
गोरखपुर/उत्तर प्रदेश (नन्दलाल मणि त्रिपाठी)02 फरवरी। सनातन के धार्मिक महोत्सवों में कुम्भ का अपना अलग स्थान एव महत्व है जो सनातन धर्म गर्न्थो में वर्णित है जिसके कारण सनातनमतावलम्बी जो बहुसंख्यक समाज भारत में है उसके लिए कुम्भ अत्यधिक पावन एवं पापों का नाश करने वाला स्नान होता है ।
प्रयाग राज जहां वर्तमान समय मे 144 वर्षों बाद महाकुंभ का महापर्व चल रहा है जो धार्मिक के साथ साथ सामाजिक भी है ।
सन्यासी संत का अर्थ अनेक सनातन ग्रंथो में जो बताया गया है उसकी आसान एव सरल व्याख्या है धर्म कि वह दृष्टि दृष्टिकोण जो अपने धर्म एव समाज का संरक्षण संवर्धन के साथ साथ उसे अक्षय अक्षुण एव उसके बैभव विकास एव प्रगति उत्थान विकास हेतु पथ प्रदर्शक एवं मार्गदर्शक की निर्णायक भूमिकाओं का निर्वहन करता है। अर्थात संत सन्यासी समाज का न्यासी (trusti) है -जिसका अर्थ है विश्वास एवं विश्वसनीय। राजनीतिक में भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं का निर्वहन तब करता है जब राजनीतिक प्रक्रिया परम्पराओं में उसके महत्व को समझा जाए एवं उसकी भूमिकाओं को महत्वपूर्ण मानते हुए सम्मान एव प्रतिष्ठा प्रदान की जाय। यहाँ दो उदाहरण प्रासंगिक एवं प्रामाणिक हैं ।
राम मंदिर के निर्माण का आंदोलन पांच सौ वर्षों तक चला, लेकिन आंदोलन अस्तित्व के परिणाम में तब फलित हुआ जब दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ राजनीतिक सहभागिता सुनिश्चित हुई। यदि ऐसा नहीं होता तो आज प्रभु राम का मंदिर ही नही होता
इस सत्य से भारत का जन जन एव समुर्ण सन्तसमाज भलीभाँति परिचित है।
सोम नाथ पर जब गजनवी का आक्रमण पर आक्रमण हो रहा था तब सोम नाथ मंदिर का सम्पूर्ण संत समाज ही उसकी रक्षा अपनी अपनी क्षमता से करते वीर गति को प्राप्त हो रहा था कारण यह था कि भारत कि राजनीतिक शक्ति श्रोत या तो गजनवी के आक्रमण से परास्त हो चुकी थी या तो भय के कारण किसी ने सोम नाथ के संत समाज की मदद एव सोमनाथ मंदिर को बचाने का दुस्साहस नही किया परिणाम पूरे भारत एव उसकी पीढ़ियों को मालूम है और मालूम होता रहेगा ।
धर्म समाज एव उसके धरोहर आस्था विश्वास में पक्ष विपक्ष कि राजनीति होती ही नही सिर्फ राष्ट्रीय अस्मिता के
लिए राजनीति होती है।
महोदय वर्तमान महाकुंभ प्रयाग के आयोजन में वर्तमान सरकार ने बड़ी निष्ठा एव ईमानदारी से सफल आयोजन के लिए सभी प्रयास किया है अतः सरकार कि नियत पर प्रश्न चिन्ह उठाना ना तो सत्य है ना ही तर्क संगत ।

कुम्भ के आयोजन में मौनी आमस्या के स्नान का बहुत विशेष महत्व है और यह सरकार की कोशिशें का परिणाम था कि मौनी आमस्या को लगभग आठ से दस करोड़ लोग पहुंचे एक सौ चौलालिस वर्ष बाद आए महाकुंभ में अमृत स्नान हेतु ।
इतनी आबादी के विश्व मे 150 से अधिक देश नही है।
यह बहुत ही दुर्भाग्य एव पीड़ा दायक है कि वहाँ भगदड़ मची अब तो समाचार माध्यमों से यह भी सूचना आ रही है कि एक दो नही बल्कि तीन तीन स्थानों पर भगदड़ मची जिसमे बहुत से श्राद्धलुओ को जान तक गंवानी पड़ी निश्चित रूप से इस हृदय विदारक घटना से सम्पूर्ण राष्ट्र आहत एव स्तब्ध है आखिर ऐसा हुआ तो क्यो?
यह विषय निश्चित रूप हृदयविदारक एव पीड़ादायक ऐसा घाव हैं जिसकी वेदना से सम्पूर्ण राष्ट्र कराह रहा है जिन लोंगो ने एक एक करके तीन भगदड़ में अपने प्रिय जनों को खोया है उसकी भरपाई असम्भव है चाहे उन्हें पैसे से तौल दिया जाय बस एक ही तथ्य उनके लिए सनातन का कुछ संतोष दे सकता है की संगम जहाँ मोक्ष के लिए अस्थियो का विसर्जन किया जाता वहां ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी।
सम्भव है यह किसी षडयंत्र का भी हिस्सा हो यह तो जांच का विषय है ही।
साऊदी अरब एक ऐसा इस्लामी राष्ट्र है जहाँ इस्लाम को सच्चे अर्थों में आचरण रूप में दिखता है और सभी धर्मावलंबी सौदीअरब कि धार्मिक परम्पराओ को नतमस्तक होकर सम्मान करते है वही मक्का जैसा पवित्र इस्लामिक तीर्थ है एव जहाँ कि इस्लामिक ईमानदार प्रशासनिक व्यवस्था पर कोई प्रश्नचिन्ह खड़ा करना बुनियादी रूप से मानवता एव उसकी सभ्यता पर शक करना है ।
वहाँ प्रत्येक वर्ष लाखो हज यात्री सम्पूर्ण विश्व से जाते है मुझे जहाँ तक जानकारी है वर्ष 1990 एव 2015 में दो दुर्भाग्य पूर्ण हादसे हुए 1990 में लगभग 1500 एव 2015 में लगभग 2500 श्रद्धालुओं को अपनी जान गवाई हादसे का कारण कम क्षेत्र में अधिक लोंगो का आना बताया गया था। उक्त दोनों हादसों के परिपेक्ष्य में जहाँ तक मुझे याद है सभी इस्लामिक फकीरों सन्तो ने यही कहा था कि जिन लोंगो ने इन हादसों में अपनी जान गंवाई है उसकी भरबाईं नामुकिन है सिर्फ जिन परिवारों के लोगो ने अपनी जान गंवाई है उनके लिए मात्र यही आत्म संतोष की बात यही है की मरने वालों ने खुदा की हुजूर में दम तोड़ा जिसकी चाह में विश्व के बिभन्न कोनो से आए श्रद्धालु आए खुदा उन्हें जन्नत नशी करेगा
साऊदी अरब एक ऐसा इस्लामी राष्ट्र है जहाँ इस्लाम सच्चे अर्थों में आचरण रूप में दिखता है और सभी धर्मावलंबी साऊदीअरब कि धार्मिक परम्पराओ को नतमस्तक होकर सम्मान करते है वही मक्का जैसा पवित्र इस्लामिक तीर्थ है एव जहाँ कि इस्लामिक ईमानदार प्रशासनिक व्यवस्था पर कोई प्रश्नचिन्ह खड़ा करना बुनियादी रूप से मानवता एव उसकी सभ्यता पर शक करना है ।
वहाँ प्रत्येक वर्ष लाखो हज यात्री सम्पूर्ण विश्व से जाते है मुझे जहाँ तक जानकारी है वर्ष 1990 ,1994 2015 में तीन दुर्भाग्य पूर्ण हादसे हुए 1990 में 1994 में 270 लगभग 1500 एव 2015 में लगभग 2500 श्रद्धालुओं को अपनी जान गवाई हादसे का कारण कम क्षेत्र में अधिक लोंगो का आना बताया गया था। उक्त दोनों हादसों के परिपेक्ष्य में जहाँ तक मुझे याद है सभी इस्लामिक फकीरों सन्तो ने यही कहा था कि जिन लोंगो ने इन हादसों में अपनी जान गंवाई है उसकी भरपाई नामुकिन है। सिर्फ जिन परिवारों के लोगो ने अपनी जान गंवाई है उनके लिए मात्र यही आत्म संतोष की बात यही है की मरने वालों ने खुदा की हुजूर में दम तोड़ा जिसकी चाह में विश्व के बिभन्न कोनो से आए श्रद्धालू आए खुदा उन्हें जन्नत नशी करेगा।
2013 कुम्भ में प्रयाग राज रेलवे स्टेशन पर रेल ओवरब्रिज ही टूट गया जिसमें जन हानि हुई उस कुम्भ आयोजन के प्रभारी आदरणीय आजम खां जी थे बाद कुम्भ आजम खां साहब इस घटना से इतने दुखी हुए की उन्होंने इस्तीफे तक का मन बना लिया।
आयोजन-2013 के बृहद आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के आयोजन के अधिकारियों को बुलाकर उनसे इतने बड़े आयोजन की सफलता एव प्रबंधन के लिए जानकारी प्राप्त की गई निश्चित रूप से प्रदेश एव देश के लिए गौरवपूर्ण था
अब धीरेंद्र शास्त्री जी के बयान के परिपेक्ष्य में हादसों का अव्यहारिक व्याख्या करते हुए आदरणीय संत समाज अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा है जबकि धीरेंद्र शास्त्री जी ने – कहा था की मृत्यु तो सबको आनी है किसी को आज किसी कल कल।
पुण्यफल की कामना से अमृत स्नान हेतु आए श्राद्धलुओ ने अगर दुर्भगपूर्ण तरीके से जान गंवाई वह उसकी भरपाई असम्भव है आत्म संतोष कि बात यदि हो सकती है तो मात्र इतनी कि सनातन के महा अनुष्ठान महाकुंभ में में जिस इच्छा को लेकर आए सम्भवतः उन्हें दुर्भगपूर्ण जीवन गंवाने पर सहायक हो ।
यह धीरेंद्र शास्त्री जी ने प्रयाग के महाकुंभ के दुःखद पूर्ण हादसे के संदर्भ में नही बल्कि यह उनके प्रवचन का हिस्सा था जिसे महाकुंभ प्रयाग कि घटना के परिपेक्ष्य में जोड़कर आदरणीय संत समाज द्वारा जो टिप्पड़ियां की जा रही है वह ना तो प्रासंगिक है ना ही व्यवहारिक किसी धर्म के धर्मगुरुओं में इतना विवाद मैंने कभी नही सुना जितना हमारे सनातन में है अक़्सर होता रहता है। जो सनातन धर्म के लिए कत्तई शुभसंकेत तो नही है उचित भी नही है ।
अतः मैं सनातन विद्वत धर्मगुरुओं से निवेदन करना चाहूँग कि अपनी हठधर्मिता से श्रेष्ठता की होड़ को त्याग कर सनातन समाज को सशक्त बहुआयामी कल्याणकारी एवं मंगलकारी बनाए रखने में सनातन संत सन्यासी की महत्वपूर्ण वास्तविक भुमकाओं से सनातन जन को कृतज्ञ कृतार्थ करने की महती कृपा करें।
