
आज नमक कुछ ज्यादा था!
तीर शब्दों के
चुभते दिल पर,
नारी देखो फिर रोती है।
नहीं चाहती सोना-चाँदी।
नहीं चाहती महँगा गहना।
थोड़ा तो सम्मान करो,
फिर कन्या पूजन क्यों करते हो?
वह पूरा घरबार सँभाले।
क्या उसकी यह गलती थी?
गर्मी की उस तपन में जलती,
रोटी गरमागरम खिलाती।
खुद सूखी रोटी खाती है।
क्या उसकी यह गलती थी?
लगी रही वह तेरी खातिर,
भूल गयी अपना अस्तित्व।
आज नमक कुछ ज्यादा था।
क्या इतनी-सी ही गलती थी?
बात-बात पर ताने देकर
तुमने उसको मार दिया,
कत्ल किया न छूरी से,
तुमने शब्दों से प्राण लिया।
पढ़ी-लिखी थी,
जॉब को छोड़ा।
क्यों?
सारा घरबार सँभाले।
भूल गयी अपना अस्तित्व,
क्या उसकी
कुछ नहीं थी ख्वाहिशें?
फिर वह रोयी,
छुप-छुप रोयी,
सारे बर्तन साफ हुए।
भूल गई थी गाना सुनना,
आज ही सैड सॉन्ग्स सुने।
जब-जब रोयी
खाली डिब्बे में
कितने ही
अचार भरे।
तुम कहते हो,
घर में रहकर
पूरा दिन
करती ही क्या हो?

