आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा) 24 मई।गुरूवार को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् तथा सनातन-सुरसरि सेवा न्यास के संयुक्त तत्त्वावधान में फ्रेंड्स कॉलोनी कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में प्रवचन करते हुए आचार्य डॉ भारतभूषण जी महाराज ने कहा कि कालक्रम से धर्म के क्षेत्र में भी व्यावहारिक विकृतियों का समावेश हो जाता है। समाज वैदिक शिक्षा और संस्कार से परे आचरण करने लगता है। वेद-यज्ञ-देवता आदि के विरोधी असुर-अराजक तत्त्व मनुष्य बन कर पृथ्वी पर आ जाते हैं तब सम्पूर्ण वेदों का सार-हृदय प्रकट करने तथा विकृतियों का शोधन करने के लिए भगवान बुद्ध के रूप में अवतार लेते हैं। आचार्य ने कहा कि पुराणों में बुद्धावतार की भूमि गयाधाम को बताया गया है। यह अवतार मगध क्षेत्र में तथा ब्राह्मण कुल में हुआ है। उन्होंने कहा कि परवर्ती बुद्ध जिन्हें सिद्धार्थ या गौतम बुद्ध कहा जाता है उनके अनुयायियों ने वेद और यज्ञ का विरोध किया जबकि आद्य बुद्ध ने यज्ञों में आई विकृतियों का परिमार्जन कर वेद की शिक्षाओं का प्रचार किया।
कार्यक्रम का संचालन मधेश्वर नाथ पाण्डेय, स्वागत भाषण विश्वनाथ दूबे और धन्यवाद ज्ञापन सत्येन्द्र नारायण सिंह ने किया। इस अवसर पर अखिलेश्वर नाथ तिवारी, सियाराम दूबे, वीरेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव,अजय मिश्र, जनकदुलारी त्रिपाठी समेत प्रमुख लोगों ने पूजन-अर्चन तथा प्रवचन में भाग लिया।
