
RKTV NEWS/विष्णु नागर,08 सितंबर।जहां तक पद के प्रति अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाने का प्रश्न था, एक बार भ्रष्टाचार के मामले में वह फंसते-फंसते किसी तरह बच गए थे। उन्हें माता वैष्णो देवी के दरबार में अरदास करने जाना पड़ा था। लगता है, मां ने उन्हें बचा लिया था। उस भ्रष्टाचार का साया उनके सिर से हमेशा के लिए हट गया था।
इसके बाद उन्होंने नई रणनीति पर काम करना शुरू किया। वह सिर का काम पैरों से लेने लगे। चमत्कार कि इससे आगे फिर से फंसने का खतरा पचास प्रतिशत तक कम हो गया। इसके बावजूद उनके मन का डर नहीं गया। उन्होंने नाक का काम कान से और कान का काम नाक से लेना शुरू कर दिया। इतने पर भी पूरी आश्वस्ति नहीं हुई, तो मुंह का काम आंखों से और आंखों का काम मुंह से लेना आरंभ कर दिया। इस तरह हर अंग-प्रत्यंग की भूमिका पलटते चले गए और बचते चले गए। डर तो फिर भी डर था, न गया, तो वह सिर के बल चलने लगे, जो कि सरकारी तौर पर उनके पैर थे। इससे भी आश्वस्ति नहीं हुई, तो वह पेट के बल रेंग कर मां भगवती की शरण में गए और बच गए।

एक दिन उन्हें मरना था, सो मर भी गए। मरने में उन्होंने कोताही नहीं की। अच्छा यह हुआ कि वह सारी कीर्ति-अपकीर्ति अपने साथ पोटली में बांध कर ले गए। यहां किसी के भरोसे छोड़ जाना उन्हें उचित प्रतीत नहीं हुआ।
उनके मरने पर शांति पाठ होना था, वह हुआ और काफी शानदार ढंग से हुआ। तेरहवीं भी बढ़िया ढंग से निबटाई गई। उनकी शान में विशाल भगवती जागरण की तर्ज पर विशाल शोक सभा हुई, जिसमें सभी विचारों और विचारधाराओं के लोग सम्मिलित हुए। इसके बाद वह संपूर्ण रूप से मर गए। उनकी प्रतिमा लगाने का निश्चय शोक सभा में लिया गया था, मगर वह निश्चय,अनिश्चय को प्राप्त होते-होते अपनी मौत मर गया। सो, यह भी अच्छा हुआ।
फिर उनके ड्राइंग रूम में उनका फोटो लगा,जो कि लगना ही था और लगना ही चाहिए था। समय के साथ उसका शीशा तड़क गया और ड्राइंग रूम से हटने तक तड़का हुआ ही रहा।
इस प्रकार वह मर गए, तो उनका भय और भ्रष्टाचार भी उनके संग मर गया। राम नाम सत्य हो गया।
(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर व्यंग्यकार, कवि, कहानीकार और पत्रकार हैं। संपर्क : 98108-92198)
