तुम कौन हो?
रोज अर्द्ध राका में
गहन निद्रा में पड़े देख
धीरे से
न जाने किस दुनिया में
तुम मुझे उड़ा ले जाते हो
अरे, तुम कौन हो?
चल चित्र सम वहाँ
कभी मनभावन
तो कभी डरावन
तुम मंजर मुझे दिखाते हो
अरे, तुम कौन हो?
कभी मुझे तुम
पर्वत के ऊँचे शिखर रखते हो
तो कभी सागर मध्य
उठती उताल उताल लहरों पर
मुझे डोंगी सम
उठाते गिराते हो
अरे, तुम कौन हो?
कभी तुम मुझे
वीभत्स जंगल में छोड़
लुप्त हो जाते हो
मैं बाघ चीता देख उसमें
डरकर चिल्ला उठता हूँ
बेहाताशा भागता हूँ
अरे, तुम कौन हो?


