग्राफ ad और ip आपतित सफेद प्रकाश के अंतर्गत लिए गए थे; फोटोमाइक्रोग्राफ gh नीले प्रकाश उत्तेजना (प्रतिदीप्ति) मोड के अंतर्गत लिया गया था।

सूक्ष्मदर्शी से कोयले और शेल के कणों की जांच करने पर, उनमें फ्रैम्बोइडल पाइराइट (छोटे रास्पबेरी के आकार के खनिज समूह) और कोयले और शेल में सल्फर का असामान्य रूप से उच्च स्तर पाया गया। इससे खारे पानी की स्थिति का संकेत मिलता है, जो इस बेसिन में कोयले के भंडारों के लिए असामान्य है और इस प्रकार समुद्री घुसपैठ और उसके मार्ग का प्रमाण मिलता है।
कार्बनिक अणुओं के रासायनिक विश्लेषण (गैस क्रोमेटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री का उपयोग करते हुए) से पता चलता है कि लगभग 280-290 मिलियन वर्ष पहले दामोदर बेसिन में समुद्री जीवों का प्रवेश संभव था और यह पूर्वोत्तर भारत से मध्य भारत की ओर बढ़ते हुए पर्मियन सागर के मार्ग को दर्शाता है।
इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कोल जियोलॉजी में प्रकाशित निष्कर्षों ने उत्तरी करणपुरा कोयला क्षेत्र में अशोका कोयला खदान में समुद्री संकेतों के साथ-साथ कोयला युक्त अनुक्रम के सेडिमेंटेशन इतिहास में बहुमूल्य अंतर्दृष्टि प्रदान की।
अतीत में समुद्री अतिक्रमणों और ध्रुवीय बर्फ पिघलने से जुड़े वर्तमान समुद्र स्तर में वृद्धि के बीच समानताएं बताते हुए, यह अध्ययन चल रहे वैश्विक तापक्रम परिवर्तन के तहत महाद्वीपीय भूदृश्यों पर समुद्री वातावरण के संभावित भविष्य के अतिक्रमण के निहितार्थों पर प्रकाश डाल सकता है।

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