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भोजपुर:ग्रामीण क्षेत्र में गोड़ का नाच आज भी लोकप्रिय : गायक अविनाश पांडेय

आरा/भोजपुर 20 जून।भोजपुरी संस्कृति में शुभ अवसरों पर मनोरंजन के लिए अनेक विधाएं प्रचलित है जिसमें गोड़ का नाच आज भी लोग शौक से देखते हैं।यह विधा भोजपुरी भाषा भाषी क्षेत्र के गांव गंवई लोगों के बीच ज्यादा प्रसिद्ध है। गोड नाच संस्कृति पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा ने लोकगायक अविनाश पांडे से बातचीत कर जानने की कोशिश की जिसके कुछ अंश जनहित प्रकाशित है। इन्होंने बताया की सनातन संस्कृति में शादी ब्याह के अवसर पर मनोरंजन के रूप में गोड़ नाच का आयोजन होता है।भोजपुर में गोड़ निचले समुदाय के लोगों की एक जाति है।जिनके माध्यम से गोंड लोकगीत व नाच शैली जीवित है।गोड़ जाति काफी दबी जातियों में से हैं।इनकी शैली तरह तरह के अपशब्द गीत में या फिर प्रहसन के लिए कलात्मक रूप से प्रस्तुति देते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो एक बेहतरीन धारदार मनोरंजन का हिस्सा गोड़ नाच शैली में देखने को मिलता है। गोड़ नाच पर वर्षों से काम कर रहे गायक कलाकार अविनाश पांडे ने बताया कि आज भी कई जिलों में जिसमें बक्सर शाहपुर नैनीजोर बलिया भोजपुर आदि क्षेत्रों में गोड़ नाच की पार्टियां सक्रिय और मनोरंजन के लिए शादी विवाह के शुभ अवसरों पर जाते हैं।हालाकी इसका प्रचलन पहले से कम हुआ है या विलुप्त के कगार पर है। श्री पांडे ने बताया कि यह नाच मंत्र मनोरंजन अथवा प्रवचन प्रदर्शन के दृष्टिकोण से किया जाता है इसमें लगभग दस बारह सदस्यों की एक टीम होती है जिसमें एक हुडका वादक ,चार झाल वादक दो जोकर,व झरनाठ धारी व गायक राहते है। उनके नाच में ना कोई महिला रहती है ना देखती है। गीत और नाटक में अपशब्दों का प्रयोग और झरनाठ से मारने की प्रक्रिया होती है लेकिन शुद्ध रूप से मनोरंजन रहता है। इनके लिए ना मंच, ना माइक ना सजावट बल्कि खेत खलिहान और कहीं भी प्रहसन शुरू हो जाता है और देखने वाले रात भर मौजूद रहते हैं।श्री पाण्डेय पिछले दो वर्षों से गोड नाच शैली पर काम कर रहे हैं जिन्हें ये विरासत दादा स्व कामेश्वर पांडेय से मिला है। कला संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार 2021 में जुनियर फैलोशिप में चयन होने के बाद विगत 2 सालों से भोजपुर के गांव-गांव घूमकर गोड़ जाति समाज के लोगों से मिलकर गोंड नाच शैली पर गहराई से अध्ययन कर रहे हैं।
कलात्मक रूप से देखा जाए तो, गोड़ नाच शैली में गंदे शब्दों के प्रयोग से फुहरपन लगता है लेकिन भरपूर मनोरंजन करता है।यह केवल मनोरंजन तक सिमित है।, बल्कि मूल स्वरूप के साथ कलात्मक शैली को ही समाज से जोड़े रखा है।प्रचलित गोड़ नाच में गीतों का खासा जमावड़ा है। गोंड नाच में लघु कथाएं, नाटिकाएं और पारंपरिक हूड़का के साथ गीत संगीत से सजी शैली काफी प्रभावी तब बन पड़ता है,जब इसका आयोजन मांगलिक अवसर पर हों। गोंड नाच शैली का उत्पत्ति सासाराम गुप्तेश्वर धाम प्रक्षेत्र माना जाता है, लेकिन गंगा के तटीय क्षेत्रों में आज भी परंपरागत रूप में जीवित है।

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