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चित्रकूट विश्वविद्यालय में सम्मानित हुए डा अनिल सुलभ।

हिन्दी के विद्यार्थियों को बताया ज्ञान और सेवा का महत्त्व।

चित्रकूट/मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद) 18 फ़रवरी । बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ का बुधवार को चित्रकूट स्थित, जगदगुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय द्वारा सम्मान किया गया। विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित एक समारोह में विभाग के अध्यक्ष डा शांति कुमार दूबे ने डा सुलभ का सम्मान करते हुए, उन्हें सर्वाधिक सक्रिय हिन्दी-सेवी विद्वान बताया।
डा सुलभ ने विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा आयोजित एक प्रशिक्षण-शिविर को भी मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित किया तथा युवाओं को उनकी ज्ञान-शक्ति और ऊर्जा-शक्ति से भी अवगत कराया। उन्होंने संस्कृत के एक नीति-श्लोक को उद्धृत करते हुए कहा कि यह माना जाता है कि यौवन, धन-संपत्ति, प्रभुता और अविवेक में से प्रत्येक अनर्थ कारी है और यदि चारों एक ही स्थान पर एकत्र हो जाएं तो क्या परिणाम होगा! लेकिन इन चारों में प्रथम तीन में से कोई अनर्थकारी नहीं है। बल्कि तीनों महान शक्तियाँ हैं, जिनसे बड़े-बड़े कार्य संपन्न किए जा सकते हैं। किए जाते रहें हैं और किए जाते रहेंगे। अनर्थकारी केवल चौथा, अर्थात अविवेक है । यह यदि उन तीनों में से किसी भी एक से मिलता है तो उसे घोर अनर्थकारी बना देता है । सदविद्या मनुष्य को ज्ञानी, विनम्र और विवेकवान बनाती है, जो मनुष्यता के लिए परम आवश्यक है। सेवा की भावना, मनुष्य को कल्याणकारी और यशस्वी बनाती है। युवा जब ज्ञान और सेवा का व्रत लेंगे तभी भारत स्वस्थ, सबल और उन्नत होगा।
विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो जंग बहादुर पाण्डेय ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि युवा में वायु का वेग होता है। युवा-शक्ति को दिशा मिल जाए तो कुछ भी असंभव नहीं रहता। युवाओं को अपनी शक्ति और उसके सदुपयोग की विधि जाननी चाहिए।
अतिथियों का स्वागत और संचालन विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना के समन्वयक डा शांति कुमार दूबे ने तथा धन्यवाद ज्ञापन संस्कृत विभाग की अध्यक्ष प्रो प्रमिला मिश्र ने किया। इस अवसर पर सुख्यात कवि डा संतोष कुमार मिश्र तथा प्रधानाध्यापिका अर्चना समेत बड़ी संख्या में हिन्दी के विद्यार्थी और सेवा योजना के कार्यकर्त्ता उपस्थित थे।

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