
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)07 नवंबर।भारत धर्म प्रधान देश है।भारतीय संस्कृति में सूर्योपासना की प्राचीन परंपरा रही है। छठ महापर्व उसी परंपरा का विशिष्ट अनुपालन है। यों तो भारतीय वांग्मय में तैंतीस कोटि देवों की परिकल्पना की गई है, परंतु दो ही देवता आज प्रत्यक्ष दर्शित हैं और वे हैं भुवन भास्कर दिनमणि दिनेश और निशानाथ राकेश (चंद्रमा)। सूर्य के प्राकट्य से संसार ज्योतिर्गमय हो जाता है। जिनकी रश्मियों से जड़ चेतन सभी लाभांवित हैं और जिनकी महिमा का गान जगत के सभी प्राणी निर्द्वन्द्व भाव से करते हैं। उन्हीं भुवन भास्कर की अर्चना-वंदना हेतु छठ महापर्व मनाया जाता है। यह भक्तों का दिनकर के प्रति नमन,वंदन और अभिनंदन का पर्याय है।
आमतौर पर छठ व्रत समस्त उत्तर भारत में मनाया जाता है परंतु विशेषकर बिहार, झारखंड,उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में इस पर्व को मनाने की विशेष प्रथा है। दीपावली के बाद 6 दिन का वातावरण रसमय रहता है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी मनाया जाता है, अमावस्या के दिन दीपावली। कार्तिक शुक्ल पक्ष को भाई दूज, कायस्थ इस दिन चित्रगुप्त पूजा मनाते हैं और फिर छठ का पवित्र महापर्व आता है।
चतुर्थी तिथि को लोक भाषा में नहान-खाय कहा जाता है। इस दिन छठ व्रती गण कद्दू की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल का भात बतौर प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह सारा कुछ पवित्र ढंग से पकाया जाता है। पंचमी तिथि को ‘लोहड़ा’ कहा जाता है। व्रती गण इस दिन, दिन भर उपवास करते हैं, शाम में खीर-पूड़ी का प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस प्रसाद को पास-पड़ोस, बंधु-बांधव, हित-हितैषी भी सप्रेम ग्रहण करते हैं। फिर आता है षष्ठी एवं सप्तमी का महापर्व। षष्ठी का अर्घ्य अस्ताचलगामी सूर्य को दिया जाता है। उदित सूर्य को सप्तमी की सुबह अर्घ्य दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि शाम का अर्घ्य छठी माई को दिया जाता है और सुबह का अर्घ्य भुवन भास्कर को दिया जाता है। शाम में गाया जाने वाला गीत छठी मैया होहूँ न सहाई………….. प्रातः काल सुरुज देव को सूरज होहूँ न सहाई ….. एक गीत में बदल जाता है।
भारत में सूर्योपासना वैदिक काल से चली आ रही है। गायत्री मंत्र के रूप में जिस वैदिक वाणी का जप करते हैं :- ॐ भूर्भुव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।*
*धियो यो न प्रचोदयात्।*
*यजुर्वेद -36-3
बिहार में 3 सूर्य मंदिर बहुत प्रसिद्ध है – औरंगाबाद जिले में देवमूंगा, भोजपुर में देवचंदा और रोहतास में देव-पड़सर। काल क्रमानुसार यह मंदिर भी 12 वीं शताब्दी के प्रतीत होते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि स्वयं विश्वकर्मा ने अपने हाथों इन सूर्य मंदिरों का निर्माण किया है। छोटा नागपुर में संस्कृति विहार द्वारा बुण्डू में नवनिर्मित सूर्य मंदिर अनुपम है। इस मंदिर का भूमि पूजन सूर्य सप्तमी दिन रविवार 5 नवंबर 1989 को हुआ था तथा शिलान्यास ज्योतिर्पीठीधीश्वर शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद जी ने किया और प्राण प्रतिष्ठा ब्रह्मलीन स्वामी वामदेव जी ने की थी।
