RKTV NEWS/अनिल सिंह,20 अप्रैल। विकास की दौड़ और अपनी अनंत इच्छाओं की स्वार्थ पूर्ति हेतु अत्यधिक पैसे की चाह में इंसान इस कदर लालायित है की मनुष्य को जीवन प्रदान करने वाली प्रकृति को भी अपनी स्वार्थ रूपी इच्छा शक्तियों की पूर्ति हेतु दिन प्रतिदिन नष्ट करते जा रहा है।जिसका परिणाम असमय मौसमों,सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देखने को मिल रही है।इसी विकास और स्वार्थ की बलि चढ़ी प्रकृति के वेदनाओ और असंतुलता को अपनी शब्दो की रचना में समाज को आइना दिखाती कवि “अजय गुप्ता अज्ञानी “की रचना “इत्तफाक नहीं है”।
इत्तफाक नहीं है!!!
अभी बाकी है देखना गुस्सा अफताब का,
यें तो बानगी है बिगडे मिजाज का।
आदमी की लालच ने इस कदर रौंदा ड़ाला प्रकृति को,
और आहें के भी यूँ ही नजर अंदाज करता गया,
आकाश, पताल धरती को बेजार करता गया।
मिटा डाला नामो निशान,
नदी जंगल पहाड का।
विकास इतना अंधा हुआ कि,
कब्र खोद डाली पुरे के पुरे संसार की।
इत्तफाक नहीं है बादल का फटना,
ग्लेशियर का यूँ ही पिघलना।
कहीं बर्फो के तुफाने,
कहीं धूलो की आँधियाँ,
कहीं गर्म हवाओ के झोके,
कहीं जलता हुआ हरा भरा जंगल,
कहीं पहाडो का यूँ ही दरकना,
कहीं बादलो का बेजार फटना,
उगे मैदानो में आशातीत गगन चूमबी पहाड़े,
ओझल प्रकृति के मनोहर नजारे।
बेघर विलखते जंगली जीव,
दम तोड़ते परिंदो के झूरमुटे।
तहस नहस होते पुरे के पुरे पारितंत्र।
सौरमंडल की दुनिया में,
तांडव मचाता अप्राकृतिक उपग्रहे!!
धूलो से गगन का भरना,
नमी की धरा से मिटना,
कहीं वो जलता हुआ हवाओ का कारण तो नहीं!!
मगर मानव ऐश करना नहीं छोड़ेगा!!
एक पाप से मुक्ति वास्ते दूसरा पाप जरुर करेगा!!
खैर जो भी हैं मानव प्रकृति को,
जब-जब आशातीत मनमानी नोचा है।
प्रकृति ने फिर जीरो से संरचना शुरु की है।
मगर मानव इतना ढीठ है कि,
सब कुछ जानते हुए भी।
आपना पैचाशिक गुण को रोक नहीं पाया।
व धरती को सममूल्य नाश के मुहाने पर ला खड़ा किया है।
फिर भी मानव का वहीं ढीठ प्रश्न है की प्रकृति बदल रही है,
कभी यह नहीं कहता है की प्रकृति,
हमारी बदमिजाजी के कारण बदलने पर मजबूर हो गई।
अब तो यह कहना पड़ेगा कि,
मानव यही रुक जाए ऐसा कोई आश नहीं,
सच कहूँ गर, मानव कोई अभिशाप से कम नहीं!!!
जी हाँ मानव कोई।
