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महान लोकोपकारी विभूति थे प्रथम राष्ट्रपति डा राजेन्द्र प्रसाद : शशि मिश्र

आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)03 दिसंबर।देश के प्रथम राष्ट्रपति व महान स्वतंत्रता सेनानी डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी की जयंती पर उन्हें कोटिशः नमन। किसी राष्ट्र की ही नहीं समस्त विश्व के महान विरासत में भौतिक सम्पदा से अधिक उसकी बौद्धिक और सरल लोकोपकारी कार्य उल्लेखनीय है। इसी प्रसंग में गणतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डा० राजेन्द्र प्रसाद की महनीम स्मृति अपनी सर्जनात्मकता संपदित करती है। निश्चयपूर्वक देशरत्न का व्यक्तित्व ,सेवा, समर्पण और शील के उच्चतर मूल्यों का प्रतिमान है।यह इस देश का परम सौभाग्य है कि इसे अपनी आजादी की लड़ाई में और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद डा० राजेन्द्र प्रसाद जैसी विभूति का बहुमूल्य मार्गदर्शन मिला। इस राष्ट्र का यह भी सौभाग्य है कि गणतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में डा. राजेन्द्र प्रसाद का मनोनयन हुआ। डा. राजेन्द्र प्रसाद ने लगभग बारह वर्षों तक देश की नियति को अपनी अद्भुत तेजस्विता और विनम्रता के प्रकाश से आलोकित किया। डा० राजेन्द्र प्रसाद जी आधुनिक भारत के प्रमुख निर्माताओं में से एक है। वह एक अग्रगण्य स्वतंत्रता सेनानी, एक प्रख्यात विधिवेत्ता, एक वाकपटु सांसद, एक सुयोग्य प्रशासक, एक श्रेष्ठ राजनेता होने के साथ-साथ एक महान मानवतावादी व्यक्ति थे।
आधुनिक भारत के महान निर्माताओं की श्रेणी में राजेन्द्र बाबू सरल,जीवन और उच्च विचार वाले आदर्श के प्रकाश पुंज थे। डा. प्रसाद के अनुकरणीय जीवन यात्रा में सर्वथा इनके मन-वचन-कर्म की निश्छलता, सरलता और विनम्रता प्रतिभाषित होती रही। यही कारण है कि इनके सम्पर्क में आने के बाद हर व्यक्ति इनके शीलवान व्यक्तित्व से अभिभूत होकर अपने हृदय की क्षमताओं से ऊपर उठने की प्रेरणा पाता था। इसलिये आधुनिक भारत के राष्ट्रीय जीवन में राजेन्द्र बाबू अजातशत्रु ही नहीं अपितु परम श्रद्धेय प्रेमाश्रम व्यक्ति भी थे।
राजेन्द्र बाबू ने अपने जीवन के अधिकांश अमूल्य वर्ष न केवल स्वतंत्तता संग्राम को ही समर्पित कर दिए अपितु वह जीवन पर्यन्त सुख-सुविधाओं से वंचित लोगों के उत्थान के लिए कार्य करते रहे। वह एक महान लोकोपकारी मानव थे, जिनका हृदय सदा ही निर्धनों और दलितों से द्रवीभूत रहता था। उनका अपना व्यक्तित्व जरूरतमंदों और सुख-सुविधाओं से वंचित व्यक्तियों के साथ पूर्णरूपेण घुल-मिल गया था और उनके प्रति उनकी भावनाएं पूर्णरूपेण समर्पित थीं। इन्हीं कारणों से वह अपने देश के करोड़ों व्यक्तियों के मन मंदिर में बस गए थे।आज देश अन्य संकटों के साथ-साथ चरित्र संकट से भी गुजर रहा है। भारत ऐसे विकासशील देश को शक्तिशाली अनेकों ताप विद्युतघरों, कल-कारखानों, तेज रफ्तार वाले वाहनों तथा द्रुतगति से बौद्धिक पेचीदगियों को सुलझाने वाले कम्प्यूटर और संयंत्रों की जबर्दस्त जरूरत है। किन्तु इन सभी के संवाहक और चालक तो मानवीय गुणों से पूरित व्यक्ति ही होंगे। अस्तु आज, भारत को पहले से अधिक चरित्रवान नागरिकों की पीढ़ी की परम आवश्यकता है। राजेन्द्र बाबू इसी चरित्र, सच्चाई और सादगी के प्रतीक थे। राजेन्द्र बाबू मानवीय और आध्यात्मिक मूल्यों के एक जीवन्त स्मारक के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे।

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