
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)08 फ़रवरी शिवमहापुराण यज्ञ शिवपार्वती विवाह के साथ सात दिवसीय धार्मिक आयोजन भारत के महितपस्वी संत जीयरस्वामीजीके कूकृपापात्र ब्रह्मपुरपीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र जी महाराज द्वारा समापन हुआ।
वैदिक मंत्रों और मागलिक पारम्परिक गीतो के साथ माड़ो गाडने का विधान हुआ।आचार्य जी ने कहा की बास वंश का प्रतीक है।हरे बास का विवाह मंडप गाड़ने व छाने का विधान है।यह बास पर्यावरण रक्षक भी है।इसके पश्चात मिट्टी कोड़ने की विधान पर प्रकाश डालते आचार्य जीने कहा कि भारत ऋषि व कृषि प्रधान देश है ,अतः वर कन्या को मिट्टी से जुड़े रहने व कृषि से संबध बनाने रखने का संदेश है।पश्चात हल्दी लेपन के महात्म्य को बताते हुये आचार्य जीने कहा कि हल्दी जहाँ मंगलका सूचक है,वहीं वह आर्युवेदिक महत्व रखता है।विवाह मे वर कन्या का भाई धान का लावा मेराता है,क्योंकि लावा हल्का होता है,धान का पौधा उगाया कहीं जाता है ,और रोपण कहीं होता है,अर्थात धान का संवर्धन बीज मे नहीं ,खेत मे होता है।वैसे ही बेटी का संवर्धन वर के घर मे होता है। आचार्य ने बताया की सनातन मे विवाह का मतलब पाणिग्रहण संस्कार है।
विवाह व्यापार नहीं, विवाह समस्या नहीं समाधान है,विवाह श्रृष्टि का आधार है। शिवपुराण कथा को विश्राम देते हुए कहा कि शिवपुराण मे 24,000श्लोक और सात संहिता है।यह प्रमुख पुराण है।इसमे परब्रह्म परमेश्वर के शिव स्वरूप का तात्विक विवेचना, रहस्य, महिमा व उपासना का विधिवत वर्णन हुआ है।भगवान शिव मात्र पौराणिक देवता ही नहीं, अपितु पंचदेवों के प्रधान,अनादि परमेश्वर हैं,निगमागम सभी शास्त्रों मे महिमा मंडित महादेव हैं। वैदिक मंत्रोच्चार व पारम्परिक मांगलिक गीतों से पूरा वातावरण गूंजता रहता, भक्त भक्ति में झूमते रहे।आरती व प्रसाद वितरण, भंडारे के साथ विश्वकल्याण की कामना के साथ शिवमहापुराण यज्ञ संपन्न हुआ। आयोजन समिति के सभी सदस्य सक्रियता से अपने दायित्वों का निर्वहन करते दिखाई दिये वहीं तरूणों की भी सक्रियता काबिले तारीफ रही।
